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भागवत-शरणागति : निष्कपट-समर्पण से पाप-प्रक्षालन और ब्रह्म-विलयन की परमावस्था

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भागवत-शरणागति : निष्कपट-समर्पण से पाप-प्रक्षालन और ब्रह्म-विलयन की परमावस्था

मानव-चेतना की परम यात्रा का यदि एकमात्र निष्कर्ष संक्षेप में निरूपित किया जाए, तो वह निःसंदेह “भागवत-शरणागति” है—

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  दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली।एक ऐसी अद्वितीय आध्यात्मिक परिणति, जिसमें जीव अपने समस्त अहंकार, दम्भ, कपट और कर्मजन्य आवरणों का समूल परित्याग कर स्वयं को पूर्णतया परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है। श्रीमद्भागवत महापुराण, भगवद्गीता तथा वेदांत—इन तीनों के समन्वित वाङ्मय में यह प्रतिपादित है कि शरणागति कोई साधारण साधना नहीं, अपितु समस्त साधनाओं का परम-संलयन, परिपाक और परिपूर्णता है। किन्तु क्या यह समर्पण केवल वाचिक उच्चारण है, या यह आत्मा की किसी गूढ़, आन्तरिक क्रांति का द्योतक है? यही प्रश्न इस सम्पूर्ण विमर्श की अधिष्ठान-भूमि बनता है।

शास्त्र उद्घोष करते हैं कि शरणागति का प्रथम एवं अनिवार्य सोपान है—निष्कपटता। जब तक जीव के अन्तःकरण में छल, प्रपंच, दुरभिसंधि और आत्म-प्रवंचना की सूक्ष्म वृत्तियाँ स्पंदित होती रहती हैं, तब तक उसकी भक्ति बाह्याचार मात्र बनी रहती है। श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान को “भावग्राही” कहा गया है—अर्थात् वे बाह्य आचरण की अपेक्षा अंतःकरण की निर्मलता को ही ग्राह्य मानते हैं। फलतः शरणागति का वास्तविक उद्गम मन के गूढ़तम स्तर पर घटित होता है, जहाँ व्यक्ति अपने समस्त आभरणों और आडंबरों का विसर्जन कर ईश्वर के सम्मुख निष्कपट, निर्विकल्प और निःशेष रूप से उपस्थित होता है।

इसी सत्य का परम-घोष भगवद्गीता (18.66) में भगवान श्रीकृष्ण के वचनों में प्रतिध्वनित होता है—

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।”

यह वचन केवल उपदेश नहीं, अपितु परमात्मा का अभय-संविद है—एक ऐसा दिव्य आश्वासन, जिसमें ईश्वर स्वयं अपने शरणागत के समस्त पाप-भार के परिमार्जन का दायित्व स्वीकार करते हैं। तथापि “सर्वधर्मान्परित्यज्य” का आशय केवल बाह्य कर्तव्यों का त्याग नहीं, बल्कि अहंकार-जन्य समस्त आग्रहों, वासनाओं और स्वत्व-बोध का पूर्ण विसर्जन है। यही वह बिंदु है, जहाँ से शरणागति का वास्तविक द्वार उद्घाटित होता है।

किन्तु इस दिव्य उद्घोष के मध्य एक सूक्ष्म दार्शनिक जिज्ञासा पुनः उभरती है—यदि शरणागति से समस्त पापों का प्रक्षालन संभव है, तो क्या शरणागति के लिए पूर्वापेक्षाकृत निष्पाप होना अनिवार्य है? इस प्रतीत होने वाले विरोधाभास का समाधान शास्त्र अत्यंत सूक्ष्मता से करते हैं। पापों का समूल नाश शरणागति से होता है, किन्तु शरणागति की पात्रता के लिए आवश्यक है—पापबोध, पापविमुखता और आत्म-शुद्धि की तीव्र आकांक्षा। अतः यहाँ पूर्ण निष्पापता नहीं, अपितु निष्कपटता ही प्रवेश-द्वार है।

इस सिद्धांत का सजीव प्रतिपादन श्रीमद्भागवत महापुराण के “अजामिल-प्रसंग” में परिलक्षित होता है। अजामिल, जिसने जीवनपर्यंत अधर्म का आचरण किया, अंतकाल में निष्कपट भाव से “नारायण” नाम का उच्चारण करता है, और उसी क्षण उसका समस्त पाप-भार विनष्ट हो जाता है। यह प्रसंग इस तथ्य का प्रामाणिक उद्घाटन करता है कि शरणागति का प्रभाव कालातीत और सर्वग्राही है—परंतु उसका मूलाधार निष्कपट भाव ही है, न कि बाह्य पवित्रता।

इसी क्रम में “गजेन्द्र-मोक्ष” का प्रसंग शरणागति के चरम उत्कर्ष का अद्वितीय दृष्टांत प्रस्तुत करता है। जब गजेन्द्र, ग्राह के भीषण पाश में आबद्ध होकर समस्त लौकिक उपायों से निराश हो जाता है, तब वह परमात्मा का आवाहन करता है—न किसी विधि-विधान से, न किसी औपचारिक मन्त्र से, बल्कि हृदय की दारुण, निष्कपट व्याकुलता से। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित “गजेन्द्र-स्तुति” इस सत्य को उद्घाटित करती है कि जब जीव अपनी असहायता का पूर्ण स्वीकार कर ईश्वर पर अखण्ड आश्रय ग्रहण करता है, तभी शरणागति का वास्तविक उदय होता है। और उसी क्षण भगवान विष्णु का अविर्भाव होकर उसे मुक्त करना इस सिद्धान्त की अपरिहार्य फलश्रुति है।

अब विचारणीय है—शरणागति के उपरांत जीव के कर्म, विशेषतः प्रारब्ध कर्म, किस प्रकार व्यवहार करते हैं? वेदान्त का यह अतीव गूढ़ विषय है। भगवद्गीता (4.37) में प्रतिपादित है कि ज्ञानाग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देती है। तथापि प्रारब्ध—जो वर्तमान देह के साथ फलित हो रहा है—देह-धारण तक प्रायः प्रवहमान रहता है। किन्तु शरणागत के लिए वह बन्धनकारक नहीं रह जाता; वह केवल देहगत अनुभूति बनकर सीमित हो जाता है। जीव स्वयं को कर्ता-भोक्ता के रूप में नहीं, अपितु साक्षी-चैतन्य के रूप में अनुभूत करता है—और यहीं से मुक्तावस्था का उदय होता है।

वेदों एवं उपनिषदों में भी शरणागति का यह तत्त्व अत्यंत सूक्ष्म, किन्तु गूढ़ रूप से निहित है। कठोपनिषद का उद्घोष—“तमेवैकं जानथ आत्मानम्”—एकनिष्ठ परमाश्रय की ओर संकेत करता है; वहीं श्वेताश्वतर उपनिषद में परमकारण की शरण ग्रहण करने की अनिवार्यता प्रतिपादित है। यहाँ शरणागति केवल भक्ति का अंग नहीं, अपितु अद्वैत-ब्रह्मबोध की पूर्वपीठिका के रूप में प्रतिष्ठित होती है।

जब शरणागति अपनी पराकाष्ठा को प्राप्त होती है, तब जीव के भीतर एक अद्वितीय आध्यात्मिक रूपांतरण घटित होता है—अहंकार का लय, वासनाओं का क्षय, और आत्मा का परमात्मा में अभेद-भाव से प्रतिष्ठापन। यही वह अवस्था है, जिसे वेदांत “ब्रह्म-विलयन”, “कैवल्य” अथवा “अद्वैत-सिद्धि” के रूप में अभिहित करता है। यहाँ पाप-पुण्य, बन्धन-मोक्ष—समस्त द्वैत-विभाजन लीन हो जाते हैं, और केवल अखण्ड, निरुपाधिक चैतन्य की अनुभूति शेष रहती है।

किन्तु इस परमावस्था तक की यात्रा अत्यंत सूक्ष्म, दुरूह और अन्तर्मुखी है। यह बाह्य साधनाओं के वैभव से नहीं, अपितु अन्तःकरण के निरन्तर परिशोधन से संभव होती है। जब तक मन के सूक्ष्म कोटरों में अहंकार, स्वार्थ और दम्भ का अंश शेष है, तब तक शरणागति आभासी बनी रहती है। अतः संत-परम्परा निरंतर इस तथ्य पर बल देती है कि शरणागति का मूलाधार है—स्वत्व का समूल विसर्जन और ईश्वर-तत्त्व में अखण्ड आस्था।

और जब यह विसर्जन पूर्णता को प्राप्त होता है, तब दैवी-कृपा का अवतरण अनिवार्य हो जाता है। यह कृपा केवल पाप-नाश तक सीमित नहीं रहती, अपितु जीव को उसकी स्वाभाविक, शाश्वत ब्रह्मस्वरूपता में प्रतिष्ठित कर देती है। तब जीव यह अनुभव करता है कि जिसे पाने के लिए वह युगों से भटक रहा था, वह तो उसके स्वयं के अंतःकरण में नित्य-विराजमान था।

अंततः, भागवत-शरणागति कोई साधारण आध्यात्मिक उपक्रम नहीं, बल्कि अस्तित्व की परम परिपूर्णता है—वह स्थिति जहाँ जीव स्वयं को पूर्णतः ईश्वर के अधीन कर देता है, और उसी क्षण समस्त बन्धनों से मुक्त होकर ब्रह्म के साथ अपने अभेद ऐक्य का अनुभव करता है- जितेंद्र प्रताप सिंह अखिल भारतीय अध्यक्ष राष्ट्रीय सनातन महासंघ

यही शरणागति का परम रहस्य है—समर्पण ही शुद्धि है, समर्पण ही मुक्ति है, और समर्पण ही ब्रह्म में जीव का अंतिम विलयन है- मां पूर्ण प्रज्ञा 

(इस गूढ़ विषय का द्वितीय भाग—भागवत शरणागति के रहस्य का और भी सूक्ष्म, तात्त्विक एवं अनुभवात्मक विस्तार—अगले लेख में प्रस्तुत किया जाएगा।)

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