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मंगलकामनाओं के संग विश्वशांति का आह्वान-जितेन्द्र प्रताप सिंह

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Dainik India News

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मंगलकामनाओं के संग विश्वशांति का आह्वान-जितेन्द्र प्रताप सिंह

अष्टमी-रामनवमी पर राष्ट्र के नाम शांति और समृद्धि का संदेश

दैनिक इंडिया न्यूज़ नोएडा। चैत्र नवरात्रि की पुण्यमयी अष्टमी एवं नवमी के पावन संयोग पर, जब सम्पूर्ण वातावरण देवी दुर्गा के अष्टम स्वरूप माँ महागौरी की दिव्य आराधना से आलोकित था, उसी शुभ वेला में जितेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने आवास पर विधिविधानपूर्वक पूजन-अर्चन एवं वैदिक अनुष्ठान संपन्न किया। मंत्रोच्चारण की पवित्र अनुगूंज और श्रद्धा-सिक्त भावनाओं ने परिवेश को एक अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण कर दिया—मानो समस्त प्रकृति स्वयं मंगल की अभ्यर्थना कर रही हो।

पूजनोपरांत मीडिया से संबोधन करते हुए जितेन्द्र प्रताप सिंह ने सर्वप्रथम समस्त राष्ट्रवासियों को अष्टमी, नवमी एवं भगवान श्रीराम के अवतरण दिवस रामनवमी की हृदयंगम शुभकामनाएँ ज्ञापित कीं। उन्होंने उद्गार व्यक्त किया कि यह पावन पर्व भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक समरसता का अद्वितीय प्रतीक है। उन्होंने कामना की कि देश का प्रत्येक नागरिक सुख, शांति, समृद्धि एवं अखंड सौहार्द के आलोक में जीवनयापन करे तथा राष्ट्र निरंतर उन्नति और वैभव के शिखर को स्पर्श करता रहे।

किन्तु उनके स्वर में निहित संवेदना यहीं थमती नहीं दिखी। अपने संबोधन के अगले ही चरण में जितेन्द्र प्रताप सिंह ने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य की विषम परिस्थितियों की ओर संकेत करते हुए गहन चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि विश्व के अनेक भागों में उभरती युद्धोन्मुख स्थितियाँ मानवता के लिए एक भीषण संकट का सूचक हैं—एक ऐसा संकट, जिसकी विभीषिका का सर्वाधिक दंश निर्दोष और निरपराध जनों को ही सहना पड़ता है।

उन्होंने मार्मिक शब्दों में कहा कि युद्ध केवल सीमाओं का संघर्ष नहीं, बल्कि मानव जीवन की असंख्य आशाओं, सपनों और अस्तित्व का निर्मम संहार होता है। “जहाँ एक ओर विजय का उद्घोष होता है, वहीं दूसरी ओर असंख्य परिवारों का करुण क्रंदन इतिहास के पृष्ठों पर अमिट वेदना अंकित कर देता है”—यह कहते हुए उन्होंने समस्त वैश्विक समुदाय से शांति, संवाद और सह-अस्तित्व के मार्ग को अपनाने का आह्वान किया।

अंततः जितेन्द्र प्रताप सिंह ने माँ भगवती से प्रार्थना करते हुए कहा कि समस्त विश्व में शांति, करुणा एवं सौहार्द की स्थापना हो, और प्रत्येक मानव भयमुक्त, सुरक्षित एवं समृद्ध जीवन का अनुभव कर सके। उनके इन शब्दों में एक सजग नागरिक की व्यथा, एक साधक की आस्था और एक उत्तरदायी नेतृत्व की संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई।

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