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“सनातन की ध्वजा तले सियासत का समर्पण : अखिलेश यादव ने संत परंपरा के चरणों में झुकाकर कहा — ‘संतों के मार्गदर्शन से ही आगे बढ़ेगी हमारी राजनीति’”

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Dainik India News

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“सनातन की ध्वजा तले सियासत का समर्पण : अखिलेश यादव ने संत परंपरा के चरणों में झुकाकर कहा — ‘संतों के मार्गदर्शन से ही आगे बढ़ेगी हमारी राजनीति’”

जगतगुरु आचार्य देवमुरारी बापू के समक्ष राष्ट्रधर्म, सनातन चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर हुआ ऐतिहासिक वैचारिक महामंथन

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दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में उस समय एक विलक्षण एवं युगांतकारी दृश्य उपस्थित हुआ, जब सनातन संस्कृति के दिव्य अधिष्ठाता, वैदिक दर्शन के प्रखर उद्भाषक, धर्मतत्त्व के परम मर्मज्ञ एवं राष्ट्रचेतना के ओजस्वी संवाहक सनातन शिरोमणि स्वामी देवमुरारी बापू जगद्गुरु अवधेश प्रपन्नाचार्य महाराज के समक्ष समाजवादी चिंतनधारा के प्रमुख नेता एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आत्मीय संवाद करते हुए सनातन मूल्यों, संत परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना पर गंभीर वैचारिक विमर्श किया।

यह केवल एक भेंट नहीं थी, बल्कि उस सनातन चेतना का उद्घोष था, जिसने युगों से भारतभूमि को धर्म, मर्यादा, करुणा और लोकमंगल का पथ दिखाया है। वातावरण में आध्यात्मिक तेज, सांस्कृतिक गंभीरता और राष्ट्रहित की दिव्य अनुभूति स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। पूज्य महाराजश्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि सनातन किसी एक पंथ अथवा समुदाय का सीमित विचार नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता को सत्य, संयम, सहिष्णुता, मातृ-पितृ वंदन, नारी गरिमा, गौ संरक्षण और राष्ट्रनिष्ठा का मार्ग दिखाने वाला सार्वभौमिक जीवनदर्शन है।

मीडिया को संबोधित करते हुए पूज्य जगतगुरु आचार्य देव मुरारी बापू ने अत्यंत स्पष्ट और ओजस्वी शब्दों में कहा कि वह समस्त साधु-संत समाज का सम्मान करेंगे तथा संतों से प्राप्त मार्गदर्शन को ही अपने सार्वजनिक एवं राजनीतिक जीवन की मूलाधार शक्ति बनाएंगे। उन्होंने कहा कि धर्मविहीन राजनीति कभी भी राष्ट्र का कल्याण नहीं कर सकती, क्योंकि राजनीति तभी पवित्र होती है जब उसके केंद्र में लोकमंगल, सेवा और राष्ट्रधर्म का भाव विद्यमान हो।

पूज्य संत के इन राष्ट्रोद्धारक विचारों को अत्यंत श्रद्धाभाव से श्रवण करते हुए Akhilesh Yadav ने उन्हें अंगवस्त्र अर्पित कर सम्मानित किया तथा कहा कि सनातन भारत की आत्मा है और संत समाज सदैव राष्ट्र को दिशा देने का कार्य करता आया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि समाज को जोड़ने वाली प्रत्येक सकारात्मक चेतना राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला होती है तथा भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी समरसता, सहिष्णुता और आध्यात्मिक उदारता में निहित है।

इसी क्रम में पूज्य महाराजश्री ने विगत दिनों समाजवादी पार्टी से पार्षद प्रत्याशी एवं अवध वार एसोसिएशन के महासचिव ललित किशोर तिवारी को भी शुभाशंसाएँ अर्पित करते हुए उनके उज्ज्वल, जनोन्मुखी एवं यशस्वी भविष्य की मंगलकामना की। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति समाजहित को अपना धर्म मानकर जनसेवा के पथ पर अग्रसर होता है, वही अंततः जनमानस के हृदय में स्थायी स्थान प्राप्त करता है।

संवाद के दौरान राष्ट्र, समाज और युवा पीढ़ी की सांस्कृतिक दिशा को लेकर भी गंभीर मंथन हुआ। पूज्य महाराजश्री ने कहा कि यदि भारत को पुनः विश्वगुरु के सिंहासन पर प्रतिष्ठित करना है, तो केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए युवा शक्ति के भीतर संस्कार, अनुशासन, संयम, सेवा, राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मिक चेतना का जागरण अनिवार्य होगा। उन्होंने कहा कि जिस राष्ट्र की युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विमुख हो जाती है, उसका भविष्य धीरे-धीरे अंधकारमय होने लगता है।

यह ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक मिलन वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के लिए केवल एक संवाद नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और राष्ट्रचेतना के पुनर्जागरण का प्रचंड उद्घोष बन गया। यह दृश्य मानो स्वयं घोषणा कर रहा था कि जब अध्यात्म राजनीति का पथप्रदर्शक बनता है, तब राष्ट्र केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अमर हो जाता है।

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