मम भाषा संस्कृतम्’ का आह्वान—संस्कृत शिक्षकों, विद्यार्थियों और अनुरागियों से मातृभाषा अथवा द्वितीय भाषा के रूप में संस्कृत दर्ज कराने की अपील; 2011 के 24,821 के आंकड़े को बताया गया चिंता का विषय
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।जनगणना केवल जनसंख्या की गणना नहीं होती, वह देश की सामाजिक, भाषायी और सांस्कृतिक संरचना का आधिकारिक दस्तावेज भी तैयार करती है। इसी को आधार बनाकर संस्कृत से जुड़े शिक्षकों, विद्यार्थियों और अनुरागियों के बीच अब ‘मम भाषा संस्कृतम्’ अभियान को गति देने की अपील की जा रही है। अभियान का उद्देश्य है कि जनगणना के दौरान संस्कृत को अपनी भाषा के रूप में मानने वाले लोग इसे स्पष्ट रूप से दर्ज कराएं, ताकि देश में संस्कृत से जुड़े वास्तविक भाषायी आधार की तस्वीर आधिकारिक आंकड़ों में सामने आ सके।
अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन और इसके प्रति अनुराग रखने वाले लोगों की संख्या के बावजूद वर्ष 2011 की जनगणना में संस्कृत को अपनी मातृभाषा बताने वालों की संख्या केवल 24,821 दर्ज हुई थी। यही आंकड़ा अब संस्कृत जगत के लिए आत्ममंथन का विषय बना हुआ है। अभियान का तर्क है कि यदि संस्कृत से जुड़े लोग जनगणना में अपनी भाषायी पहचान दर्ज कराने के प्रति उदासीन रहे, तो आधिकारिक आंकड़े वास्तविक सामाजिक परिदृश्य की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे।
इस पहल के पीछे एक व्यापक आग्रह भी दिखाई देता है। संस्कृत शिक्षकों, छात्रों और भाषा-प्रेमियों से कहा जा रहा है कि वे स्वयं संस्कृत का उल्लेख करने के साथ अपने परिवारों और परिचितों को भी इस विषय में जागरूक करें। अभियान के आह्वान में विशेष रूप से कहा गया है कि मातृभाषा अथवा द्वितीय भाषा के रूप में संस्कृत का प्रयोग या अध्ययन करने वाले लोग जनगणना में अपनी भाषा संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से दर्ज कराएं।
अभियान से जुड़े अनुमान में सभी स्तरों के लगभग दो लाख संस्कृत शिक्षकों और उनके परिवारों को मिलाकर करीब आठ लाख, तीन करोड़ संस्कृत विद्यार्थियों और उनके परिवारों को मिलाकर लगभग 12 करोड़ तथा पांच लाख संस्कृत अनुरागियों और उनके परिवारों को मिलाकर करीब 20 लाख लोगों को इस प्रयास से जोड़ने का लक्ष्य बताया गया है। इन अनुमानों को जोड़ने पर कुल संख्या 12 करोड़ 28 लाख बैठती है। हालांकि ये आंकड़े अभियान की ओर से व्यक्त अनुमान और लक्ष्य हैं, इन्हें जनगणना के आधिकारिक आंकड़े के रूप में नहीं देखा जा सकता।
संस्कृत के समर्थकों का मानना है कि किसी भाषा की वास्तविक सामाजिक उपस्थिति का आकलन करने में जनगणना के आंकड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भाषा से संबंधित सरकारी नीतियों, संस्थागत योजनाओं और संसाधनों के निर्धारण में आधिकारिक आंकड़े आधारभूत संदर्भ प्रदान करते हैं। ऐसे में संस्कृत के अध्ययन और प्रयोग से जुड़े लोगों के बीच यह भावना मजबूत हो रही है कि जनगणना में अपनी भाषायी पहचान दर्ज कराना केवल व्यक्तिगत सूचना देने का विषय नहीं, बल्कि भाषा के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।
इसी संदर्भ में अभियान के संदेश में सांसद दयानिधि मारन जैसे नेताओं द्वारा संसद में संस्कृत को लेकर व्यक्त की गई आपत्तियों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि राजनीतिक वक्तव्यों और भाषायी आंकड़ों को अलग-अलग संदर्भों में देखना आवश्यक है, लेकिन संस्कृत समर्थक इस बहस को भाषा की सार्वजनिक स्वीकार्यता और उसके आधिकारिक आंकड़ों से जोड़कर देख रहे हैं।
‘मम भाषा संस्कृतम्’ का संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जनगणना में दर्ज होने वाली प्रत्येक भाषायी पहचान भविष्य के लिए एक आधिकारिक सांख्यिकीय दस्तावेज का हिस्सा बनती है। संस्कृत के समर्थकों के सामने अब चुनौती केवल अभियान चलाने की नहीं, बल्कि व्यापक समाज तक यह संदेश पहुंचाने की है कि भाषा के प्रति अनुराग को जनगणना के आधिकारिक अभिलेख में भी अभिव्यक्त किया जाए।
अभियान की अपील स्पष्ट है—संस्कृत के अध्ययन, अध्यापन अथवा अनुराग से जुड़े लोग इस विषय को गंभीरता से लें और जनगणना के दौरान अपनी भाषायी जानकारी सही ढंग से दर्ज कराएं। इसके पीछे मूल भावना यही है कि आने वाली पीढ़ियां संस्कृत की स्थिति को केवल दावों और धारणाओं से नहीं, बल्कि देश के आधिकारिक आंकड़ों के माध्यम से भी समझ सकें।