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गुरु के चरणों में नमन, शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता का भाव

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Dainik India News

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गुरु के चरणों में नमन, शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता का भाव

शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देते, वे जीवन को संस्कार, दृष्टि और दिशा प्रदान करते हैं : जितेंद्र प्रताप सिंह

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 दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने अपने गुरु का श्रद्धापूर्वक स्मरण एवं नमन करते हुए देशभर के समस्त शिक्षकों के प्रति हार्दिक शुभकामनाएं एवं कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान केवल एक शिक्षक का नहीं, बल्कि उस प्रकाश-पुंज का है, जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान, विवेक और सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। शिक्षक दिवस वास्तव में उन महान व्यक्तित्वों के प्रति श्रद्धा निवेदित करने का अवसर है, जिनके शब्दों से जीवन की दिशा और संस्कारों से व्यक्तित्व की पहचान निर्मित होती है।

किन्तु गुरु की महिमा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित कर देना भारतीय परंपरा की व्यापक गुरु-दृष्टि को संकुचित करना होगा। भारतीय चिंतन में गुरु वह है, जो शिष्य के भीतर सुप्त सामर्थ्य को पहचानकर उसे जागृत करता है। वह केवल यह नहीं बताता कि क्या पढ़ना है, बल्कि यह भी सिखाता है कि जीवन में क्या चुनना है, किस मार्ग पर चलना है और विपरीत परिस्थितियों में अपने मूल्यों से विचलित हुए बिना कैसे आगे बढ़ना है। यही कारण है कि भारतीय मनीषा ने गुरु को ज्ञान का माध्यम ही नहीं, बल्कि जीवन-निर्माण का आधार माना है।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी भावी पीढ़ी के चरित्र, संस्कार और चिंतन में निहित होती है। इस दृष्टि से शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विद्यालय और शिक्षण संस्थान केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे संस्कार-स्थल हैं जहां राष्ट्र का भविष्य आकार लेता है। शिक्षक के एक प्रेरणादायी वाक्य से किसी विद्यार्थी के भीतर आत्मविश्वास जन्म ले सकता है और एक सही मार्गदर्शन उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है।

इसीलिए शिक्षक के प्रति सम्मान किसी एक दिवस तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जिस समाज में गुरु और शिक्षक का सम्मान जीवंत रहता है, वहां ज्ञान के साथ विनम्रता, उपलब्धि के साथ उत्तरदायित्व और अधिकार के साथ कर्तव्यबोध भी विकसित होता है। आधुनिक समय में तकनीक ने सूचना को अत्यंत सुलभ बना दिया है, लेकिन सूचना और ज्ञान के बीच का अंतर आज भी शिक्षक ही समझाता है। इससे भी आगे बढ़कर, ज्ञान को विवेक और विवेक को जीवन-मूल्य में परिवर्तित करने का कार्य शिक्षक ही करता है।

उन्होंने कहा कि आज जब नई पीढ़ी तीव्र गति से बदलती तकनीकी और सामाजिक परिस्थितियों के बीच अपने भविष्य का निर्माण कर रही है, तब शिक्षकों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। विद्यार्थी को केवल प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है; उसे संवेदनशील नागरिक, उत्तरदायी मनुष्य और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के प्रति सजग व्यक्तित्व बनाना भी आवश्यक है। शिक्षक इसी व्यापक उत्तरदायित्व के माध्यम से शिक्षा को रोजगार से आगे बढ़ाकर जीवन और राष्ट्र-निर्माण से जोड़ते हैं।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने शिक्षक दिवस पर अपने गुरु को नमन करते हुए कहा कि जीवन में प्राप्त प्रत्येक उपलब्धि के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से किसी न किसी गुरु का मार्गदर्शन अवश्य होता है। माता-पिता जीवन प्रदान करते हैं, लेकिन गुरु उस जीवन को सार्थक दिशा देने का सामर्थ्य प्रदान करता है। इसलिए गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अपनी जीवन-यात्रा के उन प्रकाश-स्रोतों को स्मरण करना है, जिनके कारण मनुष्य स्वयं को पहचानने में समर्थ होता है।

उन्होंने देश के सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए उनके स्वस्थ, सुखी एवं सम्मानपूर्ण जीवन की कामना की। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की भावी पीढ़ी के निर्माण में शिक्षक जिस मौन तपस्या का निर्वहन करते हैं, उसका मूल्य किसी पुरस्कार या सम्मान से नहीं आंका जा सकता। शिक्षक वास्तव में वह शक्ति हैं, जो एक विद्यार्थी के व्यक्तित्व में संभावनाओं का बीज रोपकर उसे ऐसा वृक्ष बनने की प्रेरणा देते हैं, जिसकी छाया आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती है।

शिक्षक दिवस पर उनका संदेश यही है कि गुरु को नमन केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को अपने आचरण में उतारकर किया जाना चाहिए—क्योंकि सच्ची गुरु-दक्षिणा वही है, जब शिष्य का जीवन स्वयं अपने गुरु की शिक्षा का जीवंत प्रमाण बन जाए।

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