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जब स्वबोध खो जाता है, तब राष्ट्र का पथ अवरुद्ध हो जाता है-डॉ कृष्ण गोपाल

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Dainik India News

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जब स्वबोध खो जाता है, तब राष्ट्र का पथ अवरुद्ध हो जाता है-डॉ कृष्ण गोपाल

भारत की ज्ञान-परंपरा, न्याय-दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का समय

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ।राष्ट्र केवल सीमाओं से निर्मित नहीं होता, वह अपनी स्मृति, संस्कृति, परंपरा, ज्ञान और स्वबोध से जीवित रहता है। जिस समाज का स्वबोध जागृत रहता है, वही समाज इतिहास का निर्माण करता है; और जिस समाज का स्वबोध क्षीण हो जाता है, वह इतिहास का विषय बन जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल का उद्बोधन इसी राष्ट्रीय सत्य का गंभीर स्मरण कराता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा केवल एक मंदिर की प्रतिष्ठा नहीं है; वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, सभ्यतागत आत्मविश्वास और राष्ट्रीय स्वबोध के पुनर्जागरण का प्रतीक है। किंतु यह पुनर्जागरण तभी पूर्ण होगा, जब भारत अपने ज्ञान, अपने दर्शन, अपनी शिक्षा, अपनी न्याय-दृष्टि और अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनः जीवन के केंद्र में स्थापित करेगा।

डॉ. कृष्ण गोपाल ने गहरी चिंता व्यक्त की कि भारत की लाखों प्राचीन पांडुलिपियाँ आज भी उपेक्षित हैं। उनमें निहित विज्ञान, आयुर्वेद, दर्शन, गणित, न्यायशास्त्र, राज्यचिंतन और लोकज्ञान का विशाल भंडार अभी भी व्यवस्थित अध्ययन और संरक्षण की प्रतीक्षा कर रहा है। यह केवल पुस्तकों की उपेक्षा नहीं, बल्कि उस ज्ञान-संपदा की उपेक्षा है, जिसने सहस्राब्दियों तक मानवता का मार्ग आलोकित किया।

उन्होंने स्मरण कराया कि भारत की न्याय-दृष्टि का मूल स्वरूप केवल दंड-विधान पर आधारित नहीं था। भारतीय परंपरा में न्याय का उद्देश्य सामाजिक संतुलन, नैतिक उत्तरदायित्व, आत्मस्वीकार और लोकमंगल की स्थापना था। न्याय का अर्थ केवल अपराध का प्रतिकार नहीं, बल्कि समाज में पुनः सामंजस्य की स्थापना भी था। आज आवश्यकता इस बात की है कि न्याय-व्यवस्था निरंतर अधिक सुलभ, त्वरित, मानवीय और न्यायोचित बने, ताकि सामान्य नागरिक का विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो।

डॉ. कृष्ण गोपाल का आग्रह अतीत में लौटने का नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य का निर्माण करने का है। उनका संदेश स्पष्ट है कि आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का स्वागत होना चाहिए, किंतु उनका आधार भारतीय जीवन-दर्शन, सांस्कृतिक आत्मबोध और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा होना चाहिए। अपनी जड़ों से कटकर कोई भी समाज दीर्घकाल तक आत्मविश्वास के साथ आगे नहीं बढ़ सकता।

आज भारत अमृतकाल की यात्रा में विश्व के समक्ष नई संभावनाओं का उद्घोष कर रहा है। ऐसे समय में आवश्यक है कि विकास केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित न रहे, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, शिक्षा और नैतिक चेतना का भी पुनर्जागरण हो। भारत का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब उसकी नई पीढ़ी अपने अतीत से परिचित, वर्तमान के प्रति सजग और भविष्य के प्रति संकल्पित होगी।

 उनका यह उद्बोधन वस्तुतः राष्ट्रीय आत्ममंथन का निमंत्रण है। यह स्मरण कराता है कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसका स्वबोध होता है। जब वही दुर्बल पड़ जाता है, तब विकास की गति भी अवरुद्ध होने लगती है। इसलिए आज का सबसे बड़ा राष्ट्रीय दायित्व यही है कि भारत अपनी ज्ञान-परंपरा, अपनी सांस्कृतिक चेतना और अपने सभ्यतागत आत्मविश्वास की पुनर्प्रतिष्ठा करे। यही राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का आधार है, और यही उस अवरोध को दूर करने का मार्ग है, जिसकी ओर डॉ. कृष्ण गोपाल ने अपने उद्बोधन में गंभीरता से ध्यान आकृष्ट किया।

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