अजमेर दरगाह विवाद: शिव मंदिर होने का दावा, अब अदालत के फैसले पर टिकी निगाहें।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.पी. सिंह ने राजस्व अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और शपथपत्रों का किया उल्लेख।
अजमेर जिला न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय पर जताया भरोसा; न्यायिक प्रक्रिया के जरिए न्याय मिलने की उम्मीद व्यक्त की।
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली। अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़ा विवाद धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और न्यायिक प्रक्रिया के तीन महत्त्वपूर्ण आयामों को एक साथ केंद्र में ला रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.पी. सिंह ने दैनिक इंडिया न्यूज़ के साथ साझा किए गए अपने वक्तव्य में दावा किया है कि अजमेर शरीफ दरगाह का परिसर पूर्ववर्ती हिंदू मंदिर से संबंधित है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में राजस्व अभिलेखों, ऐतिहासिक साक्ष्यों, दस्तावेजों, गवाहियों और शपथपत्रों को अजमेर जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। उनके इस बयान ने विवाद से जुड़े कानूनी और ऐतिहासिक प्रश्नों पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है।
डॉ. ए.पी. सिंह के अनुसार, राजस्थान में उनके कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में शपथपत्र एकत्र किए थे, जिन्हें महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष सौंपा गया। उन्होंने अजमेर जिला न्यायालय में अपने पक्ष को सफलता मिलने का दावा करते हुए विपक्षी पक्ष पर 30-30 हजार रुपये का जुर्माना लगाए जाने की बात भी कही। हालांकि, जुर्माने के आदेश, संबंधित पक्षकारों और प्रकरण की सटीक स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि के लिए न्यायालय के आधिकारिक अभिलेखों का परीक्षण आवश्यक है।
अपने वक्तव्य में अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि कुछ पक्ष मामले के शीघ्र निस्तारण के बजाय न्यायिक प्रक्रिया में विलंब चाहते हैं और बार-बार तारीखें मिलने की स्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समन प्राप्त होने के बाद वे न्यायालय में उपस्थित हुए और अपनी ओर से आवश्यक दस्तावेज दाखिल कर दिए। उन्होंने यह भी बताया कि याचिका से संबंधित कुछ पृष्ठों की प्रतियां उपलब्ध नहीं हो सकी थीं, जिन्हें प्राप्त करने के लिए मांग की गई है। उनके अनुसार, शेष दस्तावेज मिलने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
अजमेर के ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने पृथ्वीराज चौहान की विरासत को भी अपने दावे से जोड़ा। उन्होंने कहा कि पृथ्वीराज चौहान भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते थे और शिवरात्रि के अवसर पर बेलपत्र, नारियल, धतूरा तथा गाय का दूध अर्पित करते थे। उन्होंने परिसर में नंदी की प्रतिमा और शिवलिंग की कथित मौजूदगी तथा राजस्व अभिलेखों में मंदिर से संबंधित प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए इन्हें अपने पक्ष के प्रमुख आधारों के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि, इन दावों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता और संबंधित अभिलेखों का वास्तविक आशय न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही निर्धारित किया जा सकेगा।
डॉ. ए.पी. सिंह ने अपने वक्तव्य में सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा-वृंदावन, काशी और संभल से जुड़े धार्मिक-ऐतिहासिक विवादों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन्हें अजमेर प्रकरण में भी न्यायिक सफलता का पूरा विश्वास है। उन्होंने अजमेर जिला न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए उम्मीद जताई कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से उनके पक्ष में निर्णय आएगा। हालांकि, विभिन्न स्थानों पर चल रहे मुकदमों की स्थिति और उनके न्यायिक परिणाम अलग-अलग हैं; इसलिए प्रत्येक मामले का आकलन उसके अपने तथ्यों और न्यायालय के आदेशों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
अब सबकी निगाहें न्यायिक प्रक्रिया पर। अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़े इस विवाद में प्रस्तुत किए जाने वाले राजस्व अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की प्रामाणिकता तथा उनका कानूनी महत्त्व निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। डॉ. ए.पी. सिंह ने अपने पक्ष को लेकर दृढ़ विश्वास व्यक्त किया है, लेकिन दरगाह की ऐतिहासिक प्रकृति और उससे संबंधित दावों पर अंतिम निष्कर्ष न्यायालय के परीक्षण तथा विधिसम्मत निर्णय से ही सामने आएगा।