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शक्ति साधना की 14 रात्रियों में मां जगदम्बा स्वरूप हैं नवरात्रियां-भार्गव

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Dainik India News

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शक्ति साधना की 14 रात्रियों में मां जगदम्बा स्वरूप हैं नवरात्रियां-भार्गव

दैनिक इंडिया न्यूज़:नवरात्रि आदिशक्ति की आराधना का पर्व हैं। सिद्धि एवं आत्मोत्सर्ग का पर्व है नवरात्रि । इसमें आदिशक्ति माँ भगवती के संरक्षण में स्वयं आदिशक्ति मय होने की साधना की जाती है। इसे चित्त शुद्धि एवं आत्मशुद्धि का पर्व भी कहते हैं। मां अपनी कृपा से साधक को आध्यात्मिक विकास, शांति, समृद्धि एवं सद्गति से लेकर भौतिक सम्पन्नता सब कुछ प्रदान करती हैं ऐसी सनातन मान्यता है। यह दो ऋतुओं के मिलन व संधिकाल का पर्व भी है. आने वाली शारदीय नवरात्रि में ग्रीष्म ऋतु विदा होती है. शीत ऋतु का प्रवेश होता है। इस अवधि में आदिशक्ति मां भगवती के संरक्षण में भावना, मंत्र साधना, उपासना, उपवास एवं प्रार्थना द्वारा आत्मविकास, आत्मपरिष्कार व्यक्तित्व निर्माण के लिए प्रखर आध्यात्मिक पुरुषार्थ सम्पन्न होते हैं। जो जीवन में सुख, शांति, समृद्धि एवं सद्गति का मार्ग प्रशस्त करता है। भगवान राम के पहले से ही मां की यह साधना प्रचलन में है।

नवरात्रि साधना भारतीय संस्कृति में शक्ति के विशेष आवाहन के रूप में अनन्तकाल से की जाती है। नवरात्र में प्रायः लोग नौ दिन तक मां दुर्गा. जगदम्बा की कृपा पाने के लिए उपासना, आराधना, व्रत नियम, जप, तप, यज्ञ अनुष्ठान, दुर्गा सप्तशती देवी भागवत पाठ राम चरित्र मानस गीता, श्रीमद्भागवत्, शिवपुराण पारण व श्रवण, ध्यान, आराधना जैसी अनेक प्रचलित परम्पराओं से साधकगण अपने अंतःकरण को पवित्र एवं शक्तिशाली बनाने, सुख सौभाग्य से भरने की कामना करते हैं। मातृ शक्ति की यह उपासना शारीरिक व आत्मिक शक्ति की वृद्धि करने वाली होती ही है. वाह्य दृष्टि से करोड़ों साधकों का यह सामूहिक पुरुषार्थ सम्पूर्ण प्रकृति में शुभ सात्विक प्रवाह जगाने में मदद करता है। इसलिए इन नवरात्रि काल के इन नौ दिनों व नौ रातों तक मां भगवती के एक एक स्वरूप का ध्यान करते हुए व्रत उपवास पूजन अर्चन करना विशेष फलदायी माना जाता है।

शास्त्र अनुसार मां आदिशक्ति में ब्रह्म शक्ति समाई है। इसलिए आदिशक्ति को जगन्माता भी कहते हैं। इस दृष्टि से मां की शक्तिधारा से जुड़ने एवं मां की कृपा के लिए शास्त्र में वर्ष भर में 14 रात्रियों का वर्णन है।

सभी 14 रात्रियों का मुहूर्त काल साधना की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है, परन्तु नवरात्रि काल की नौ रात्रियों के प्रत्येक दिन एवं रात्रि को आदिशक्ति जगद्जननी का साक्षात स्वरूप माना जाता है। इसलिए यह काल माता की कृपा दृष्टि से अन्य रात्रियों की अपेक्षा अनंतगुणा शुभ फल प्रदान करने वाला होता है।

इन 14 रात्रियों में अमावस्या युक्त चतुर्दशी की रात्रि कालरात्रि कहलाती है. दीपावली की रात्रि इसी श्रेणी में आती है। इसी प्रकार जीव को मोह-अज्ञान में डुबोने में समर्थ होने के कारण देवी की शक्ति मोहरात्रि कही जाती है. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि मोहरात्रि है। दारुणरात्रि अर्थात सभी भीषणताओं में सर्वाधिक भीषण होने वाली देवि शक्ति दारुणरात्रि कहलाती हैं, संक्रांति, ग्रहणकाल पर मंगलवार होने से उसे दारुणरात्रि कहते हैं। इसी प्रकार महारात्रि, घोररात्रि, क्रोधरात्रि, अचलरात्रि, दिव्यरात्रि, विष्णुरात्रि, मृतसंजीवनी रात्रि सिद्धरात्रि. गणेशरात्रि, देवीरात्रि सहित कुल 14 रात्रियां मानी गयी हैं। इनमें भी चार रात्रियां साधना के लिए विशेष मानी जाती हैं।

ऋग्वेद के रात्रि सूक्त के अनुसार ब्रह्मा शक्ति धारण में समर्थ होने के कारण आदिशक्ति देवी कालिरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि एवं दारुणरात्रि कहलाती हैं। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी स्वयं जगन्माता के इन रूपों की प्रार्थना स्तुति की कि 'हे देवि! तुम्हीं भयानक कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि एवं दारुणरात्रि हो। तुम्हीं श्री. तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं क्लीं और तुम्हीं बोधरूपा हो। कालरात्रिर्महारात्रिमहारात्रिश्च दारुणा । त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं स्त्वंबुद्धिबोधलक्षणा ।। इन अवधियों में गुरुमंत्र, ईष्ट मंत्र जप करना अनन्त गुना फल प्रदान करता ही है, पर नवरात्रि की महिमा अपरम्पार है। नवरात्रि में मां जगदजननी जगदम्बा के ही स्वरूप का साक्षात आराधना होती है।

नवरात्रि के नौ रूपों की साधना के तहत क्रमशः प्रथमं शैलपुत्री' अर्थात् मां नवदुर्गा के पहले रूप शैलपुत्री का पूजन होता है। प्रथम दिन हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में एक वर्ष की कन्या के पूजन से नौरात्र का शुभारम्भ होता है। द्वितीयं ब्रह्मचारिणी' नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी का ध्यान करते हुए सच्चिदानन्द स्वरूप की प्राप्ति की अनुभति की जाती है । ततीयं चन्द्रघण्टेति' नवरात्र के तीसरे दिन तीन वर्ष देवी कालिरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि एवं दारुणरात्रि कहलाती हैं। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी स्वयं जगन्माता के इन रूपों की प्रार्थना स्तुति की कि "हे देवि! तुम्हीं भयानक कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि एवं दारुणरात्रि हो । तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्ही बोधरूपा हो" कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहारात्रिश्च दारुणा । त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वंबुद्धिर्बोधलक्षणा ।। इन अवधियों में गुरुमंत्र, ईष्ट मंत्र जप करना अनन्त गुना फल प्रदान करता ही है, पर नवरात्रि की महिमा अपरम्परा है। नवरात्रि में मां जगदजननी जगदम्बा के ही स्वरूप का साक्षात आराधन होता है।

नवरात्रि के नौ रूपों की साधना के तहत क्रमशः 'प्रथमं शैलपुत्री' अर्थात् मां नवदुर्गा के पहले रूप शैलपुत्री का पूजन होता है। प्रथम दिन हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में एक वर्ष की कन्या के पूजन से नौरात्रि का शुभारम्भ होता है। 'द्वितीयं ब्रह्मचारिणी' नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी का ध्यान करते हुए सच्चिदानन्द स्वरूप की प्राप्ति की अनुभूति की जाती है। 'तृतीयं चन्द्रघण्टेति' नवरात्र के तीसरे दिन तीन वर्ष की कन्या में आनन्ददायी चन्द्र का ध्यान करते हुये व्रत-उपवास पूजन-अर्चन का विधान है। 'कृष्माण्डेति चतुर्थकम्' नवरात्रों के चतुर्थ दिवस कूष्माण्डा का ध्यान व्रत-उपवास पूजन-अर्चन करते हैं। 'पंचमं स्कन्दमातेति' नवरात्र के पांचवे दिन स्कन्दमाता अर्थात् कार्तिकेय की मां का ध्यान करते हुए पूजन करते हैं। 'षष्ठं कात्यायनीति' नवरात्र के छठे दिन मां दुर्गा कात्यायनी के स्वरूप का ध्यान करते हुये नवदुर्गा की पूजा आराधना अत्यधिक लाभप्रद होती है। 'सप्तमं कालरात्रीति' सातवें दिवस कालरात्रि का दर्शन करते हुए श्रद्धाभाव से मां कालरात्रि के पूजन का विधान है। 'महागौरीति अष्टमम्' नवरात्र के आठवें दिन भगवती के महागौरी स्वरूप का पूजन करने का विधान है। 'नवमं सिद्धिदात्री' नवरात्र के नवें दिन नौ वर्ष की बालिका में सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली मोक्षस्वरूपा मां भगवती का ध्यान करते हुए व्रत-उपवास, अनुष्ठान पूर्ण किया जाता है। इस प्रकार नौ रूपों में माँ आदिशक्ति की कृपा से जीवन सम्पूर्ण विकारों से निर्मूल होकर सौभाग्य के योग्य हो जाता है।

इस नवरात्रि साधना से साधक को आध्यात्मिक उपलब्धियों के साथ-साथ श्री समृद्धि, ऐश्वर्य, सुख-शांति का विशेष लाभ प्राप्त होता है। साधक को लक्ष्मी, सरस्वती काली का वरदान मिलता है। साधकगण अपने जीवन के आध्यात्मिक एवं भौतिक सभी सुयोग जगाने में सफल होते हैं। इसलिए हर साधक को जीव उत्थान आत्म परिष्कार एवं सुख सौभाग्य पाने के लिए नवरात्रि काल में मां जगदम्बा के सान्निध्य में बैठकर विधि पूर्वक साधना करके जीवन सौभाग्य जगाना चाहिए।

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