

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,नागौद (सतना, मध्यप्रदेश) की पावन धरा पर माँ पीताम्बरा के महायज्ञ के प्रथम दिवस का वह अलौकिक क्षण केवल एक अनुष्ठानिक उपक्रम भर नहीं था, अपितु चेतना के उच्चतर आयामों की ओर उद्घाटित होता हुआ एक दिव्य द्वार था। यज्ञाग्नि की धवल ज्वालाओं के मध्य, जब वायुमण्डल वैदिक मन्त्रों की स्पन्दित अनुगूँज से अभिभूत हो उठा, उसी दिव्य वातावरण में वेदान्त की महाज्ञानी साधिका, माँ पूर्ण प्रज्ञा के श्रीमुख से उद्भूत “भागवत-शरणागति” पर आधारित प्रवचन ने उपस्थित जनसमूह को केवल श्रवण नहीं, अपितु अनुभूति के अप्रतिम आयाम में प्रविष्ट कर दिया। उस क्षण में श्रद्धा, ज्ञान और आत्मानुभूति का ऐसा अद्वितीय समन्वय प्रकट हुआ, जिसने साधारण जिज्ञासु को साधक, और साधक को आत्मद्रष्टा बनने की दिशा में प्रेरित कर दिया।

इस दिव्य अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह अपने परिवार एवं स्नेहीजनों सहित उपस्थित रहे। उनकी सहभागिता केवल औपचारिक उपस्थिति नहीं थी, बल्कि वह उस आध्यात्मिक तन्मयता का प्रत्यक्ष प्रमाण थी, जिसमें एक जिज्ञासु आत्मा, शास्त्र और साधना के संगम पर खड़ी होकर सत्य के अमृत का पान करने को आतुर हो उठती है। यज्ञ की पावन परिणति के पश्चात जब उन्होंने माँ पूर्ण प्रज्ञा के वचनों का श्रवण किया, तब वह केवल श्रवण नहीं रहा—वह एक ऐसी अन्तःयात्रा में परिवर्तित हो गया, जिसमें प्रत्येक शब्द चेतना के गूढ़तम स्तरों को स्पर्श करता हुआ आत्मा के मर्मस्थल में उतरता चला गया।
माँ पूर्ण प्रज्ञा ने अपने प्रवचन का आरम्भ ही एक ऐसे प्रश्न से किया, जो सामान्य जिज्ञासा का विषय नहीं, बल्कि अस्तित्व के मूलाधार को झकझोर देने वाला था—क्या शरणागति केवल एक भावात्मक क्रिया है, या वह ब्रह्म के द्वार का उद्घाटन करने वाली परम साधना? यह प्रश्न जैसे ही श्रवण-पटल पर उदित हुआ, वैसे ही उपस्थित प्रत्येक श्रोता के अन्तर्मन में एक सूक्ष्म कम्पन का संचार होने लगा। यह कम्पन केवल विचार का उदय नहीं था; यह चेतना के स्थिर जल में उठी वह तरंग थी, जो भीतर छिपे हुए अनुत्तरित प्रश्नों को एक-एक कर जागृत करने लगी।
उन्होंने प्रतिपादित किया कि “भागवत-शरणागति” कोई बाह्य अनुष्ठान या औपचारिक समर्पण नहीं, बल्कि आत्मसत्ता के पूर्ण विसर्जन की वह प्रक्रिया है, जिसमें ‘अहं’ की प्रत्येक परत क्रमशः विलीन होती चली जाती है। यह वह मार्ग है जहाँ साधक अपने समस्त अर्जित ज्ञान, अभिमान, प्रयास और अपेक्षाओं को एक-एक कर त्यागता हुआ उस अनन्त सत्ता के सम्मुख निरावृत हो जाता है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं। परन्तु यहीं एक गहन द्वंद्व जन्म लेता है—जब सब कुछ त्याग दिया जाए, तब शेष क्या रह जाता है? क्या यह शून्यता है, या वही पूर्णता, जिसकी खोज में साधक अनादिकाल से भटक रहा है?
इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने किसी प्रत्यक्ष निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि साधना की आन्तरिक प्रक्रिया के माध्यम से उद्घाटित किया। उन्होंने कहा कि जब साधक का चित्त भागवत तत्व के स्पर्श में आता है, तब उसके भीतर संचित संस्कारों का मन्थन आरम्भ होता है। यह मन्थन सुखद नहीं होता; यह साधक को भीतर तक झकझोर देता है। उसे प्रतीत होता है कि वह पतन की ओर अग्रसर है, उसकी साधना निष्फल हो रही है, और उसका आत्मविश्वास डगमगा रहा है। किन्तु वास्तव में यही वह क्षण होता है, जहाँ से शरणागति की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है—जहाँ साधक अपने प्रयासों की सीमा को पहचानकर उस परम सत्ता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाता है।
उन्होंने अत्यन्त सूक्ष्मता से यह भी स्पष्ट किया कि यह समर्पण किसी बाह्य आडम्बर से नहीं, बल्कि अन्तःकरण की उस स्थिति से उत्पन्न होता है, जहाँ जीव अपनी सम्पूर्ण असमर्थता को स्वीकार करता है। यही वह क्षण है जब भगवद्गीता का “प्रपद्यन्ते” शब्द सजीव हो उठता है—जहाँ जीव अपने समस्त आश्रयों के पतन के पश्चात भी केवल परमात्मा को ही अपना अंतिम आधार मान लेता है। और जैसे ही यह स्वीकार घटित होता है, वैसे ही माया का आवरण धीरे-धीरे विलीन होने लगता है—बिना किसी शोर, बिना किसी विस्फोट के, एक मृदुल, किन्तु अटल प्रक्रिया के रूप में।
किन्तु यह विलयन साधक के लिए सहज नहीं होता। जब ‘अहं’ का आधार ही डगमगाने लगता है, तब भय का उदय होना स्वाभाविक है। माँ पूर्ण प्रज्ञा ने इसी बिन्दु को अत्यन्त मार्मिकता से स्पर्श करते हुए कहा कि यह भय ही शरणागति की अग्निपरीक्षा है। यदि साधक इस भय को भी समर्पित कर सके, तो वही भय उसके लिए ब्रह्मद्वार का उद्घाटन कर देता है। यहाँ विनाश नहीं होता, बल्कि रूपान्तरण होता है—सीमित का असीम में, जड़ का चेतन में, और अज्ञान का प्रकाश में रूपान्तरण।
उन्होंने गजेन्द्र-मोक्ष के प्रसंग को इस सत्य का जीवंत उदाहरण बताते हुए कहा कि जब समस्त सामर्थ्य समाप्त हो जाती है, तब जो पुकार हृदय की गहराइयों से उत्पन्न होती है, वही सच्ची शरणागति है। वह पुकार किसी विधि-विधान की मोहताज नहीं होती; वह आत्मा की वेदना का शुद्धतम स्वर होती है, और उसी क्षण दैवी अनुग्रह का अवतरण होता है। इस प्रकार शरणागति की पराकाष्ठा में असहायता ही परम सामर्थ्य का रूप धारण कर लेती है।
प्रवचन के उत्तरार्ध में उन्होंने वेदान्त के उस परम सत्य को उद्घाटित किया, जहाँ साधक स्वयं को कर्ता, भोक्ता या ज्ञाता के रूप में नहीं, बल्कि शुद्ध साक्षी के रूप में अनुभव करता है। यही वह अवस्था है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का त्रिविध भेद लुप्त हो जाता है और केवल अद्वैत की अखण्ड सत्ता शेष रह जाती है। यह अनुभूति क्षणिक झलक से प्रारम्भ होकर धीरे-धीरे स्थिरता को प्राप्त करती है, और साधक को उस परम बोध तक पहुँचा देती है जहाँ कोई प्रश्न शेष नहीं रहता।
अन्ततः उन्होंने “पूर्णमदः पूर्णमिदम्” के महावाक्य के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि ब्रह्म न तो घटता है, न बढ़ता है—वह सदा पूर्ण है। जगत का उद्भव उसी से है, और उसका विलय भी उसी में है, किन्तु उसकी पूर्णता अक्षुण्ण रहती है। यही वह बोध है जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है, क्योंकि जो परिवर्तनशील है, वह सत्य नहीं हो सकता; और जो सत्य है, वह कभी परिवर्तित नहीं होता।
इस प्रकार माँ पूर्ण प्रज्ञा का यह प्रवचन केवल शब्दों का संप्रेषण नहीं था, बल्कि चेतना की गहराइयों में उतरने का एक आमंत्रण था—एक ऐसी यात्रा, जिसमें साधक स्वयं को खोकर ही स्वयं को प्राप्त करता है। और यही “भागवत-शरणागति” का परम रहस्य है—जहाँ समर्पण की पराकाष्ठा में जीव और ब्रह्म का भेद विलीन हो जाता है, और केवल अद्वैत की अखण्ड, स्वयंप्रकाशित, परम पूर्णता शेष रह जाती है।