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बहुजन हिताय बहुजन सुखाय - वासुदेव कुटुम्बकम ही सनातन की मूलभावना: जितेन्द्र प्रताप सिंह

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Dainik India News

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बहुजन हिताय बहुजन सुखाय - वासुदेव कुटुम्बकम ही सनातन की मूलभावना: जितेन्द्र प्रताप सिंह

दैनिक इंडिया न्यूज़, 24 अगस्त 2024, लखनऊ: राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने डॉ. महेन्द्र सिंह, पूर्व जल शक्ति मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के मध्य प्रदेश प्रभारी, के साथ पूर्व निर्धारित भेंट में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सनातन राष्ट्र की मूल भावना ही भारत के हृदय की धड़कन है। उन्होंने कहा, "सनातन धर्म हमें प्रकृति से जोड़ते हुए चर-अचर, जड़-चेतन, जीव-जन्तु तथा सम्पूर्ण अनंत ब्रह्मांड से सम्बद्ध करता है। सृष्टि के सृजन से लेकर वर्तमान तक, हमारी जीवनशैली को इन मानवीय भावों से अभिसिंचित कर समृद्धशाली संस्कृति को परिपक्व करने और समाज को सुदृढ़ता से बांधने का कार्य किया गया है।"

जितेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए यह भी कहा, "हमारी संस्कृति 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना पर आधारित है, जिसमें समस्त विश्व एक परिवार के रूप में देखा जाता है। यह विचारधारा न केवल भारत के लिए, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए पथप्रदर्शक है।"

"सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥"
ऋग्वेद 10.191.2

इस श्लोक का उल्लेख करते हुए जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा, "हम सबको एकता और समन्वय के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सनातन धर्म का यह संदेश हमें सिखाता है कि जैसे देवता मिलकर अपने कार्य करते थे, वैसे ही हमें भी एकजुट होकर समाज के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।"

डॉ. महेन्द्र सिंह ने भी सहमति जताते हुए कहा, "मानवता के गुण और चरित्र का विश्लेषण करते समय, यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी कार्यशैली और सामर्थ्य होती है। समाज को अपने दृष्टिकोण से परखते हुए, जीवन के पथ पर अग्रसर होना और परिणाम एवं लक्ष्य को प्राप्त करना, व्यक्ति का निजी निर्णय होता है। सनातन धर्म मनुष्य को सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।"

उन्होंने आगे कहा, "धनार्जन ही जीवन का ध्येय नहीं है; अपितु अध्यात्म के माध्यम से परम शक्ति का साक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति ही सनातन धर्म की मूल भावना है। यह धर्म हमें सिखाता है कि हमारे कर्म और कर्तव्यों का पालन करते हुए हम जीवन को सही दिशा में ले जा सकते हैं।"

इस मुलाकात के दौरान, अन्य सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी गहन चर्चा की गई। धार्मिक विषयों से सम्बंधित भावों का आदान-प्रदान हुआ, जिसमें सनातन धर्म के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। जितेन्द्र प्रताप सिंह ने इस अवसर पर गीता का उल्लेख करते हुए कहा, "गीता में कहा गया है 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।' यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए, बिना किसी फल की चिंता किए।"

जितेन्द्र प्रताप सिंह और डॉ. महेन्द्र सिंह के बीच हुई इस महत्वपूर्ण मुलाकात ने न केवल धार्मिक विचारों का आदान-प्रदान किया, बल्कि सामाजिक एकता और राष्ट्रीय प्रगति के लिए नए मार्ग प्रशस्त किए। सनातन धर्म की मूल भावना को पुनः जागृत करते हुए, इस भेंट ने यह स्पष्ट किया कि 'बहुजन हिताय बहुजन सुखाय' की भावना को अपनाकर ही सच्ची मानवता की स्थापना की जा सकती है।

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