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जाने आप अपने भीतर क्या बो रहे हैं?

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 जाने आप अपने भीतर क्या बो रहे हैं?

दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली ।मनुष्य अपने जीवन में बाहर की घटनाओं को बहुत गंभीरता से लेता है, लेकिन अपने भीतर चलने वाली आवाज को उतनी गंभीरता से नहीं सुनता। किसी ने कुछ कह दिया, कोई घटना घट गई, किसी ने विश्वास तोड़ दिया, किसी ने अपमान कर दिया, किसी काम में असफलता मिल गई—और हम उस घटना को अपने मन में बार-बार दोहराते रहते हैं। बाहर घटना एक बार घटती है, लेकिन भीतर हम उसे सैकड़ों बार जीते हैं। यही वह स्थान है जहाँ भारतीय दर्शन का एक बहुत गहरा रहस्य और आधुनिक मस्तिष्क-विज्ञान की एक महत्वपूर्ण खोज एक-दूसरे के निकट दिखाई पड़ती हैं। हमारे ऋषियों ने मन को केवल विचारों का घर नहीं माना; उन्होंने उसे संकल्प की भूमि माना। आधुनिक विज्ञान भी अब यह अध्ययन कर रहा है कि बार-बार लौटने वाले विचार—विशेषकर नकारात्मक और चिंताजनक विचार—मस्तिष्क के उन नेटवर्कों से जुड़े होते हैं जो आत्म-संबंधी सोच, भावनात्मक प्रसंस्करण और ध्यान-नियमन में भाग लेते हैं।

छान्दोग्य उपनिषद् का एक अत्यंत गूढ़ वाक्य इस रहस्य की ओर संकेत करता है— “क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति…” अर्थात् मनुष्य अपने संकल्प और धारण किए हुए भाव के अनुरूप बनता जाता है। यह वाक्य केवल दर्शन का विषय नहीं है; यदि इसे जीवन में उतारकर देखा जाए तो मनुष्य अपने दुःखों के भीतर छिपे एक रहस्य को पहचान सकता है। कई बार हमें जितना दुख किसी घटना ने नहीं दिया होता, उससे कहीं अधिक दुख उस घटना के बारे में हमारे द्वारा बार-बार बनाए गए विचार देते हैं।

मान लीजिए किसी व्यक्ति का किसी अपने से विवाद हो गया। सामने वाले ने एक कठोर बात कह दी। बात वहीं समाप्त भी हो सकती थी, लेकिन मन ने उसे पकड़ लिया। वह व्यक्ति रात में उसी बात को सोचता रहा, अगले दिन फिर उसी बात को याद करता रहा, किसी तीसरे व्यक्ति को पूरी घटना सुनाई, फिर स्वयं से कहा—“उसने मेरे साथ ऐसा कैसे किया?” कुछ दिन बाद वही घटना उसके भीतर एक कहानी बन गई और कुछ समय बाद कहानी एक धारणा बन गई—“लोग भरोसे के लायक नहीं होते।” अब ध्यान दीजिए, घटना एक थी, लेकिन मन ने उसकी प्रतिलिपियाँ कितनी बना दीं। बाहर चोट एक बार लगी थी, भीतर वही चोट बार-बार दोहराई गई। आधुनिक मनोविज्ञान इस प्रकार की बार-बार लौटने वाली नकारात्मक सोच को repetitive negative thinking या rumination जैसे शब्दों से अध्ययन करता है। शोधों में इसका संबंध आत्म-संबंधी सोच और भावनात्मक नियंत्रण से जुड़े मस्तिष्कीय नेटवर्कों से पाया गया है, हालांकि विज्ञान अभी यह नहीं कहता कि किसी एक विचार से मस्तिष्क में कोई एक निश्चित संरचना उसी रूप में बन जाती है।

यही कारण है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में जप का इतना महत्त्व है। साधक किसी मंत्र को बार-बार क्यों दोहराता है? इसलिए नहीं कि ईश्वर को एक ही बात बार-बार बतानी पड़ती है। जप का गहरा रहस्य यह है कि साधक अपने चित्त को बार-बार एक ही पवित्र दिशा में ले जाता है।  वासुदेव श्रीकृष्ण कहते हैं— “यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि”—यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ। जप में शब्द की पुनरावृत्ति के साथ स्मरण की पुनरावृत्ति होती है, स्मरण के साथ भाव की पुनरावृत्ति होती है और भाव के साथ चेतना की दिशा पर काम होता है। आधुनिक विज्ञान भी ध्यान, आत्म-संबंधी विचार और मानसिक पुनरावृत्ति को मस्तिष्कीय नेटवर्कों के संदर्भ में अध्ययन करता है; इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि आध्यात्मिक साधना और आधुनिक न्यूरोसाइंस कुछ समान मानवीय प्रक्रियाओं को अलग-अलग भाषाओं में देखने का अवसर देते हैं—न कि यह कि विज्ञान ने मंत्र-जप के आध्यात्मिक फल को प्रमाणित कर दिया है।

अब जरा इसी रहस्य को अपने दैनिक जीवन पर रखकर देखिए। यदि कोई मनुष्य सुबह से रात तक कहता रहे—“मैं परेशान हूँ, मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है, मेरी जिंदगी खराब हो गई, कोई मुझे नहीं समझता, मेरे लिए कुछ अच्छा नहीं है”—तो वह केवल दुनिया को अपनी परेशानी नहीं बता रहा होता; वह स्वयं भी दिनभर वही सुन रहा होता है। उसके शब्द उसके अपने कानों तक लौट रहे हैं, उसकी स्मृति उन्हें फिर पकड़ रही है और उसका मन उन्हीं भावों के इर्द-गिर्द घूमता जा रहा है। संतों की भाषा में इसे इस रूपक से समझाया जा सकता है कि मनुष्य ब्रह्मांड में जो भाव छोड़ता है, वह अनेक गुना होकर उसके पास लौटता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे अधिक सावधानी से कहेंगे—बार-बार दोहराया गया विचार हमारी ध्यान-प्रवृत्ति, भावनात्मक प्रतिक्रिया और आत्म-संबंधी सोच के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। शोध में लगातार नकारात्मक सोच को ऐसे ही दोहराव वाले मानसिक पैटर्न के रूप में देखा गया है।

यही वह स्थान है जहाँ हमारे संतों का “वाणी को संभालो” वाला संदेश आज भी अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन अपने जीवन की हर घटना को असफलता, अपमान, भय और निराशा की भाषा में व्यक्त करता है, तो वह अपने ध्यान को उन्हीं अनुभवों की ओर बार-बार मोड़ सकता है। इसके विपरीत यदि वह वास्तविक कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए भी कहता है—“समस्या है, लेकिन समाधान खोजा जा सकता है; मुझसे भूल हुई है, लेकिन मैं सीख सकता हूँ; आज कठिन है, लेकिन मैं प्रयास नहीं छोड़ूँगा”—तो वह अपने मन को दूसरी दिशा में लगाने का अभ्यास कर रहा होता है। यह कोई जादुई नियम नहीं, बल्कि विचार, ध्यान, भावना और व्यवहार के बीच संबंध को समझने का व्यावहारिक तरीका है।

नकारात्मकता से बाहर निकलने का पहला कदम परिस्थितियों को बदलना नहीं, अपनी भाषा और अपने विचारों को देखना है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपनी पीड़ा से आँखें मूँद ले। दुख है तो दुख को स्वीकार कीजिए, असफलता है तो उसे स्वीकार कीजिए, संबंध में समस्या है तो समस्या को स्वीकार कीजिए; लेकिन उसके ऊपर निराशा की अंतिम मुहर मत लगाइए। “आज कठिनाई है” एक तथ्य हो सकता है, लेकिन “अब कुछ नहीं हो सकता” आवश्यक रूप से सत्य नहीं है। “मुझसे गलती हुई” आत्मबोध है, लेकिन “मैं ही बेकार हूँ” आत्म-विनाश की भाषा बन सकती है। “मेरे साथ अन्याय हुआ” एक अनुभव हो सकता है, लेकिन “अब मैं किसी पर कभी विश्वास नहीं करूँगा” उस अनुभव को जीवन का नियम बना देना है।

वेदान्त मनुष्य को इसी सूक्ष्म अंतर को पहचानने की शिक्षा देता है। विचार आया—उसे देखो। क्रोध आया—उसे देखो। भय आया—उसे देखो। निराशा आई—उसे भी देखो। हर विचार को अपना परिचय मत बना लो। आधुनिक संज्ञानात्मक विज्ञान भी यह समझने का प्रयास करता है कि मनुष्य अपने विचारों और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से किस प्रकार उलझता है और किस प्रकार उनसे ध्यान हटाकर अधिक अनुकूल मानसिक प्रक्रियाओं की ओर लौट सकता है। लगातार रूमिनेशन के संबंध में शोध यह संकेत देता है कि समस्या केवल “नकारात्मक विचार होना” नहीं, बल्कि उनसे बार-बार जुड़ते रहना और उनसे आसानी से ध्यान न हटा पाना भी है।

और फिर उसे अपने भीतर नए शब्द बोने चाहिए। “मैं समाप्त हो गया हूँ” के स्थान पर “मैं फिर प्रयास करूँगा।” “मेरे जीवन में कुछ अच्छा नहीं होगा” के स्थान पर “मैं आज से अपनी दिशा बदलूँगा।” “मेरे संबंध में कुछ नहीं बचा” के स्थान पर “जहाँ तक संभव होगा, मैं संवाद और समझ का रास्ता खोजूँगा।” “मैं अकेला हूँ” के स्थान पर “मैं सहायता माँग सकता हूँ, संबंधों को फिर से जोड़ सकता हूँ और अपने भीतर शक्ति खोज सकता हूँ।” ये शब्द कोई जादू नहीं हैं। केवल बोल देने से संसार नहीं बदल जाता। लेकिन वे मन को एक दूसरी दिशा में अभ्यास दे सकते हैं। यही कारण है कि आधुनिक मनोविज्ञान में भी विचारों के साथ काम करना मानसिक स्वास्थ्य के अनेक उपचारात्मक दृष्टिकोणों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भगवद्गीता ने वाणी को भी तप कहा है— “अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥” अर्थात् ऐसी वाणी जो उद्वेग उत्पन्न न करे, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, वही वाणी का तप है। कितना अद्भुत है कि हमारे शास्त्रों ने बोलने को भी तपस्या का विषय बना दिया। क्योंकि वे जानते थे कि शब्द केवल सामने वाले के हृदय को नहीं छूते, वे बोलने वाले के अपने अंतःकरण पर भी अपना प्रभाव छोड़ते हैं।

इसलिए आज से अपने शब्दों की रक्षा कीजिए। क्रोध में अपने बच्चे से यह मत कहिए—“तुमसे कुछ नहीं होगा।” अपने जीवनसाथी से बार-बार यह मत कहिए—“तुम कभी नहीं बदलोगे।” अपने आपसे भी यह मत कहिए—“मैं बदनसीब हूँ, मैं कमजोर हूँ, मैं कुछ नहीं कर सकता।” क्योंकि संसार चाहे आपकी बात माने या न माने, आपका अपना मन आपकी आवाज को लगातार सुन रहा है। और वैज्ञानिक अध्ययन हमें यह समझने में सहायता देते हैं कि लगातार दोहराई जाने वाली नकारात्मक सोच कोई निरापद मानसिक आदत मानकर छोड़ देने योग्य विषय नहीं है; इसका संबंध तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अनेक पैटर्नों से पाया गया है।

और यदि वाणी में इतनी शक्ति है कि हम अपने भीतर निराशा को बार-बार जगा सकते हैं, तो उसी वाणी में इतनी शक्ति क्यों न हो कि हम अपने भीतर विश्वास को बार-बार जगा सकें? जिस प्रकार साधक मंत्र का जप करके अपने चित्त को एक पवित्र भाव में स्थिर करने का प्रयास करता है, उसी प्रकार सामान्य मनुष्य भी अपने दैनिक जीवन में सत्य, कृतज्ञता, करुणा, धैर्य और पुरुषार्थ की भाषा का अभ्यास कर सकता है। विज्ञान इस बात को किसी “ब्रह्मांडीय ऊर्जा” के नियम के रूप में प्रमाणित नहीं करता, लेकिन यह अवश्य अध्ययन करता है कि विचारों की पुनरावृत्ति, ध्यान की दिशा और भावनात्मक प्रसंस्करण हमारे मानसिक अनुभवों से किस प्रकार जुड़े हैं।

अपने जीवन की परिस्थितियों को तुरंत बदल पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन उन परिस्थितियों के बीच हम अपने मन से क्या कहते हैं, यह बहुत हद तक हमारे हाथ में है। यही वह स्थान है जहाँ मनुष्य परिस्थितियों का केवल भोगता नहीं रहता, वह अपने भीतर का साधक बनना शुरू करता है।

इसलिए अगली बार जब कोई नकारात्मक विचार आपकी जिह्वा तक आए, एक क्षण ठहरिए और स्वयं से पूछिए—क्या मैं यह बात केवल सामने वाले को कह रहा हूँ, या अपने ही अंतःकरण में भी लिख रहा हूँ? यदि मैं इसे बार-बार कहूँगा तो मेरे भीतर कौन-सा भाव मजबूत होगा? क्या मैं अपने भीतर भय बढ़ा रहा हूँ या विश्वास? कटुता बढ़ा रहा हूँ या करुणा? असहायता बढ़ा रहा हूँ या पुरुषार्थ?

क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि संसार ने आपके साथ क्या कहा। एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि आपने संसार की उन आवाजों को अपने भीतर कितनी बार दोहराया।

अपने मन को हर आने-जाने वाले विचार का घर मत बनने दीजिए। जो विचार आपको तोड़ता है, उसे पहचानिए। जो स्मृति आपको जलाती है, उससे धीरे-धीरे दूरी बनाइए। जो शब्द आपको भीतर से कमजोर करते हैं, उन्हें बार-बार बोलना बंद कीजिए। और जिन शब्दों में सत्य है, आशा है, ईश्वर का स्मरण है, कर्म का साहस है, प्रेम है और जीवन को फिर से उठ खड़े होने की प्रेरणा है—उन्हें अपने भीतर बार-बार बोलिए।

क्योंकि अंततः मनुष्य केवल उन घटनाओं से नहीं बनता जो उसके जीवन में घटती हैं; वह उन घटनाओं के बारे में अपने भीतर बार-बार बोले गए शब्दों से भी बनता है।

इसलिए अपने भीतर आज से एक नई भाषा जन्म लेने दीजिए। जब जीवन कहे—“तुम हार गए”, तो भीतर से कहिए—“मैं अभी समाप्त नहीं हुआ।” जब अतीत कहे—“तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ”, तो भीतर से कहिए—“मैं उससे सीखकर आगे बढ़ूँगा।” जब भय कहे—“सब खत्म हो जाएगा”, तो भीतर से कहिए—“जो मेरे हाथ में है, मैं उसे पूरी निष्ठा से करूँगा।” और जब निराशा कहे—“कोई रास्ता नहीं है”, तो भीतर से धीरे से कहिए—“रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि रास्ता है ही नहीं।”

यही सकारात्मक सोच का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ है—अंधी आशावादिता नहीं, बल्कि अंधकार के बीच भी प्रकाश की संभावना को जीवित रखना।

आप अपने भीतर क्या बो रहे हैं, इस प्रश्न को रोज अपने सामने रखिए। विचार बीज हैं, वाणी उन्हें सींचती है, संकल्प उन्हें दिशा देता है और कर्म उन्हें जीवन की भूमि में उतार देता है। विज्ञान इस पूरी प्रक्रिया को अलग शब्दों में—ध्यान, पुनरावृत्त विचार, भावनात्मक विनियमन और मस्तिष्कीय नेटवर्क—के माध्यम से समझने का प्रयास करता है; वेदान्त इसे संकल्प, चित्त और आत्मदृष्टि की भाषा में देखता है। दोनों को एक ही बात कहना मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन दोनों के बीच संवाद की एक सार्थक भूमि अवश्य दिखाई देती है।

इसलिए अपने भीतर वही बोइए, जिसे एक दिन अपने जीवन में वृक्ष बनकर खड़ा देखना चाहते हैं।

लेखक- प्रधान संपादक दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली 

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