प्रमुख सचिवों की नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति और सेवा-विस्तार पर उठे सवालों के बीच स्वतंत्र जांच की मांग; भर्ती प्रक्रिया से लेकर वित्तीय लाभों तक पिछले 10–15 वर्षों के अभिलेखों की पड़ताल का प्रस्ताव
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के विरुद्ध सरकार की कार्रवाई तभी व्यापक विश्वसनीयता अर्जित कर सकती है, जब जांच का दायरा उन संस्थानों तक भी पहुंचे, जहां कानून बनाए जाते हैं और लोकतांत्रिक जवाबदेही की व्यवस्था निर्धारित होती है। मेडिकल कॉलेजों में नियुक्तियों और कथित अनियमितताओं की जांच के बीच अब विधानमंडल सचिवालयों में प्रमुख सचिवों की नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति, सेवा-विस्तार तथा भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता से जुड़े सवालों पर भी स्वतंत्र और निष्पक्ष पड़ताल की मांग उठ रही है। प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रशासनिक निर्णय भी कानून और निर्धारित सेवा-नियमों की कसौटी पर परखे जाएं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर जुलाई 2026 तक प्रदीप कुमार दुबे का नाम प्रमुख सचिव के रूप में दर्ज होने का उल्लेख किया गया है। उनकी नियुक्ति और सेवा-विस्तार को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में चुनौती दिए जाने का मामला भी सामने आया है। दूसरी ओर, विधान परिषद की आधिकारिक वेबसाइट पर डॉ. राजेश सिंह प्रमुख सचिव के रूप में दर्ज हैं। इन तथ्यों के आलोक में नियुक्तियों के वैधानिक आधार, संबंधित आदेशों और लागू सेवा-नियमों की स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है। हालांकि, किसी नियुक्ति को न्यायालय में चुनौती दिया जाना अपने आप में अनियमितता या दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है; निर्णायक महत्व संबंधित अभिलेखों, नियमों और सक्षम प्राधिकारियों के निर्णयों का होगा।
यहीं से जवाबदेही का प्रश्न और व्यापक हो जाता है। यदि किसी पद पर नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति अथवा सेवा-विस्तार को लेकर विवाद उत्पन्न होता है, तो उसका परीक्षण केवल प्रशासनिक स्पष्टीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि नियुक्ति किस वैधानिक प्रावधान के अंतर्गत की गई, निर्णय लेने के लिए कौन-सा प्राधिकारी सक्षम था और निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। विधानमंडल सचिवालयों की संस्थागत गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि इन प्रश्नों के उत्तर दस्तावेजों और नियमों के आधार पर सामने आएं।
इसी संदर्भ में विधानसभा, विधान परिषद और संसदीय कार्य विभाग में पिछले वर्षों के प्रमुख सचिव स्तर के पदों पर हुई नियुक्तियों, पुनर्नियुक्तियों तथा सेवा-विस्तार की स्वतंत्र जांच की मांग प्रासंगिक हो जाती है। जांच के दायरे में संबंधित आदेशों की वैधानिकता, सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और इन निर्णयों से जुड़े वेतन अथवा अन्य वित्तीय लाभों का परीक्षण शामिल किया जा सकता है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग पर भी विचार हो सकता है, बशर्ते उसकी अधिकारिता, आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया और संबंधित अनुमतियों की शर्तें पूरी हों।
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भर्ती प्रक्रिया है। यदि विज्ञापित पदों की तुलना में अधिक नियुक्तियां किए जाने, प्रतीक्षा सूची के उपयोग, प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता, चयन प्रक्रिया अथवा कथित भाई-भतीजावाद को लेकर शिकायतें हैं, तो प्रत्येक आरोप का अलग-अलग साक्ष्य आधारित परीक्षण होना चाहिए। इसके लिए विशेष कार्यबल (एसटीएफ) अथवा राज्य की किसी सक्षम स्वतंत्र जांच एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपने का प्रस्ताव विचारणीय है। जांच का आधार आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्य होने चाहिए, न कि केवल आशंकाएं या सार्वजनिक चर्चाएं।
इसके साथ ही, एक उच्चस्तरीय समीक्षा समिति गठित करने का विकल्प भी सामने आता है, जिसमें सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी तथा वित्त, लेखा और सेवा-नियमों के विशेषज्ञ शामिल हों। समिति पिछले 10 से 15 वर्षों में हुई नियुक्तियों, पुनर्नियुक्तियों और सेवा-विस्तार के मामलों का अभिलेखीय परीक्षण कर सके। उसका कार्य केवल प्रक्रियागत कमियां गिनाना नहीं, बल्कि यह निर्धारित करना भी हो कि किन मामलों में नियमों का पालन हुआ, कहां स्पष्टीकरण आवश्यक है और किन प्रकरणों में प्रथमदृष्टया अनियमितता मिलने पर सक्षम एजेंसी से आगे की जांच कराई जानी चाहिए।
पारदर्शिता की दिशा में पहला व्यावहारिक कदम संबंधित दस्तावेजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना होगा। प्रमुख सचिवों के मूल नियुक्ति आदेश, नियुक्ति का वैधानिक आधार, सेवानिवृत्ति संबंधी आदेश, पुनर्नियुक्ति अथवा सेवा-विस्तार की स्वीकृतियां, सक्षम प्राधिकारी के निर्णय, वेतन और अन्य वित्तीय लाभों का विवरण तथा लागू नियमों एवं संशोधनों की जानकारी नियमानुसार सार्वजनिक की जा सकती है। जिन अभिलेखों के प्रकटीकरण पर कोई वैधानिक प्रतिबंध लागू न हो, उन्हें सुलभ कराए जाने से अनावश्यक संदेह दूर होंगे और प्रशासनिक निर्णयों की वस्तुनिष्ठ समीक्षा का मार्ग खुलेगा।
विधानसभा और विधान परिषद की भर्ती प्रक्रियाओं का विशेष ऑडिट भी इसी व्यापक समीक्षा का हिस्सा होना चाहिए। विज्ञापित पदों की संख्या, चयनित अभ्यर्थियों, वास्तविक नियुक्तियों और प्रतीक्षा सूची से हुई नियुक्तियों का परस्पर मिलान किया जाए। यदि निर्धारित संख्या से अधिक नियुक्तियां हुई हों, तो प्रत्येक मामले में संबंधित नियम, स्वीकृत पदों की स्थिति और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की जांच हो। इससे तथ्य और आरोप के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया जा सकेगा।
इस पूरे विषय का केंद्रीय प्रश्न किसी संस्था की छवि को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता को अभिलेखीय पारदर्शिता के माध्यम से मजबूत करना है। विधानमंडल लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है; इसलिए उसके सचिवालयों में नियुक्ति और सेवा-संबंधी निर्णयों की जांच भी निष्पक्ष, स्वतंत्र और विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। जहां निर्णय नियमों के अनुरूप हों, वहां दस्तावेज संदेह दूर करेंगे; जहां कमियां मिलें, वहां उत्तरदायित्व निर्धारित करने का आधार तैयार होगा।
अब अपेक्षा यही है कि सरकार इन सवालों पर स्पष्ट रुख अपनाए और शिकायतों तथा उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर उचित जांच-तंत्र निर्धारित करे। स्वतंत्र परीक्षण का उद्देश्य पहले से किसी को दोषी मान लेना नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने लाना और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय करना होना चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा केवल उनके अधिकारों से नहीं, बल्कि उनके भीतर होने वाले निर्णयों की पारदर्शिता और कानून के प्रति समान प्रतिबद्धता से भी सुनिश्चित होती है।