"भारत केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं, वह चेतना है; वह संविधान की स्याही में लिखी हुई करुणा है, वह करोड़ों युवाओं की आँखों में पलते स्वप्नों का नाम है।"
लोकतंत्र का अर्थ केवल सरकार चुन लेना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—जनता के विश्वास को शासन का धर्म बना देना। लोकतंत्र संसद की बहसों से नहीं, जनता की धड़कनों से जीवित रहता है। जिस दिन सत्ता जनता की आवाज़ सुनना छोड़ देती है और जनता सत्ता पर विश्वास करना छोड़ देती है, उसी दिन लोकतंत्र का शरीर जीवित दिखाई देता है, किंतु उसकी आत्मा घायल हो जाती है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों तक बैठे वे छात्र किसी राजनीतिक दल के झंडे तले नहीं बैठे थे; वे अपने भविष्य की रक्षा के लिए बैठे थे। उनके हाथों में पत्थर नहीं थे, वर्षों की तपस्या थी। उनके माथे पर क्रोध नहीं था, अनिश्चित भविष्य की चिंता थी। उनकी आँखों में सत्ता बदलने का स्वप्न नहीं था; केवल इतना विश्वास बचा रहे कि मेहनत का मूल्य अभी भी भारत में जीवित है।
जब कोई पिता अपनी जीवनभर की कमाई, अपनी खेती, अपनी पुश्तैनी ज़मीन या अपनी पत्नी के गहने बेचकर बेटे-बेटी को डॉक्टर बनाने का सपना देखता है, तब वह केवल फीस नहीं भरता, वह अपने जीवन का विश्वास जमा करता है। जब वह बच्चा दो-दो, तीन-तीन वर्षों तक दिन-रात एक कर देता है, तब परीक्षा केवल परीक्षा नहीं रह जाती—वह पूरे परिवार की तपस्या बन जाती है।
ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो केवल परिणाम नहीं डगमगाते; राष्ट्र के भविष्य पर विश्वास डगमगाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्षों तक "मन की बात" के माध्यम से देश के करोड़ों लोगों से संवाद स्थापित किया है। यह एक अभिनव पहल रही है। किंतु लोकतंत्र का दर्शन हमें यह भी सिखाता है कि जहाँ "मन की बात" हो, वहाँ "जन की बात" भी उतनी ही श्रद्धा से सुनी जानी चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में संवाद एकतरफा नहीं होता; वह दो आत्माओं का मिलन होता है—एक जनता की, दूसरी शासन की।
भारत का इतिहास हमें बताता है कि जब यह देश अंग्रेज़ी साम्राज्य के अधीन था, तब भी सत्याग्रह की परंपरा ने दुनिया को अहिंसा का मार्ग दिखाया। गांधी ने लाठी नहीं उठाई; उन्होंने सत्य उठाया। भारत ने दुनिया को सिखाया कि विचार की शक्ति, हिंसा की शक्ति से बड़ी होती है।
आज प्रश्न यह नहीं है कि जंतर-मंतर पर कौन बैठा था। प्रश्न यह है कि क्या हमने उन युवाओं में अपने घर के बच्चों का चेहरा देखा?
यदि हमारे ही घर का पुत्र किसी बात पर हमसे असहमत हो जाए, तो क्या हम उसे घर से निकाल देते हैं? क्या हम उसके प्रश्नों को अपराध मान लेते हैं? नहीं। हम उसे समझते हैं, उससे संवाद करते हैं, उसकी भूल सुधारते हैं और यदि भूल हमारी हो तो उसे स्वीकार भी करते हैं। क्योंकि वह अपना है।
यही लोकतंत्र का भी धर्म है। सरकार जनता की शत्रु नहीं होती; जनता सरकार की विरोधी नहीं होती। सरकार और जनता एक ही परिवार के दो पक्ष हैं। इसलिए यदि सरकार में कहीं कमी दिखाई देती है, तो उसका उद्देश्य उसे गिराना नहीं, उसे और अधिक श्रेष्ठ बनाना होना चाहिए। सच्चा राष्ट्रवाद सरकार की अंधभक्ति नहीं, राष्ट्र के प्रति सत्यनिष्ठा है।
यह भी सत्य है कि लंबे आंदोलनों में राजनीतिक दल, अवसरवादी तत्व अथवा अराजक शक्तियाँ प्रवेश करने का प्रयास करती हैं। उनके विरुद्ध कठोरतम विधिक कार्रवाई होनी चाहिए। किंतु उन कुछ तत्वों के कारण संपूर्ण छात्र समुदाय की पीड़ा को अस्वीकार कर देना न्याय नहीं, संवेदनहीनता होगी।
कुछ समय पूर्व शिक्षा और भर्ती से जुड़े निर्णयों ने भी समाज के एक वर्ग में गहरी चिंता उत्पन्न की थी। उस विषय पर देशभर में शांतिपूर्ण विरोध हुए। अंततः माननीय सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने लोकतांत्रिक संस्थाओं के संतुलन की महत्ता को पुनः स्थापित किया। यह घटना हमें याद दिलाती है कि भारत की शक्ति उसकी संस्थाओं के पारस्परिक संतुलन में निहित है, न कि किसी एक शक्ति-केंद्र में।
आज यह भी आत्ममंथन का विषय है कि भारत के सर्वाधिक मेधावी युवा विश्व की अग्रणी संस्थाओं—गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, आईबीएम, नासा और असंख्य वैश्विक संगठनों—का नेतृत्व कर रहे हैं। यह भारतीय प्रतिभा का गौरव है, परंतु साथ ही एक मौन प्रश्न भी है—क्या हमारे अपने देश ने उन्हें वह अवसर, वह विश्वास और वह वातावरण दिया, जिसके वे अधिकारी थे?
प्रतिभा की कोई जाति नहीं होती, कोई वर्ग नहीं होता, कोई राजनीतिक दल नहीं होता। प्रतिभा केवल राष्ट्र की संपत्ति होती है। जिस दिन भारत का प्रत्येक मेधावी युवा यह विश्वास कर सकेगा कि उसकी योग्यता का सम्मान होगा, उसी दिन "ब्रेन ड्रेन" का स्थान "ब्रेन गेन" ले लेगा।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ—मीडिया—भी इस कसौटी से मुक्त नहीं है। उसकी निष्ठा सत्ता से नहीं, सत्य से होनी चाहिए। यदि सरकार उत्कृष्ट कार्य करे तो उसकी सराहना हो; यदि कहीं भूल हो तो निर्भीक किंतु मर्यादित शब्दों में उसका संकेत किया जाए। पत्रकारिता का उद्देश्य किसी दल का मुखपत्र बनना नहीं, राष्ट्र के विवेक को जागृत रखना है।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था—"सरकारें आएँगी-जाएँगी, दल बनेंगे-बिगड़ेंगे, लेकिन यह देश रहना चाहिए और इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।" यह केवल राजनीतिक वाक्य नहीं, भारतीय लोकतंत्र का उपनिषद है।
आज आवश्यकता सत्ता और विपक्ष—दोनों से अधिक समाज के जागरण की है। यदि हम हर घटना को पहले दलों के चश्मे से देखेंगे और बाद में मनुष्यता के चश्मे से, तो हम धीरे-धीरे अपनी संवेदनाओं को खो देंगे। उस दिन लोकतंत्र संविधान की पुस्तकों में तो रहेगा, किंतु लोगों के हृदयों से विदा हो जाएगा।
भारत की आत्मा किसी दल में नहीं बसती; वह उस किसान में बसती है जो अपने बेटे को पढ़ाने के लिए कर्ज़ लेता है। वह उस माँ में बसती है जो अपने हिस्से का भोजन छोड़कर बेटी के लिए किताब खरीदती है। वह उस छात्र में बसती है जो रातभर जागकर यह विश्वास करता है कि उसकी मेहनत एक दिन न्याय पाएगी।
राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, विश्वास से बनता है। संविधान केवल कानून नहीं, नागरिक और राज्य के बीच किया गया एक नैतिक वचन है। यदि उस वचन की रक्षा करनी है, तो हमें संवाद को दमन पर, संवेदना को अहंकार पर और सत्य को प्रचार पर वरीयता देनी होगी।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। अब उसे विश्व का सबसे संवेदनशील लोकतंत्र भी बनना होगा। क्योंकि जिस दिन सत्ता जनता की आँखों में अपने ही बच्चों का चेहरा देखना सीख जाएगी, उसी दिन भारत केवल शक्तिशाली राष्ट्र नहीं, बल्कि सभ्यता का नैतिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र भी बन जाएगा।
लाठियाँ भीड़ को तितर-बितर कर सकती हैं, पर विश्वास का निर्माण केवल संवाद करता है। और जिस राष्ट्र में संवाद जीवित रहता है, वहाँ लोकतंत्र कभी पराजित नहीं होता।
लेखक हरिंद्र कुमार सिंह प्रधान संपादक दैनिक इंडिया न्यूज़