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गुरु पूर्णिमा : गुरु-तत्त्व ही राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्कर्ष का शाश्वत अधिष्ठान- अभयानंद सरस्वती

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गुरु पूर्णिमा : गुरु-तत्त्व ही राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्कर्ष का शाश्वत अधिष्ठान- अभयानंद सरस्वती

 युगद्रष्टा, तपोनिष्ठ महामण्डलेश्वर परम पूज्य स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी महाराज का गुरु पूर्णिमा पर राष्ट्र के नाम संदेश

दैनिक इंडिया न्यूज़ 29 जुलाई 2026 नई दिल्ली।गुरु पूर्णिमा के पावन, पुण्यप्रद एवं आत्मप्रबोधकारी महापर्व के शुभ अवसर पर परमज्ञानी, महाविद्वान, युगद्रष्टा, तपोनिष्ठ महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी महाराज ने समस्त राष्ट्रवासियों को मंगलमयी शुभकामनाएँ अर्पित करते हुए कहा कि भारत की सनातन संस्कृति का मूलाधार यदि कोई है, तो वह गुरु-तत्त्व है। गुरु केवल ज्ञानोपदेशक नहीं, अपितु समस्त सृष्टि के आध्यात्मिक आलोक, धर्मसंरक्षण, आत्मबोध एवं लोकमंगल के दिव्य अधिष्ठाता हैं। गुरु ही वह परम चेतना हैं, जिनकी कृपा से जीव अज्ञान, मोह, अविद्या और अहंकार के गहन अन्धकार से मुक्त होकर ब्रह्मविद्या के दिव्य प्रकाश का साक्षात्कार करता है।

पूज्य स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने राष्ट्र-संदेश में कहा कि भारतीय सभ्यता का सम्पूर्ण वैभव गुरु-शिष्य परम्परा की अविच्छिन्न धारा पर प्रतिष्ठित है। वेद, उपनिषद, पुराण, स्मृतियाँ तथा समस्त सनातन वाङ्मय गुरु के सर्वोच्च स्थान का उद्घोष करते हैं। भगवान सदाशिव ने स्कन्दपुराण के अंतर्गत वर्णित गुरुगीता में माता पार्वती को गुरु-महिमा का निरूपण करते हुए उद्घोष किया—

"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"

उन्होंने कहा कि यह श्लोक केवल स्तुति नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का परम सिद्धान्त है, जिसमें गुरु को सृष्टि, पालन, संहार तथा परब्रह्म के साक्षात् स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

महामण्डलेश्वर जी ने आगे कहा कि गुरुगीता का यह दिव्य वचन गुरु-तत्त्व की चरम महिमा का उद्घोष करता है—

"ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्। मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥"

अर्थात् गुरु का स्वरूप ही ध्यान का मूल है, उनके चरण समस्त उपासना का आधार हैं, उनका वचन समस्त मन्त्रों का सार है तथा उनकी कृपा ही मोक्ष का परम कारण है। उन्होंने कहा कि गुरु की कृपा के बिना आध्यात्मिक साधना पूर्ण नहीं हो सकती।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि मुण्डकोपनिषद् भी उद्घोष करता है—

"तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥" (मुण्डकोपनिषद् 1.2.12)

अर्थात् ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए मनुष्य को ऐसे गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए जो शास्त्रों के परम विद्वान एवं ब्रह्मनिष्ठ हों। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञानपरम्परा में गुरु ही आत्मविद्या के द्वार का उद्घाटन करते हैं।

महामण्डलेश्वर अभयानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि जब अर्जुन मोह और विषाद से व्याकुल हुए, तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष स्वयं को शिष्य रूप में समर्पित किया—"शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।" तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण मानवता के लिए गुरु-तत्त्व का सनातन सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए कहा—

"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥" (भगवद्गीता 4.34)

उन्होंने कहा कि विनम्रता, सेवा, श्रद्धा एवं जिज्ञासा ही गुरु-कृपा प्राप्त करने के अनिवार्य साधन हैं। यही भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा की अक्षुण्ण आत्मा है।

उन्होंने कहा कि महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि सान्दीपनि, भगवान वेदव्यास, आचार्य चाणक्य, आदि शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास और असंख्य ऋषि-मुनियों ने अपने ज्ञान, तप, त्याग एवं राष्ट्रनिष्ठा से भारत की सांस्कृतिक चेतना को अक्षुण्ण बनाए रखा। अतः गुरु केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्र के चरित्र, संस्कृति और सभ्यता के निर्माता होते हैं।

अपने संदेश के समापन में पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी महाराज ने समस्त देशवासियों के सुख, समृद्धि, आरोग्य, आध्यात्मिक उन्नति एवं राष्ट्र की अखण्डता के लिए मंगलकामनाएँ व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा हमें यह संकल्प लेने की प्रेरणा देती है कि हम गुरु-वचनों को जीवन का आधार बनाकर सत्य, धर्म, करुणा, आत्मसंयम एवं राष्ट्रसेवा के पथ पर अग्रसर हों। गुरु का प्रकाश ही आत्मा का प्रकाश है और गुरु की कृपा ही जीवन को परम कल्याण की दिशा में अग्रसर करने वाली दिव्य शक्ति है। यही गुरु पूर्णिमा का सनातन संदेश है और यही भारत की आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत आलोक।

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