क्या गंगाजल में ऐसा क्या है कि स्वयं तुलसीदास, वाल्मीकि और पुराणों ने उसे मोक्ष का सेतु कहा?
हरिंद्र कुमार सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ 17 जुलाई 2026 नई दिल्ली।यदि किसी भारतीय से यह पूछा जाए कि संसार का सबसे पवित्र जल कौन-सा है, तो उसका सहज उत्तर होगा—गंगाजल। किंतु क्या यह श्रद्धा केवल परंपरा का परिणाम है, या इसके पीछे हजारों वर्षों की आध्यात्मिक अनुभूति, शास्त्रीय प्रमाण और सांस्कृतिक चेतना भी विद्यमान है? यही प्रश्न हमें उन महर्षियों और भक्तों की ओर ले जाता है, जिन्होंने गंगा को केवल नदी नहीं, बल्कि जीवन, धर्म और मोक्ष की अविरल धारा माना। जब आधुनिक विज्ञान किसी वस्तु के गुणों को प्रयोगशाला में खोजता है, तब भारतीय ऋषियों ने गंगा के आध्यात्मिक प्रभाव का अनुभव तप, साधना और आत्मानुभूति के माध्यम से किया। इसी कारण गंगा भारतीय मानस में जलधारा नहीं, बल्कि माँ बनकर प्रतिष्ठित हुई।
गंगा की पवित्रता का रहस्य समझने के लिए हमें गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों की ओर लौटना होगा। श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड (प्रथम सोपान, चौपाई 69) में वे एक ऐसा उदाहरण देते हैं, जो पहली दृष्टि में सामान्य प्रतीत होता है, परंतु उसके भीतर गहन दर्शन छिपा है—
«सुरसरि जल कृत बारुनि जाना।
कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें।
ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥»
तुलसीदास कहते हैं कि यदि गंगाजल से मदिरा बनाई जाए तो संत उसका सेवन नहीं करेंगे, क्योंकि पवित्र साधन का उपयोग अपवित्र उद्देश्य के लिए हुआ है। किंतु वही पदार्थ पुनः गंगा में मिल जाए तो गंगा की पवित्रता उसे अपने भीतर समाहित कर लेती है। यह केवल जल का वर्णन नहीं, बल्कि ईश्वर और जीव के संबंध का अद्भुत आध्यात्मिक रूपक है। यहाँ गंगा शुद्धता की उस परम शक्ति का प्रतीक बन जाती है, जो अपने संपर्क में आने वाली प्रत्येक वस्तु को पावन करने का सामर्थ्य रखती है।
तुलसीदास का यह कथन किसी एक कवि की भावुक कल्पना नहीं है। इससे हजारों वर्ष पूर्व महर्षि वाल्मीकि ने भी गंगा को दिव्य स्वरूप में चित्रित किया। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड (भागीरथ और गंगावतरण प्रसंग, सर्ग 42–44, संस्करणानुसार) में वर्णित है कि महाराज भागीरथ के कठोर तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर अवतरित होने का आदेश दिया, किंतु उनकी प्रचंड धारा को धारण करने का सामर्थ्य केवल भगवान शिव में था। इसलिए गंगा पहले शिव की जटाओं में अवतरित हुईं और फिर पृथ्वी पर प्रवाहित हुईं। इस कथा का संदेश स्पष्ट है—गंगा केवल हिमालय से निकली नदी नहीं, बल्कि ब्रह्मा की आज्ञा, शिव की करुणा और भागीरथ के तप का दिव्य संगम हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति उन्हें "भागीरथी", "त्रिपथगा" और "विष्णुपदी" जैसे सम्मानसूचक नामों से पुकारती है।
यदि कोई यह माने कि गंगा की महिमा केवल रामायण तक सीमित है, तो पुराण उसके इस भ्रम का तत्काल निवारण कर देते हैं। स्कन्दपुराण के काशीखण्ड (गंगामाहात्म्य) में कहा गया है—
«गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥»
अर्थात जो व्यक्ति सैकड़ों योजन दूर रहकर भी श्रद्धा से "गंगा-गंगा" का स्मरण करता है, वह भी पापों से मुक्त होकर परम गति प्राप्त करता है। यह कथन केवल भौगोलिक दूरी की चर्चा नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि श्रद्धा की दूरी कभी ईश्वर तक पहुँचने में बाधक नहीं होती। जहाँ निष्कपट विश्वास है, वहाँ गंगा स्वयं पहुँच जाती हैं।
गंगा की महिमा का विस्तार यहीं समाप्त नहीं होता। पद्मपुराण के उत्तरखण्ड स्थित गंगामाहात्म्य में गंगा के दर्शन, स्पर्श, स्नान और आचमन को महान पुण्यदायक बताया गया है। वहीं गरुड़पुराण के प्रेतकल्प में वर्णित है कि जीवन की अंतिम बेला में गंगाजल का आचमन या उसका स्पर्श जीव की सद्गति का कारण बनता है। यही कारण है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक के सोलह संस्कारों में गंगाजल का विशेष स्थान है। गृहप्रवेश हो, यज्ञ हो, देवप्रतिष्ठा हो, विवाह हो अथवा अंतिम विदाई—हर शुभ और पवित्र कर्म में गंगाजल भारतीय जीवन का अभिन्न अंग बना रहता है।
इन सभी प्रमाणों को एक सूत्र में पिरोकर देखें तो एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य सामने आता है। शास्त्र कभी यह नहीं कहते कि केवल गंगाजल घर में रख लेने से मोक्ष मिल जाएगा। वे यह भी सिखाते हैं कि पवित्रता का वास्तविक आधार श्रद्धा, संयम, सदाचार और धर्ममय जीवन है। तुलसीदास ने मदिरा और गंगाजल का उदाहरण देकर इसी विवेक को स्थापित किया कि पवित्र वस्तु का सम्मान तभी सार्थक है, जब मनुष्य का आचरण भी पवित्र हो। गंगाजल बाहरी शुद्धि का साधन है, किंतु उसका वास्तविक उद्देश्य अंतःकरण की शुद्धि है।
आज जब गंगा करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र हैं, तब यह प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा होता है कि क्या केवल पूजा कर देना पर्याप्त है? यदि हम गंगा को माँ कहते हैं, तो क्या उन्हें प्रदूषित करना हमारी धार्मिक चेतना के अनुरूप है? शास्त्रों ने जिस गंगा को मोक्षदायिनी कहा, उसे निर्मल और अविरल बनाए रखना भी उतना ही बड़ा धर्म है जितना उनका पूजन। यही आधुनिक भारत के लिए सनातन धर्म का सबसे प्रासंगिक संदेश है—गंगा की आरती तभी पूर्ण होगी, जब गंगा की धारा भी निर्मल रहेगी।