काशी की धरती से उठा वह विचार, जो विज्ञान को देगा नई दिशा

हरिंद्र सिंह,दैनिक इंडिया न्यूज़,वाराणसी। जब विज्ञान की चर्चा होती है तो सामान्यतः प्रयोगशालाओं, शोधपत्रों और आधुनिक उपकरणों की छवि मन में उभरती है। किंतु काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में विज्ञान भारती के सातवें राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने विज्ञान को एक बिल्कुल अलग दृष्टि से देखने का आग्रह किया। उन्होंने ऐसा विचार प्रस्तुत किया जिसने उपस्थित वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों को केवल तकनीकी उपलब्धियों तक सीमित रहने के बजाय भारत की उस ज्ञान परंपरा की ओर देखने के लिए प्रेरित किया, जिसने हजारों वर्षों से विज्ञान और अध्यात्म को एक-दूसरे का पूरक माना है।

अपने उद्बोधन की शुरुआत करते हुए उन्होंने एक ऐसा प्रश्न खड़ा किया, जो आधुनिक वैज्ञानिक विमर्श के केंद्र में होना चाहिए—क्या विज्ञान केवल भौतिक उन्नति का साधन है, या वह मानवता को नैतिक दिशा भी प्रदान कर सकता है? इसी प्रश्न का उत्तर खोजते हुए उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का उल्लेख किया और बताया कि यहाँ विज्ञान कभी केवल प्रयोग और परिणाम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन, समाज और प्रकृति के साथ उसके संबंधों को भी समझने का माध्यम रहा है।
काशी का उल्लेख करते हुए डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि यह केवल एक नगर नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित हो रही ज्ञानगंगा का जीवंत केंद्र है। विश्व की प्राचीनतम जीवित नगरी मानी जाने वाली काशी आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक चेतना समय की सीमाओं से परे है। उन्होंने कहा कि जिस भूमि पर ऋषियों ने ब्रह्मांड के रहस्यों पर चिंतन किया, उसी भूमि पर आज आधुनिक विज्ञान के नए आयाम भी विकसित हो रहे हैं। यही समन्वय भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में विज्ञान का अर्थ केवल भौतिक विज्ञान नहीं है। संगीत की स्वर-व्यवस्था, नृत्य की संरचना, व्याकरण की सूक्ष्मता, आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति, गणित की तार्किकता और दर्शन की गहराई—ये सभी विज्ञान के ही विविध स्वरूप हैं। भारतीय चिंतन ने ज्ञान को कभी खंडों में विभाजित नहीं किया, बल्कि उसे एक समग्र दृष्टि से देखा। यही कारण है कि यहाँ विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल खोज या आविष्कार नहीं, बल्कि लोकमंगल रहा है।
अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भारतीय विज्ञान परिषद की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख किया। वर्ष 1876 में महेंद्रलाल सरकार द्वारा स्थापित इस संस्था के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी महान कार्य की सफलता केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि धैर्य, लगन और कर्मठता से सुनिश्चित होती है। भारतीय वैज्ञानिक परंपरा भी इसी तप, त्याग और निरंतर प्रयास का परिणाम है। यही वह शक्ति है जिसने सीमित साधनों के बावजूद भारत को विश्व मंच पर विशिष्ट पहचान दिलाई।
इसके बाद डॉ. कृष्ण गोपाल ने उन वैज्ञानिक विभूतियों का स्मरण किया, जिन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि महानता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उद्देश्य की पवित्रता में भी होती है। महेंद्रलाल सरकार से लेकर जगदीश चंद्र बोस, सी. वी. रमन, शांति स्वरूप भटनागर, विक्रम साराभाई, सतीश धवन, डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, जी. एन. रामचंद्रन, अन्ना मणि, आत्माराम, येल्लाप्रगडा सुब्बाराव और जानकी अम्मा जैसे वैज्ञानिकों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि इन सभी ने विज्ञान को केवल करियर नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाया। उनके लिए प्रयोगशाला और समाज के बीच कोई दूरी नहीं थी।
उन्होंने कहा कि इन वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को संभव बनाया। उनके जीवन में संघर्ष था, लेकिन उससे कहीं अधिक था राष्ट्र के प्रति समर्पण। उन्होंने व्यक्तिगत उपलब्धियों से अधिक सामूहिक प्रगति को महत्व दिया। यही कारण है कि उनकी विरासत आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
अपने उद्बोधन के अंतिम चरण में डॉ. कृष्ण गोपाल ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि विज्ञान मानवता को ऊँचाइयाँ प्रदान करता है, लेकिन अध्यात्म उसे गहराई देता है। यदि ऊँचाई और गहराई का यह संतुलन समाप्त हो जाए तो प्रगति दिशाहीन हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि वैज्ञानिक केवल तकनीकी समाधान विकसित न करें, बल्कि समाज, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के साथ उनका समन्वय भी स्थापित करें।
उन्होंने विद्यार्थियों, शोधार्थियों और युवा वैज्ञानिकों का आह्वान करते हुए कहा कि भारत की वैज्ञानिक विरासत केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित रहने वाली धरोहर नहीं है। इसे समझना, आगे बढ़ाना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विज्ञान और अध्यात्म के मध्य समन्वय स्थापित करने का दायित्व विशेष रूप से वैज्ञानिक समाज पर है, क्योंकि आने वाले भारत की दिशा केवल नई तकनीकें नहीं, बल्कि उन तकनीकों के पीछे खड़े मूल्य तय करेंगे। काशी की पावन धरती से दिया गया यह संदेश केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारत के भावी वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का घोष भी प्रतीत हुआ।