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आत्मनिर्भरता के मोह और परस्पर-निर्भरता का तत्त्वदर्शन

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Dainik India News

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समकालीन जीवन में “आत्मनिर्भरता” का उद्घोष जितना आकर्षक प्रतीत होता है, उतना ही वह सूक्ष्म स्तर पर एक गहन दार्शनिक भ्रम को भी जन्म देता है। मनुष्य जब यह कहता है—“मैं आत्मनिर्भर हूँ”—तो वह अनजाने ही अपने अस्तित्व को एक पृथक्, स्वायत्त और पूर्ण सत्ता के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है। किन्तु यदि इस उद्घोष को तत्त्वदृष्टि से परखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कथन वस्तुतः अहंकार की पराकाष्ठा का परिचायक है, न कि किसी वास्तविक स्वतंत्रता का।

भारतीय दर्शन, विशेषतः वेदांत, इस विषय को अत्यन्त सूक्ष्मता से स्पष्ट करता है। वेदान्त का मूल प्रतिपादन है कि जब तक “मैं” का बोध दृढ़ है—जब तक अहंकार, स्वत्वाभिमान, छल, कपट और दम्भ का सूक्ष्मतम अंश भी शेष है—तब तक जीव द्वैत के क्षेत्र में ही विचरण करता है। द्वैत का अर्थ केवल भिन्नता नहीं, अपितु वह मानसिक अवस्था है, जहाँ व्यक्ति स्वयं को अन्य से पृथक्, श्रेष्ठ और स्वतंत्र मानता है। और यही वह भूमि है, जहाँ “आत्मनिर्भरता” का मिथ्या-वृक्ष पल्लवित होता है।

वस्तुतः जीवन का यथार्थ इससे सर्वथा भिन्न है। मनुष्य का अस्तित्व स्वयं में पूर्ण नहीं, अपितु परस्पर संबंधों के जाल में गुंथा हुआ है। जो व्यक्ति अपने श्रम से जीविका अर्जित करता है, वह भी किसी संस्था, किसी व्यवस्था, किसी ग्राहक या किसी सहयोगी पर आश्रित होता है। जो उद्यमी स्वयं को स्वावलम्बी समझता है, वह भी अपने कर्मचारियों, आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ताओं के बिना एक क्षण भी टिक नहीं सकता। इस प्रकार प्रत्येक “मैं” के पीछे असंख्यहम” निहित होते हैं—किन्तु अहंकार उस “हम” को अदृश्य कर देता है।

यहीं से अद्वैत की ओर गमन का वास्तविक पथ प्रारम्भ होता है। अद्वैत का अर्थ केवल आध्यात्मिक एकत्व नहीं, अपितु जीवन-दृष्टि का वह रूपांतरण है, जिसमें व्यक्ति यह अनुभव करता है कि वह अन्य से पृथक् नहीं, अपितु उसी व्यापक चेतना का एक अविभाज्य अंश है। जब “मैं” का कठोर आवरण ढीला पड़ता है, जब अहंकार का दम्भ शिथिल होता है, जब छल और कपट का अंधकार हटता है—तभी अद्वैत का प्रकाश प्रकट होता है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि “आत्मनिर्भरता” का उद्घोष प्रायः एक आभासी स्वतंत्रता है, जबकि “परस्पर-निर्भरता” ही वास्तविकता है। हम एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के सहयोग से ही सार्थक होता है। यदि समाज से सहयोग का सूत्र हट जाए, तो कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही समर्थ क्यों न हो, आगे नहीं बढ़ सकता।

अतः यह कहना अधिक यथार्थपरक है कि मनुष्य “स्वतंत्र” नहीं, अपितु “संबद्ध” है; वह “अकेला” नहीं, अपितु “समन्वित” है। और यही बोध उसे अहंकार से मुक्त करता है। जब “मैं” का आग्रह समाप्त होता है, तब “हम” का उदय होता है—और यही “हम” अद्वैत की दिशा में पहला सजीव कदम है।

अंततः, यह समझ लेना ही पर्याप्त है कि आत्मनिर्भरता का उद्घोष जहाँ अहंकार का परिचायक है, वहीं परस्पर-निर्भरता की स्वीकृति विनम्रता, सत्य और तत्त्वदर्शन का परिचायक है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, तभी हम वास्तविक पूर्णता की ओर अग्रसर होते हैं। यही अद्वैत का सार है—जहाँ भिन्नता का अहंकार विलीन होकर एकत्व की अनुभूति में परिवर्तित हो जाता है।

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