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भोजशाला मंदिर से भक्तों द्वारा प्रतिष्ठित मूर्ति हटाने पर बवाल, याचिकाकर्ता ने पूछा— क्या एएसआई हाईकोर्ट से भी ऊपर?

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Dainik India News

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भोजशाला मंदिर से भक्तों द्वारा प्रतिष्ठित मूर्ति हटाने पर बवाल, याचिकाकर्ता ने पूछा— क्या एएसआई हाईकोर्ट से भी ऊपर?

भोजशाला में आस्था बनाम अफसरशाही! प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति हटाने पर एएसआई कठघरे में

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भोजशाला के गर्भगृह से मूर्ति हटाने पर संग्राम, हिंदू संगठनों ने कहा— आस्था का अपमान बर्दाश्त नहीं

दैनिक इंडिया न्यूज़, धार (मध्य प्रदेश)। ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी तथा विभिन्न हिंदू संगठनों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि भोजशाला के गर्भगृह से भक्तों द्वारा स्थापित मूर्ति हटाकर न केवल करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया है, बल्कि इंदौर हाईकोर्ट के आदेश की भावना की भी उपेक्षा की गई है। इस घटनाक्रम को लेकर हिंदू समाज में गहरा आक्रोश व्याप्त है और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।

भोजशाला प्रकरण के मुख्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी का कहना है कि भोजशाला केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि राजा भोज द्वारा निर्मित वह पवित्र स्थल है जिसे मां सरस्वती के प्राकट्य स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। उनका कहना है कि इंदौर हाईकोर्ट ने हिंदुओं को नित्य सुबह से शाम तक पूजा-अर्चना करने का अधिकार प्रदान किया है तथा केंद्र सरकार को ब्रिटेन के संग्रहालय में सुरक्षित मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत लाकर भोजशाला में स्थापित करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश भी दिए हैं। इसी क्रम में उन्होंने 18 मई को केंद्र सरकार को प्रत्यावेदन भेजकर मांग की थी कि मां वाग्देवी की प्रतिमा को शीघ्र भारत लाया जाए, ताकि श्रद्धालुओं को उनके आराध्य स्वरूप के समक्ष पूजा-अर्चना का अवसर मिल सके।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि जब तक मूल प्रतिमा भारत नहीं आती, तब तक वैकल्पिक प्रतिमा स्थापित कर पूजा व्यवस्था को सुचारु रखा जाना चाहिए था। उनका कहना है कि भोजशाला के गर्भगृह में विधि-विधान के साथ स्थापित की गई एक मूर्ति को एएसआई अधिकारियों द्वारा हटा दिया गया। यह कार्रवाई ऐसे समय में की गई जब हिंदू समाज वर्षों से भोजशाला में मां वाग्देवी की प्रतिष्ठा और नियमित पूजा की मांग कर रहा है और हाल ही में 15 मई को इंदौर उच्च न्यायालय ने हिंदुओं के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया है।

तिवारी ने आरोप लगाया कि मंदिरों में मूर्ति के बिना पूजा-अर्चना की परंपरा की कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे में स्थापित प्रतिमा को हटाने का निर्णय न केवल धार्मिक परंपराओं के विपरीत है, बल्कि श्रद्धालुओं की भावनाओं को भी गहरी चोट पहुंचाने वाला है। उन्होंने कहा कि यदि न्यायालय का उद्देश्य पूजा व्यवस्था को निर्बाध बनाए रखना था तो फिर ऐसी कौन सी परिस्थिति उत्पन्न हो गई कि गर्भगृह से प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति को हटाना आवश्यक समझा गया।

उन्होंने यह भी दावा किया कि अष्टधातु से निर्मित एक प्रतिमा पहले से उपलब्ध है और उसे भोजशाला में स्थापित करने की मांग भी की जा चुकी है। इसके बावजूद अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई। उल्टा, जो प्रतिमा स्थापित थी उसे भी हटा दिया गया। कुलदीप तिवारी के अनुसार यह निर्णय समझ से परे है और इससे यह प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर हिंदुओं को उनके आराध्य स्वरूप के समक्ष पूजा करने से क्यों वंचित रखा जा रहा है।

राष्ट्रीय सनातन महासंघ सहित अनेक हिंदू संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि यदि मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत लाने में समय लग रहा है तो तत्काल प्रभाव से किसी वैकल्पिक प्रतिमा की स्थापना की जानी चाहिए, जिससे पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान निर्बाध रूप से चलते रहें। संगठनों का कहना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े विषयों पर प्रशासनिक संवेदनशीलता अपेक्षित है, किंतु भोजशाला प्रकरण में इसके विपरीत स्थिति दिखाई दे रही है।

हिंदू संगठनों का आरोप है कि एएसआई का यह कदम न्यायालय के आदेश की मूल भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि जब न्यायालय ने पूजा-अर्चना के अधिकार को संरक्षण दिया है, तब गर्भगृह को प्रतिमा-विहीन बनाए रखना श्रद्धालुओं के अधिकारों और धार्मिक परंपराओं दोनों के साथ न्याय नहीं करता। संगठनों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यदि किसी अधिकारी ने न्यायालय की भावना, जनआस्था अथवा धार्मिक अधिकारों की उपेक्षा की है तो उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

हिंदू संगठनों ने स्पष्ट कहा है कि भोजशाला करोड़ों लोगों की श्रद्धा, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है। इसलिए मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा की वापसी तक वैकल्पिक प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की निरंतरता बनाए रखना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि आस्था से जुड़े इस विषय को अब और अधिक समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए तथा श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए शीघ्र समाधान निकाला जाना चाहिए।

शनिवार 06 जून को भोजशाला में भक्तों द्वारा विधि विधान से गर्भगृह में अष्टधातु से निर्मित एक मूर्ति स्थापित की गई थी, कुछ लोग इसे स्वयंभू मूर्ति भी बता रहे हैं, जिसे उसी दिन शाम को ASI के स्थानीय अधिकारियों द्वारा हटा दिया गया था।

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