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नॉर्मल ईसीजी के बावजूद हार्ट अटैक से मृत्यु

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Dainik India News

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नॉर्मल ईसीजी के बावजूद हार्ट अटैक से मृत्यु

नागपुर के प्रख्यात न्यूरोसर्जन के आकस्मिक निधन ने चिकित्सा जगत को झकझोरा


दैनिक इंडिया न्यूज ,नागपुर।नागपुर से सामने आई यह घटना न केवल हृदयविदारक है, बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए भी गहन आत्ममंथन का विषय बनकर उभरी है। शहर के विख्यात एवं अनुभवी न्यूरोसर्जन डॉ. चंद्रशेखर पाखमोडे का 31 दिसंबर की प्रातः लगभग 6 बजे, 53 वर्ष की आयु में, अचानक आए तीव्र हृदयाघात (Acute Myocardial Infarction) से निधन हो गया। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि महज तीन दिन पूर्व कराई गई उनकी ईसीजी (Electrocardiogram) जांच पूर्णतः सामान्य पाई गई थी।


परिजनों के अनुसार, 31 दिसंबर की सुबह डॉ. पाखमोडे अचानक घर में अचेत होकर गिर पड़े। उन्हें तत्काल नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों की टीम ने कार्डियोपल्मोनरी रेससिटेशन सहित तमाम जीवनरक्षक प्रयास किए, किंतु उन्हें बचाया नहीं जा सका। यह घटना दर्शाती है कि कभी-कभी हृदय संबंधी गंभीर विकार साइलेंट रूप में विकसित होते हैं और पारंपरिक प्रारंभिक जांचों में उनका पूर्वानुमान नहीं लग पाता।


डॉ. चंद्रशेखर पाखमोडे नागपुर ही नहीं, बल्कि पूरे विदर्भ क्षेत्र में एक कुशल, समर्पित और संवेदनशील न्यूरोसर्जन के रूप में प्रतिष्ठित थे। उनके आकस्मिक निधन से न केवल उनका परिवार, बल्कि संपूर्ण चिकित्सा समुदाय स्तब्ध और शोकाकुल है। चिकित्सक वर्ग इसे “रेड फ्लैग इवेंट” मानते हुए हृदय रोगों की वर्तमान प्रवृत्तियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता जता रहा है।


विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड-19 महामारी के बाद हृदयाघात की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है। पोस्ट-कोविड सिंड्रोम, माइक्रोथ्रॉम्बोसिस, इन्फ्लेमेटरी रिस्पॉन्स, ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम में असंतुलन और अचानक कार्डियक अरेस्ट जैसे कारक अब गंभीर शोध का विषय बन चुके हैं। यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि कोविड संक्रमण या उसके बाद उत्पन्न दीर्घकालिक प्रभाव (Long COVID Effects) हृदय की धमनियों और विद्युत प्रणाली पर मौन लेकिन घातक असर डाल रहे हैं।


चिकित्सा विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि अब केवल ईसीजी या सामान्य जांचों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। कार्डियक मार्कर्स, सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी, स्ट्रेस टेस्ट, इकोकार्डियोग्राफी तथा जीवनशैली मूल्यांकन जैसे समग्र परीक्षणों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, विशेषकर 40 वर्ष की आयु के बाद।


डॉ. पाखमोडे का निधन समाज के लिए एक कठोर चेतावनी है कि स्वास्थ्य को लेकर किसी भी प्रकार की आत्मसंतुष्टि घातक सिद्ध हो सकती है। यह घटना न केवल शोक की, बल्कि जागरूकता, सतर्कता और वैज्ञानिक पुनःशोध की भी मांग करती है। कोविड के बाद बदलते स्वास्थ्य परिदृश्य में हृदय रोगों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर नए अध्ययन और गाइडलाइंस समय की अनिवार्यता बन चुकी हैं।


यह खबर केवल एक व्यक्ति के निधन की नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी की घंटी है—कि जीवन की धड़कन कब मौन हो जाए, इसका अनुमान सामान्य रिपोर्टें भी नहीं लगा पातीं।

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