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रानी लक्ष्मीबाई जयंती पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष का संदेश: राष्ट्र रक्षा और महिला सशक्तिकरण का अद्वितीय प्रतीक

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Dainik India News

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रानी लक्ष्मीबाई जयंती पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष का संदेश: राष्ट्र रक्षा और महिला सशक्तिकरण का अद्वितीय प्रतीक

झांसी की रानी ने दिया राष्ट्रप्रेम का अद्भुत संदेश

दैनिक इंडिया न्यूज़ 19 Nov 2024 लखनऊ
राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने रानी लक्ष्मीबाई जयंती के अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, “रानी लक्ष्मीबाई का जीवन त्याग, समर्पण और वीरता का प्रतीक है। उनका बलिदान देश के हर नागरिक, विशेषकर युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। रानी लक्ष्मीबाई ने अपने संघर्ष से हमें यह सिखाया कि राष्ट्र रक्षा सर्वोच्च कर्तव्य है और इसके लिए हमें हर संभव प्रयास करना चाहिए। उनकी गाथा न केवल भारतीय इतिहास बल्कि विश्व इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।”

उन्होंने अपने संबोधन में झांसी की रानी के जीवन से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि रानी ने अपने नेतृत्व और रणनीतिक कुशलता से अंग्रेजों को न केवल कड़ी चुनौती दी, बल्कि महिलाओं को भी सशक्त होने की प्रेरणा दी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि नारी शक्ति के आगे कोई भी चुनौती टिक नहीं सकती।

महिला सशक्तिकरण और झांसी की रानी का योगदान


19वीं सदी के उस दौर में, जब महिलाओं को शिक्षा और युद्ध कौशल से वंचित रखा जाता था, रानी लक्ष्मीबाई ने घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी में महारत हासिल कर एक मिसाल कायम की। उन्होंने अपने नेतृत्व में महिलाओं की एक सेना गठित की, जिसमें झलकारी बाई, काशीबाई, और मोतीबाई जैसी वीरांगनाएं शामिल थीं। रानी लक्ष्मीबाई का यह साहस और समर्पण आज भी महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा, “आज जब भी कोई लड़की बहादुरी का कार्य करती है, तो उसे झांसी की रानी कहकर सम्मानित किया जाता है। यह उनके व्यक्तित्व की गहराई और प्रभाव का प्रतीक है। झांसी की रानी केवल एक योद्धा नहीं थीं, बल्कि वह हर महिला के लिए आत्मविश्वास और शक्ति का प्रतीक हैं।”

रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष और बलिदान


रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी के अस्सीघाट पर मोरोपंत तांबे और भागीरथी बाई के घर हुआ। बचपन में मणिकर्णिका नाम से जानी जाने वाली इस बालिका को प्यार से मनु कहा जाता था। चार वर्ष की उम्र में अपनी मां को खोने के बाद, उनका पालन-पोषण बिठूर में हुआ। नाना साहब और तात्या टोपे उनके साथी थे, जिन्होंने उन्हें युद्ध कौशल सिखाया।

1842 में उनका विवाह झांसी के महाराज गंगाधर राव नेवलेकर से हुआ। विवाह के बाद उन्हें लक्ष्मीबाई नाम मिला। अपने पति और पुत्र की मृत्यु के बाद, उन्होंने अंग्रेजों की कुटिल "डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स" नीति के तहत झांसी पर किए गए आक्रमण का साहसपूर्वक सामना किया।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, रानी ने झांसी के किले को अंग्रेजों से बचाने के लिए अद्वितीय साहस दिखाया। उन्होंने 14,000 सैनिकों की सेना खड़ी की, जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं। गुलाम गौस खान, खुदा बख्श, और झलकारी बाई जैसे योद्धाओं ने रानी का समर्थन किया। उनके नेतृत्व में झांसी का किला स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख केंद्र बना।

आधुनिक भारत के लिए प्रेरणा


जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा, “रानी लक्ष्मीबाई ने यह सिद्ध किया कि महिलाओं की भूमिका केवल घर तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी वीरता से यह संदेश दिया कि महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे आकर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना चाहिए।”

आज भी रानी लक्ष्मीबाई का जीवन और संघर्ष भारतीय युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा है। उनके नाम से जुड़ी गाथाएं हमें अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहने का संदेश देती हैं। राष्ट्रीय सनातन महासंघ ने रानी लक्ष्मीबाई जयंती पर उनकी वीरता और बलिदान को याद करते हुए संकल्प लिया कि उनके आदर्शों को जीवंत रखने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा।

झांसी की रानी की जयंती पर यह संदेश न केवल उनके बलिदान को श्रद्धांजलि है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाने का एक प्रयास भी है कि राष्ट्र प्रेम, त्याग और साहस का दूसरा नाम रानी लक्ष्मीबाई है।

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