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ऊर्जा विभाग या जनविश्वास का क्षरण? बार-बार नियामक आयोग के हस्तक्षेप से उठता गंभीर प्रश्न—आख़िर उत्तर प्रदेश की विद्युत व्यवस्था किसके निर्देशों पर संचालित हो रही है?

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Dainik India News

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ऊर्जा विभाग या जनविश्वास का क्षरण? बार-बार नियामक आयोग के हस्तक्षेप से उठता गंभीर प्रश्न—आख़िर उत्तर प्रदेश की विद्युत व्यवस्था किसके निर्देशों पर संचालित हो रही है?

यदि प्रत्येक विवादित निर्णय के उपरांत नियामक आयोग को हस्तक्षेप करना पड़े, मीडिया को जनपक्ष में आवाज़ उठानी पड़े और अंततः विभाग अपने ही आदेशों से पीछे हट जाए, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि सुशासन की मूल अवधारणा के समक्ष उपस्थित एक गंभीर संस्थागत चुनौती है।

हरिंद्र सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में किसी भी सरकार की वास्तविक शक्ति उसके आदेशों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में निहित होती है। विश्वास तब जन्म लेता है जब शासन का प्रत्येक अंग स्वयं को जनता का संरक्षक समझे, न कि जनता पर भार आरोपित करने वाला तंत्र। किंतु जब किसी विभाग के निर्णय बार-बार विवादों के केंद्र में आएँ, जब वैधानिक नियामक संस्था को बार-बार हस्तक्षेप कर उपभोक्ताओं को राहत दिलानी पड़े, जब मीडिया द्वारा उठाए गए प्रश्न समय के साथ सत्य सिद्ध होने लगें और अंततः वही विभाग अपने निर्णयों से पीछे हटने के लिए विवश दिखाई दे, तब यह केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि शासन-दर्शन पर पुनर्विचार का विषय बन जाती है।

उत्तर प्रदेश का ऊर्जा विभाग विगत कुछ समय से ठीक इसी प्रकार की परिस्थितियों के कारण व्यापक जनचर्चा का विषय बना हुआ है।

दैनिक इंडिया न्यूज़ ने समय-समय पर जिन प्रश्नों को उठाया, उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति, मंत्री अथवा अधिकारी की आलोचना करना नहीं था। पत्रकारिता का धर्म सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता को सत्य का दर्पण दिखाना है। यदि दर्पण में प्रतिबिंब विकृत दिखाई दे तो दोष दर्पण का नहीं, प्रतिबिंब का होता है। इसलिए जब बिजली खरीद की वास्तविक लागत और उपभोक्ताओं से वसूले जा रहे अधिभार के बीच असंगति के प्रश्न सामने आए, तब उनका उठाया जाना पत्रकारिता का दायित्व था। बाद की घटनाओं ने यह संकेत दिया कि विषय सामान्य नहीं था। नियामक आयोग के हस्तक्षेप के बाद विभाग को अपनी कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार करना पड़ा।

इसके पश्चात स्मार्ट मीटर का प्रश्न सामने आया। आधुनिक तकनीक का विरोध किसी ने नहीं किया, किंतु तकनीक तब तक लोकहितकारी नहीं कहलाती जब तक उसमें मानवीय संवेदनाएँ सुरक्षित न हों। परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थी, ऑक्सीजन अथवा अन्य चिकित्सीय उपकरणों पर निर्भर रोगी, नवजात शिशु, वृद्धजन—यदि रिचार्ज समाप्त होने पर अंधकार में छोड़ दिए जाएँ, तो तकनीकी उत्कृष्टता का क्या औचित्य रह जाता है? इसी मानवीय प्रश्न ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया। धीरे-धीरे वही विषय नियामक आयोग तक पहुँचा और अंततः विभाग को उपभोक्ता हितों के अनुरूप अपने रुख में परिवर्तन करना पड़ा।

अब ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार का विषय भी उसी श्रृंखला का नवीन अध्याय बनता दिखाई दे रहा है। जून के बिलों में अतिरिक्त भार जोड़ा गया। उपभोक्ताओं ने आपत्ति की। उपभोक्ता संगठनों ने प्रश्न उठाए। नियामक आयोग ने स्पष्ट किया कि वास्तविक मासिक व्यय के अतिरिक्त किसी प्रकार का मनमाना भार उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता। अब संकेत मिल रहे हैं कि जुलाई में उपभोक्ताओं को उल्लेखनीय राहत प्राप्त हो सकती है।

यह राहत स्वागतयोग्य है, परंतु उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि यदि नियामक आयोग हस्तक्षेप न करता तो क्या यही भार उपभोक्ताओं पर निरंतर आरोपित रहता?

यही वह प्रश्न है जो शासन के उच्चतम स्तर तक पहुँचना चाहिए।

लोकतंत्र में सबसे अधिक भयावह स्थिति वह नहीं होती जब कोई निर्णय गलत हो जाए; बल्कि वह होती है जब गलत निर्णय को तब तक सही सिद्ध करने का प्रयास किया जाए, जब तक कोई संवैधानिक संस्था उसे रोक न दे।

यदि प्रत्येक विवाद में अंतिम आशा नियामक आयोग ही बने, तो विभागीय आत्मनियंत्रण की प्रासंगिकता कहाँ शेष रह जाती है?

यह संपादकीय सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि सरकार को एक गंभीर चेतावनी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कार्यकाल में प्रशासनिक अनुशासन, भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोरता तथा जनकल्याणकारी शासन की जो छवि स्थापित की है, वह किसी एक विभाग की कार्यप्रणाली से धूमिल नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री की राजनीतिक पूँजी जनता का विश्वास है। यदि किसी विभाग की नीतियों के कारण वही विश्वास क्षीण होने लगे तो उसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव अंततः सरकार पर ही पड़ता है।

आज देश के अनेक राज्यों में चुनावी वर्ष आते ही बिजली उपभोक्ताओं को राहत देने की घोषणाएँ होती हैं। कहीं निःशुल्क यूनिट, कहीं सब्सिडी, कहीं बिलों में छूट। दूसरी ओर यदि उत्तर प्रदेश का सामान्य नागरिक बिजली बिल खोलते समय भय का अनुभव करे, यदि प्रत्येक माह किसी नए अधिभार की आशंका उसे सताए, यदि नया कनेक्शन लेने के लिए विकास शुल्क, प्रक्रिया और व्याख्याओं के जाल में उलझना पड़े, तो यह स्थिति जनसंतोष का नहीं, जनाक्रोश का कारण बन सकती है।

ग्रामीण क्षेत्रों से प्राप्त अनेक शिकायतें भी गंभीर परीक्षण की अपेक्षा रखती हैं। विकास शुल्क के नाम पर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग दरों की चर्चाएँ, नए कनेक्शनों की जटिल प्रक्रिया तथा नियमों की भिन्न-भिन्न व्याख्या जैसी बातें प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न अंकित करती हैं। यदि व्यवस्था पूर्णतः निष्पक्ष है तो उसे सार्वजनिक रूप से प्रमाणित किया जाना चाहिए, और यदि कहीं अनियमितता है तो उसका उन्मूलन शासन का नैतिक दायित्व है।

ऊर्जा विभाग को यह स्मरण रखना चाहिए कि बिजली केवल राजस्व का स्रोत नहीं है। यह विद्यार्थी के भविष्य का प्रकाश है, किसान की सिंचाई का आधार है, उद्योग की उत्पादकता का प्राण है, चिकित्सालय की जीवनरेखा है, गृहस्थी की अनिवार्यता है और आधुनिक अर्थव्यवस्था की धड़कन है। जिस विभाग के निर्णय करोड़ों नागरिकों के दैनिक जीवन को प्रभावित करते हों, उसकी प्रत्येक नीति में संवेदनशीलता सर्वोच्च स्थान पर होनी चाहिए।

यह भी विचारणीय है कि जब-जब जनसरोकारों से जुड़े प्रश्न उठे, तब-तब विभाग की प्रारंभिक प्रतिक्रिया प्रायः स्पष्टीकरण देने की रही; समाधान प्रस्तुत करने की नहीं। स्वस्थ प्रशासन वही है जो आलोचना को विरोध नहीं, सुधार का अवसर माने।

लोकतंत्र में मीडिया का कार्य सरकार को अस्थिर करना नहीं, बल्कि उसे समय रहते सचेत करना है। यदि समय पर व्यक्त की गई आशंकाएँ बाद में वास्तविकता का रूप लेने लगें, तो उन प्रश्नों को दुर्भावना से नहीं, दूरदर्शिता से देखा जाना चाहिए।

2027 अभी कैलेंडर पर दूर प्रतीत होता है, किंतु जनमानस का निर्णय पाँच वर्ष के अंतिम महीने में नहीं बनता; वह प्रतिदिन बनता है। प्रत्येक बिजली बिल, प्रत्येक शिकायत, प्रत्येक अनसुनी आवाज़ और प्रत्येक राहत उसी निर्णय का एक सूक्ष्म अध्याय लिखती है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रणाली की निष्पक्ष समीक्षा की है। अधिभार निर्धारण की प्रक्रिया, बिजली खरीद की पारदर्शिता, स्मार्ट मीटर नीति, नए कनेक्शन की व्यवस्था, विकास शुल्क का औचित्य, उपभोक्ता शिकायत निवारण तंत्र तथा विभागीय जवाबदेही—इन सभी विषयों की उच्चस्तरीय समीक्षा समय की मांग है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रदेश की जनता की अपेक्षा केवल इतनी है कि जिस प्रकार उन्होंने अन्य अनेक विभागों में कठोर प्रशासनिक अनुशासन स्थापित किया, उसी प्रकार ऊर्जा विभाग में भी पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और उपभोक्ता-केंद्रित कार्यसंस्कृति सुनिश्चित करें। क्योंकि एक सक्षम सरकार का उद्देश्य केवल योजनाएँ बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक न्यायपूर्ण ढंग से पहुँचे।

अंततः यह संपादकीय किसी राजनीतिक लाभ या हानि का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि जनविश्वास की रक्षा का विनम्र आग्रह है। सरकार और जनता परस्पर विरोधी पक्ष नहीं हैं; दोनों एक-दूसरे की शक्ति हैं। यदि जनता संतुष्ट होगी तो सरकार सशक्त होगी, और यदि जनता पीड़ित होगी तो किसी भी उपलब्धि का राजनीतिक या प्रशासनिक मूल्य स्वतः क्षीण हो जाएगा।

अब समय आ गया है कि ऊर्जा विभाग आत्ममंथन करे, शासन आत्मसमीक्षा करे और व्यवस्था यह सिद्ध करे कि उत्तर प्रदेश में विद्युत केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जनकल्याण का संकल्प है। क्योंकि अंततः इतिहास वही शासन याद रखता है जिसने अंधकार को अवसर नहीं, बल्कि प्रकाश को अधिकार माना।

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