उच्च न्यायालय परिसर बना भक्ति, सेवा और सनातन चेतना का महासंगम, श्रद्धालुओं में उमड़ा अनुपम उत्साह
दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ ।
ज्येष्ठ मास के पावन बड़े मंगल पर राजधानी लखनऊ एक ऐसे अलौकिक आध्यात्मिक आयोजन की साक्षी बनी, जिसकी दिव्यता और भक्तिमय आभा ने संपूर्ण वातावरण को राममय कर दिया। एकादश रुद्र स्वरूप, संकटमोचन, पवनपुत्र महाबली हनुमान जी के दिव्य आशीर्वाद से उच्च न्यायालय परिसर स्थित अवध बार संघ में विशाल दिव्य महाभंडारे का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इस पावन आयोजन में अधिवक्ताओं, श्रद्धालुओं तथा सनातन प्रेमियों की भारी उपस्थिति ने पूरे परिसर को भक्तिरस से सराबोर कर दिया।

प्रातःकाल से ही न्यायालय परिसर “जय श्रीराम” और “जय बजरंगबली” के गगनभेदी उद्घोषों से गुंजायमान रहा। श्रद्धालुओं की आस्था, सेवा भावना और भक्ति का ऐसा अनुपम संगम दिखाई दिया, मानो स्वयं महावीर हनुमान अपनी कृपादृष्टि से भक्तों पर आशीर्वाद बरसा रहे हों। वातावरण में व्याप्त आध्यात्मिक ऊर्जा ने उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को भावविभोर कर दिया।
अवध बार संघ की दोनों भोजनशालाओं तथा सातवें द्वार पर विशाल प्रसाद वितरण किया गया। अधिवक्ताओं के सामूहिक सहयोग से आयोजित यह महाभंडारा केवल भोजन वितरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सनातन संस्कृति की सेवा परंपरा का विराट आध्यात्मिक महोत्सव बन गया। प्रत्येक व्यवस्था श्रद्धा, अनुशासन और समर्पण भाव के साथ संपन्न कराई गई।
निचली भोजनशाला में पूर्व महासचिव बालकेश्वर श्रीवास्तव के सान्निध्य में श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया, जबकि सातवें द्वार पर आर. सी. तिवारी के मार्गदर्शन में विशाल सेवा आयोजन संपन्न हुआ। ऊपरी भोजनशाला में अधिवक्तागणों ने सामूहिक रूप से सेवा कार्य में सहभागिता निभाई। न्याय और धर्म का यह अद्भुत संगम उपस्थित लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा।
पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं के मुख से श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयां निरंतर गूंजती रहीं—
“जय हनुमान ज्ञान गुण सागर,
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।”
वहीं श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा के साथ यह चौपाई भी गाते दिखाई दिए—
“संकट कटै मिटै सब पीरा,
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।”
आध्यात्मिक विद्वानों ने कहा कि ज्येष्ठ मास में महाबली हनुमान की उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है। ऐसे पुण्यमयी अवसर पर आयोजित यह दिव्य महाभंडारा समाज में सेवा, समर्पण, सद्भाव और सनातन एकता का संदेश देने वाला महायज्ञ सिद्ध हुआ। जहां भूखे को अन्न, पीड़ित को सहारा और भक्त को प्रभु स्मरण प्राप्त हो, वहीं सच्चे अर्थों में धर्म की अनुभूति होती है।
पूरे उच्च न्यायालय परिसर को भक्तिमय सज्जा से अलंकृत किया गया था। आयोजन की दिव्यता और श्रद्धालुओं की विशाल सहभागिता ने बड़े मंगल के इस पावन पर्व को राजधानी के आध्यात्मिक इतिहास में विशेष स्मरणीय बना दिया। आयोजन के समापन तक भक्तों के मध्य यह चौपाई निरंतर गूंजती रही—
“भूत पिशाच निकट नहीं आवै,
महावीर जब नाम सुनावै।”
यह दिव्य महाभंडारा न केवल राजधानी लखनऊ, बल्कि संपूर्ण सनातन समाज के लिए श्रद्धा, सेवा, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम प्रतीक बनकर स्थापित हुआ।