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बड़ा मंगल: आस्था का महासमागम या पर्यावरणीय चेतना का निर्णायक मोड़?

लखनऊ से उठी ‘स्वच्छ-हरित’ क्रांति, क्या देश बनेगा सहभागी?

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Dainik India News

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बड़ा मंगल: आस्था का महासमागम या पर्यावरणीय चेतना का निर्णायक मोड़?
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दैनिक इंडिया न्यूज़ , लखनऊ। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं—यह एक कसौटी है। कसौटी इस बात की कि क्या हमारी आस्था प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकती है, या फिर श्रद्धा के नाम पर पर्यावरणीय क्षरण को अनदेखा करती रहेगी। ‘बड़े मंगल’ के अवसर पर लखनऊ ने जिस प्रकार स्वच्छता और हरित चेतना को केंद्र में रखकर एक व्यापक सामाजिक संकल्प लिया है, उसने इस परंपरा को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। अब प्रश्न यह नहीं कि भंडारे कितने बड़े हैं, बल्कि यह है कि वे कितने जिम्मेदार हैं।

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इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में आयोजित मंगलमान अभियान की संगोष्ठी ने आस्था को उत्तरदायित्व से जोड़ते हुए एक नया विमर्श खड़ा किया। उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “नगर निगम द्वारा संचालित स्वच्छता अभियान, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्गदर्शन में चल रहा है, न केवल सराहनीय है, बल्कि यह एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में स्थापित हो रहा है।” उन्होंने आगे जोड़ा कि “इस बार बड़े मंगल पर जो व्यवस्थाएँ विकसित की जा रही हैं, वे सम्पूर्ण देश के लिए एक जीवंत नज़ीर सिद्ध होंगी।” यह कथन केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक संकेत है—कि लखनऊ अब उदाहरण बनने की दिशा में अग्रसर है।

लेकिन इस पहल का वास्तविक अर्थ तब स्पष्ट होता है, जब इसे सामाजिक सहभागिता के आईने में देखा जाए। मंच पर उपस्थित वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष शुक्ल, पूर्व महापौर संयुक्ता भाटिया और पूर्व आईएएस अनीता भटनागर जैन सहित अन्य वक्ताओं ने जिस एक स्वर में ‘स्वच्छता को संस्कार’ बनाने की बात कही, वह इस आंदोलन की आत्मा को परिभाषित करता है। यहाँ प्रशासन और समाज के बीच कोई दूरी नहीं दिखती—बल्कि एक साझा उद्देश्य का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है।

यहीं से यह पहल एक सामान्य कार्यक्रम से आगे बढ़कर जनांदोलन का स्वरूप ग्रहण करती है। ‘बर्तन बैंक’ जैसी अवधारणाएँ, प्लास्टिक और थर्माकोल के बहिष्कार का आह्वान, और ‘जीरो वेस्ट भंडारा’ की परिकल्पना—ये केवल व्यवस्थाएँ नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति के सूत्र हैं। यह वह क्षण है, जहाँ परंपरा और प्रगति एक-दूसरे से टकराती नहीं, बल्कि एक-दूसरे को परिष्कृत करती हैं।

नगर आयुक्त गौरव कुमार द्वारा दी गई प्रशासनिक रूपरेखा इस संकल्प को ठोस आधार प्रदान करती है। 24 घंटे पूर्व पंजीकरण की अनिवार्यता, कचरा प्रबंधन की वैज्ञानिक व्यवस्था, जलापूर्ति की सुनिश्चितता और नियमों के उल्लंघन पर चेतावनी—ये सभी संकेत देते हैं कि यह पहल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि परिणामोन्मुखी है। ‘आदर्श भंडारा प्रतियोगिता’ जैसी पहल इस अभियान को प्रतिस्पर्धात्मक ऊर्जा भी प्रदान करती है, जो इसे और अधिक प्रभावी बना सकती है।

परंतु इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह मौन प्रश्न है, जो हर नागरिक के सामने खड़ा है—क्या हम केवल दर्शक बने रहेंगे, या इस परिवर्तन के सक्रिय सहभागी बनेंगे? क्या हमारी आस्था केवल अनुष्ठान तक सीमित रहेगी, या वह प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी वहन करेगी?

लखनऊ ने अपनी भूमिका निभा दी है—एक दिशा दिखा दी है। अब बारी देश की है।

अगर यह मॉडल सफल होता है, तो यह केवल एक शहर की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक बनेगा। और यदि यह विफल होता है, तो यह केवल एक अभियान की असफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक उदासीनता का प्रमाण होगा।

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