51 से अधिक सामाजिक, धार्मिक एवं व्यापारिक संस्थाओं ने किया संघर्षशील योद्धाओं का अभिनंदन

दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ/इन्दौर, 24 जून 2026। धर्म, संस्कृति और सभ्यतागत अस्मिता की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष जब सफलता के शिखर को स्पर्श करते हैं, तब वे केवल किसी एक व्यक्ति अथवा संगठन की उपलब्धि नहीं रह जाते, बल्कि संपूर्ण समाज की सामूहिक चेतना के उत्सव में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी भावना को मूर्त रूप देते हुए भारत रक्षा मंच, इन्दौर विभाग द्वारा स्वामी श्री प्रीतमदास सभागृह में "धार भोजशाला विजय के योद्धाओं का सम्मान – संकल्प से सिद्धि" विषयक भव्य सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में धार स्थित माता वाग्देवी मंदिर भोजशाला प्रकरण में निर्णायक भूमिका निभाने वाले योद्धाओं का 51 से अधिक सामाजिक, धार्मिक एवं व्यापारिक संस्थाओं द्वारा संत कृष्णगोपाल दास महाराज (पूर्व संघ जिला प्रचारक किशोर जी गोरे) की गरिमामयी उपस्थिति में शाल, श्रीफल एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर अभिनंदन किया गया।

सम्मान समारोह का वातावरण केवल औपचारिक अभिनंदन तक सीमित नहीं था, बल्कि वह दशकों तक चले एक ऐतिहासिक संघर्ष की जीवंत गाथा का साक्षी बन गया। उपस्थित जनसमूह की उत्सुकता का केंद्र यह जानना था कि आखिर वह कौन-सी प्रेरणा, धैर्य और रणनीति थी जिसने वर्षों से लंबित इस विषय को विजय के मुकाम तक पहुँचाया।

इसी जिज्ञासा का समाधान करते हुए भोजशाला प्रकरण के सूत्रधार एवं प्रमुख याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी तथा अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने उपस्थित समाजजनों को संघर्ष, न्यायिक प्रक्रिया और ऐतिहासिक विजय तक की संपूर्ण यात्रा से अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सम्मान किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, धर्मरक्षा और समाज की सामूहिक शक्ति का सम्मान है। उन्होंने बताया कि वर्षों तक चले अथक प्रयास, दस्तावेजी साक्ष्यों के गहन अध्ययन और संवैधानिक मार्ग पर अटूट विश्वास ने अंततः इस ऐतिहासिक उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त किया।

अपने उद्बोधन में कुलदीप तिवारी ने कहा कि माता वाग्देवी की कृपा और प्रेरणा ही उन्हें अपने गृहक्षेत्र लखनऊ से लगभग 900 किलोमीटर दूर धार तक लेकर आई। उन्होंने कहा कि यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरी की नहीं थी, बल्कि एक ऐसे सांस्कृतिक संघर्ष की थी, जिसमें धैर्य, समर्पण और दृढ़ विश्वास की निरंतर परीक्षा होती रही। समाज के विविध वर्गों को जोड़ने और विषय को प्रभावी रूप से न्यायालय तक पहुँचाने के सामूहिक प्रयासों ने ही विजय का मार्ग प्रशस्त किया।

कुलदीप तिवारी ने भावुक स्वर में कहा कि यह विजय उन असंख्य कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों को समर्पित है, जिन्होंने दशकों तक भोजशाला की मुक्ति के लिए संघर्ष किया, लाठियाँ खाईं, मुकदमे झेले और कारावास का कष्ट सहा। उन्होंने आंदोलन के तीन अमर बलिदानियों—लक्ष्मण सिंह, बन सिंह और अंतर सिंह—को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कहा कि यह उपलब्धि उनके त्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतिफल है। जिन हुतात्माओं ने धर्म और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, आज की विजय वास्तव में उन्हीं के संकल्पों की सिद्धि है।
उन्होंने कहा कि अयोध्या के पश्चात प्राप्त यह ऐतिहासिक सफलता दूरगामी प्रभाव उत्पन्न करेगी। इससे न्यायपालिका के प्रति समाज का विश्वास और अधिक सुदृढ़ होगा तथा धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के प्रति नई आशा का संचार होगा। यह विजय केवल एक धार्मिक स्थल की विजय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और करोड़ों श्रद्धालुओं के आत्मविश्वास के पुनर्जागरण का प्रतीक है।
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल भोजशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृतियों, ऐतिहासिक सत्य और सभ्यतागत पहचान की पुनर्प्रतिष्ठा का व्यापक अभियान है। उन्होंने समाज को संकल्प दिलाते हुए कहा कि ज्ञानवापी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि जैसे विषयों पर भी संवैधानिक एवं न्यायिक मार्ग से आगे बढ़ते हुए सत्य और न्याय की विजय सुनिश्चित की जाएगी।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि जब कोई समाज अपनी सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा के लिए एकजुट होकर संकल्प लेता है, तब वह संकल्प इतिहास का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। धार भोजशाला की विजय इसी सामाजिक एकात्मता, अटूट श्रद्धा और अदम्य विश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण है। यही कारण है कि इस संघर्ष के नायकों के प्रति सम्मान की भावना अब देश के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देने लगी है।
इसी क्रम में राजधानी लखनऊ में भी कुलदीप तिवारी के योगदान को लेकर विशेष उत्साह और सम्मान का वातावरण देखने को मिला। संस्कृत भारती के क्षेत्र संपर्क प्रमुख (पूर्वी उत्तर प्रदेश) एवं राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह द्वारा ज्येष्ठ मास के पावन आठवें बड़े मंगल के अवसर पर राष्ट्रमंगल एवं लोककल्याण को समर्पित विराट भंडारे का दिव्य आयोजन किया गया था। इस आयोजन में कुलदीप तिवारी को पूर्व निर्धारित रूप से विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।
जैसे ही आयोजन स्थल पर उपस्थित संतों, विद्वानों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह ज्ञात हुआ कि धार भोजशाला विजय अभियान के प्रमुख सूत्रधार कुलदीप तिवारी लखनऊ पधारे हैं, वैसे ही उनसे मिलने और उनका अभिनंदन करने की उत्सुकता वातावरण में व्याप्त हो गई। उपस्थित लोगों ने उन्हें केवल एक अतिथि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान के संघर्ष के जीवंत प्रतीक के रूप में देखा।
इस अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह, दैनिक इंडिया न्यूज़ के प्रधान संपादक हरिंद्र सिंह, विधान परिषद सदस्य पवन सिंह चौहान, प्रोफेसर डॉ. आलोक कुमार, समर्थ भारत के प्रदेश संयोजक डॉ. विवेक राय सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवकों एवं अनेक गणमान्य नागरिकों ने उनका अत्यंत आत्मीयता और सम्मान के साथ स्वागत किया। स्वागत के दौरान उपस्थित जनसमूह ने उनके संघर्ष और उपलब्धियों के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया।
समारोह के दौरान जितेंद्र प्रताप सिंह एवं विधान परिषद सदस्य पवन सिंह चौहान ने कुलदीप तिवारी को पंचमुखी हनुमान जी का दिव्य चित्र भेंट कर सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक औपचारिकता नहीं था, बल्कि धर्मरक्षा, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रनिष्ठा के प्रति समर्पित उनके दीर्घ संघर्ष के प्रति समाज की सामूहिक कृतज्ञता का प्रतीक था।
मीडिया से संवाद करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा, “हमारे लिए यह अत्यंत गर्व का विषय है कि भारतभूमि पर आज भी कुलदीप तिवारी जैसे राष्ट्रभक्त, निर्भीक और संकल्पवान युवा उपस्थित हैं, जो व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के लिए संघर्ष करने का साहस रखते हैं। ऐसे व्यक्तित्व नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं और भारत की सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा प्रदान करते हैं।”
जितेंद्र प्रताप सिंह के इन विचारों का समर्थन करते हुए विधान परिषद सदस्य पवन सिंह चौहान ने कुलदीप तिवारी के योगदान को ऐतिहासिक बताते हुए उन्हें पुनः अपने आवास पर विशेष सम्मान समारोह हेतु सादर आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि भोजशाला विजय केवल एक कानूनी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का उद्घोष है तथा ऐसे संघर्षशील व्यक्तित्वों का सम्मान समाज का नैतिक दायित्व है।
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित जनसमूह के मन में एक ही भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी—धार भोजशाला की विजय केवल अतीत की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रारंभिक शंखनाद है। कुलदीप तिवारी जैसे संघर्षशील युवाओं का सम्मान वस्तुतः उस राष्ट्रीय चेतना का सम्मान है, जो भारत की सनातन परंपरा, सांस्कृतिक अस्मिता और सभ्यतागत गौरव को पुनः उसके यथोचित स्थान पर प्रतिष्ठित करने के लिए संकल्पबद्ध है।