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अवध बार के महासचिव से टकराना पड़ा भारी, मेयर के अधिकार सीज

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अवध बार के महासचिव से टकराना पड़ा भारी, मेयर के अधिकार सीज

फैजुल्लागंज वार्ड-73 का विवाद बना संवैधानिक संग्राम, हाईकोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ ।राजधानी लखनऊ की नगर राजनीति में एक साधारण प्रतीत होने वाला विवाद अब संवैधानिक मर्यादाओं, न्यायिक गरिमा और सत्ता के अहंकार के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष का रूप ले चुका है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा लखनऊ की मेयर सुषमा खर्कवाल के प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकारों को सीज किए जाने के बाद राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में तीव्र हलचल व्याप्त है।

पूरा प्रकरण वर्ष 2023 के नगर निकाय चुनाव से प्रारंभ हुआ। फैजुल्लागंज वार्ड-73 (तृतीय) से भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला उर्फ टिंकू शुक्ला को विजयी घोषित किया गया था। चुनाव परिणामों के अनुसार उन्हें 4972 मत प्राप्त हुए थे, जबकि समाजवादी पार्टी प्रत्याशी ललित किशोर तिवारी को 3298 मत मिले थे। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ललित किशोर तिवारी ने चुनाव न्यायाधिकरण में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि विजयी प्रत्याशी ने अपने नामांकन पत्र और शपथपत्र में आवश्यक तथ्यों का पूर्ण विवरण प्रस्तुत नहीं किया तथा महत्वपूर्ण सूचनाओं को छिपाया गया।

करीब ढाई वर्षों तक चली सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के बाद चुनाव न्यायाधिकरण ने 19 दिसंबर 2025 को भाजपा प्रत्याशी का निर्वाचन निरस्त कर दिया तथा ललित किशोर तिवारी को विधिवत निर्वाचित पार्षद घोषित कर दिया।

इसके बाद यह मामला चुनावी विवाद से आगे बढ़कर प्रशासनिक टकराव का विषय बन गया। आरोप है कि न्यायाधिकरण द्वारा निर्वाचित घोषित किए जाने के बावजूद लगभग पांच महीनों तक ललित किशोर तिवारी को पार्षद पद की शपथ नहीं दिलाई गई। जबकि हाईकोर्ट पूर्व में स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका था कि उन्हें निर्धारित समय सीमा के भीतर शपथ दिलाई जाए। इसके बावजूद आदेशों का अनुपालन न होना न्यायालय को अत्यंत गंभीर लगा।

न्यायमूर्ति आलोक माथुर एवं न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधि को उसके अधिकारों से वंचित रखना संवैधानिक मूल्यों का घोर अपमान है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों की अवहेलना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती। इसके बाद हाईकोर्ट ने मेयर सुषमा खर्कवाल के प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार तत्काल प्रभाव से सीज कर दिए तथा नगर निगम का कार्य जिलाधिकारी अथवा नगर आयुक्त के माध्यम से संचालित करने का निर्देश दिया।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा ललित किशोर तिवारी की हो रही है। राजनीतिक और विधिक हलकों में उन्हें केवल एक पार्षद नहीं, बल्कि अवध बार की प्रभावशाली शक्ति माना जाता है।

वर्तमान में वह अवध बार एसोसिएशन के महासचिव हैं तथा अधिवक्ताओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।

विधिक गलियारों में उनके संबंध में यह चर्चित है कि यदि किसी अधिवक्ता को आधी रात में भी किसी संकट अथवा विधिक सहायता की आवश्यकता पड़ जाए और कोई समाधान न मिले, तो लोग सबसे पहले ललित किशोर तिवारी का स्मरण करते हैं। कहा जाता है कि सूचना मिलते ही वह स्वयं मौके पर पहुंच जाते हैं। अधिवक्ता समुदाय में उनकी पहचान संघर्षशील, सक्रिय और सहयोगी नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित मानी जाती है।

अब राजनीतिक गलियारों में यह व्यंग्यपूर्ण चर्चा भी सुनाई पड़ रही है कि “मेयर ने किसी सामान्य पार्षद से नहीं, बल्कि अवध बार एसोसिएशन के महासचिव से टकराने की भूल कर दी।” सत्ता पक्ष शायद यह अनुमान नहीं लगा पाया कि जिस व्यक्ति को शपथ से वंचित रखा जा रहा है, वह न्यायिक परिसर में व्यापक प्रभाव रखने वाला चेहरा है। परिणामस्वरूप पूरा मामला सीधे हाईकोर्ट की कठोर संवैधानिक टिप्पणी तक पहुंच गया।

सूत्रों के अनुसार, न्यायालय के सख्त रुख से पहले मेयर सुषमा खर्कवाल की तबीयत बिगड़ने की चर्चाएं भी सामने आईं, किंतु न्यायालय ने इसे आदेश अनुपालन से बचने का वैध आधार मानने से इंकार कर दिया।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 मई को प्रस्तावित है। यदि तब तक ललित किशोर तिवारी को शपथ नहीं दिलाई जाती, तो मेयर के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह प्रकरण स्थानीय निकायों के लिए एक बड़ा उदाहरण बनेगा कि न्यायपालिका के आदेशों की अवहेलना और लोकतांत्रिक अधिकारों की उपेक्षा अंततः सत्ता पक्ष पर ही भारी पड़ती है।

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