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प्रज्ञा कथा का दिव्य उद्गार—विचार-शुद्धि की अलौकिक पुकार ने श्रोताओं को भीतर तक झकझोर दिया

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प्रज्ञा कथा का दिव्य उद्गार—विचार-शुद्धि की अलौकिक पुकार ने श्रोताओं को भीतर तक झकझोर दिया

प्रज्ञा पुराण कथा का द्वितीय दिवस सम्पन्न

दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ। मोहनलालगंज स्थित प्राचीन कालेबीर मंदिर प्रांगण में प्रज्ञा पुराण कथा का दूसरा दिवस अत्यंत गहन आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न हुआ। शांतिकुंज, हरिद्वार से पधारी कथा–टोली ने आज “परिवार–खण्ड” पर उद्बोधन करते हुए उन विकृत प्रवृत्तियों को केंद्र में रखा जिनसे आज का समाज असंतुलन, तनाव और टूटन की पीड़ा झेल रहा है। बढ़ती स्वार्थ–वृत्ति, पारिवारिक दूरी, नशे की चपेट, नैतिक पतन और भावनात्मक कठोरता जैसी समस्याओं पर उनके विश्लेषण ने श्रोताओं को आत्ममंथन हेतु विवश कर दिया।

निष्ठा दीदी ने नारद–विष्णु संवाद का उदाहरण देकर बताया कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या बाहरी दुनिया नहीं, बल्कि उसका अशांत और अपवित्र होता विचार–लोक है। उन्होंने कहा कि जब मन की दिशा विचलित होती है, तब परिवार टूटते हैं और समाज संघर्षों का मंच बन जाता है। उन्होंने भावपूर्ण स्वर में कहा कि मनुष्य को अपने विचारों को शुद्ध, संयमित और निर्मल बनाने का संकल्प ग्रहण करना होगा—क्योंकि शुद्ध विचार ही जीवन में प्रकाश, संतुलन और सौहार्द का उदय करते हैं।

उन्होंने बताया कि पूज्य गुरुदेव द्वारा दी गई गायत्री साधना मनुष्य की अंतरात्मा को सामर्थ्य, स्थिरता और पवित्रता प्रदान करती है। यह साधना न केवल मन को शांत करती है, बल्कि जीवन में कर्तव्य, अनुशासन और सेवा–भाव को जागृत करती है। जब व्यक्ति भीतर बदलता है, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव होता है।

आज की कथा में प्रस्तुत भक्ति–गीतों ने वातावरण को अत्यंत भाव-विभोर कर दिया।


“अब तेरा दुःख दर्द हृदय का माँ हमने पहचाना” — रेखा मुकुल
“गायत्री के महामंत्र से जीवन के सब पाप हरॊ” — लल्लू जी
“चलो रे मन शांतिकुंज हरिद्वार” — रेखा जी
इन गीतों ने मानो मंदिर प्रांगण में भक्ति की अनंत तरंगें प्रवाहित कर दीं।

लखनऊ गायत्री परिवार के राकेश जी, एल. बी. सिंह, प्रजापति जी और वर्मा जी सहित अनेक श्रद्धालुओं ने उपस्थिति दर्ज कराते हुए कथा का दिव्य लाभ ग्रहण किया।

कथा आयोजन की सफलता में गायत्री परिवार दुगावां, लखनऊ के सेवाभावी सदस्यों—कुमुद दीदी, कुसुम दीदी, सुमन, सुनीता, चंद्रकांत जी, उमा कांत जी आदि—का विशेष योगदान रहा, जिनकी निष्ठा, व्यवस्था और सेवा–भाव पूरे कार्यक्रम में झलकता रहा।

कार्यक्रम का संयत और प्रभावपूर्ण संचालन ज्ञान श्रीवास्तव द्वारा किया गया

यह निरंतर प्रवाहित होती प्रज्ञा कथा न केवल श्रद्धालुओं के मन को आलोकित कर रही है, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि समाज का वास्तविक उत्थान तभी संभव है जब मनुष्य अपने भीतर की धूल झाड़कर विचारों को उजाला दे—यही परिवर्तन परिवारों को जोड़ता है, और समाज को नई दिशा देता है।

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