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गुरु-शरणागति से अद्वैत-साक्षात्कार तक: वेदांत का परम रहस्य और साधना का शिखर

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Dainik India News

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गुरु-शरणागति से अद्वैत-साक्षात्कार तक: वेदांत का परम रहस्य और साधना का शिखर

दैनिक इंडिया न्यूज़ सतना मध्य प्रदेश। राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह के सान्निध्य में पूज्या माँ पूर्णप्रज्ञा द्वारा प्रतिपादित यह दार्शनिक प्रवचन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, अपितु वेदांत के परम रहस्य का सजीव अनावरण है। यह वह चिंतनधारा है, जो साधक को बाह्य अनुष्ठानों की परिधि से उठाकर अंतर्मन की उस सूक्ष्मतम भूमि तक ले जाती है, जहाँ द्वैत का समस्त आवरण विलीन हो जाता है और अद्वैत का शाश्वत सत्य प्रकट होता है। किन्तु इस दिव्य यात्रा का आरंभ किसी बाह्य मार्ग से नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता और गुरु-शरणागति के अमोघ साधन से होता है—यही माँ पूर्णप्रज्ञा के उपदेश का केंद्रीय मर्म है।

वेदांत के अनुसार, मनुष्य का वास्तविक स्वरूप “ब्रह्म” ही है—नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त। परंतु “अविद्या” के कारण वही आत्मा स्वयं को सीमित “जीव” के रूप में अनुभव करती है। यह भ्रांति ही “द्वैत” का आधार है, जहाँ साधक अपने और परमात्मा के मध्य भेद का अनुभव करता है। माँ पूर्णप्रज्ञा ने इस बिंदु को अत्यंत सूक्ष्मता से स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक अंतःकरण में कषाय-कल्मष—अर्थात् राग, द्वेष, मद, मोह और कपट—का अंश मात्र भी विद्यमान है, तब तक अद्वैत का बोध केवल बौद्धिक कल्पना बना रहता है। इसीलिए संत परंपरा ने निर्मलता को साधना का प्रथम सोपान माना है।

गोस्वामी तुलसीदास की वाणी इस सत्य को प्रतिध्वनित करती है—

निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा।”

यह चौपाई केवल भक्ति का भाव नहीं, बल्कि वेदांत का सार है—जहाँ परम सत्य की प्राप्ति के लिए अंतःकरण की निष्कपटता अनिवार्य शर्त बन जाती है। माँ पूर्णप्रज्ञा ने इसे उद्धृत करते हुए कहा कि अद्वैत कोई दार्शनिक सिद्धांत मात्र नहीं, बल्कि वह अनुभूति है, जो केवल निर्मल चित्त में ही उदित होती है।

किन्तु यह निर्मलता प्राप्त कैसे हो? यही वह प्रश्न है, जहाँ साधना का मार्ग जटिल प्रतीत होने लगता है। माँ पूर्णप्रज्ञा ने इस गूढ़ प्रश्न का समाधान “गुरु” के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि द्वैत से अद्वैत की यात्रा में जो सबसे बड़ी बाधा है, वह स्वयं साधक का चित्त है—जो मोह, संशय और अहंकार से ग्रस्त होकर सत्य से विमुख रहता है। इन समस्त अवरोधों को दूर करने वाला यदि कोई है, तो वह केवल गुरु है—जो अज्ञान के अंधकार में ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करता है।

गुरु गीता में कहा गया है—

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”

यह श्लोक केवल स्तुति नहीं, बल्कि वेदांत का साक्षात् प्रतिपादन है—जहाँ गुरु को ब्रह्मस्वरूप माना गया है। माँ पूर्णप्रज्ञा ने स्पष्ट किया कि गुरु कोई बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि वह माध्यम है, जिसके द्वारा साधक अपने भीतर स्थित ब्रह्म को पहचानता है। गुरु वह सेतु है, जो जीव को ब्रह्म से जोड़ता है।

इस संदर्भ में स्कंद पुराण का यह वचन अत्यंत प्रासंगिक है—

न गुरोरधिकं तत्त्वं, न गुरोरधिकं तपः।”

अर्थात् गुरु से बढ़कर कोई तत्त्व नहीं, और गुरु से श्रेष्ठ कोई तप नहीं। यह उद्घोष इस तथ्य को स्थापित करता है कि समस्त साधना, समस्त यज्ञ, समस्त तप—अंततः गुरु-कृपा के बिना निष्फल हैं। माँ पूर्णप्रज्ञा ने इसी सत्य को अत्यंत मार्मिक दृष्टांत के माध्यम से स्पष्ट किया—यदि एक अत्यंत सुंदर दीपक अंधकारमय कक्ष में रखा हो, परंतु उसमें ज्योति न जले, तो उसका सौंदर्य व्यर्थ है; उसी प्रकार, गुरु-कृपा के बिना ज्ञान भी अज्ञान ही बना रहता है।

वेदांत के महावाक्य—“अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि”—तभी जीवंत होते हैं, जब साधक गुरु के माध्यम से उनके वास्तविक अर्थ का अनुभव करता है। अन्यथा, वे केवल शब्द बनकर रह जाते हैं। माँ पूर्णप्रज्ञा ने कहा कि अद्वैत का बोध किसी तर्क या वाद-विवाद से नहीं, बल्कि गुरु की कृपा से प्राप्त होने वाली अनुभूति से होता है।

मीमांसा दर्शन भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि यज्ञ और साधना का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है, जब वह विधिपूर्वक, श्रद्धापूर्वक और गुरु के निर्देशन में संपन्न हो। अन्यथा, कर्म केवल कर्मकांड बनकर रह जाता है। इस प्रकार, यज्ञ, गुरु और ज्ञान—ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं, और इनके समन्वय से ही साधक मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

सनातन परंपरा में यह भी देखा गया है कि स्वयं दिव्य अवतारों ने भी गुरु की शरण ग्रहण की—श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र से शिक्षा प्राप्त की, श्रीकृष्ण ने गुरु संदीपनि का आश्रय लिया। यह परंपरा यह स्पष्ट करती है कि गुरु-शरणागति कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

अतः माँ  का यह प्रवचन केवल एक दार्शनिक व्याख्यान नहीं, बल्कि एक आह्वान है—अपने अंतःकरण को निर्मल करने का, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण का, और अद्वैत के उस परम सत्य को अनुभव करने का, जो स्वयं हमारे भीतर विद्यमान है। जब तक साधक अपने भीतर के अंधकार को गुरु-कृपा की ज्योति से प्रकाशित नहीं करता, तब तक वह परम तत्व को प्राप्त नहीं कर सकता।

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