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जीरो टॉलरेंस के दावे के बीच लोक सेवा आयोग पर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह ने मांगा न्यायिक जवाब

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Dainik India News

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“न्यायपालिका पर पूरा भरोसा, संघर्ष जारी रहेगा” — चयन प्रक्रिया, कथित भ्रष्टाचार, पद पर बने रहने और राजनीतिक दबाव को लेकर सिलसिलेवार सवाल

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा लगातार किया जाता रहा है, लेकिन इसी दावे के बीच उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया और एक वरिष्ठ पदाधिकारी के पद पर बने रहने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह के सवालों ने एक ऐसा गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब केवल राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और न्यायिक परीक्षण से ही सामने आ सकता है। रीना एन सिंह का कहना है कि उनका संघर्ष किसी सरकार या राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानून के शासन के लिए है। उनके आरोपों और सवालों की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि वे स्वयं मुख्यमंत्री की समर्थक मानी जाती हैं, फिर भी उन्होंने सरकार की कार्यप्रणाली से जुड़े कुछ ऐसे प्रश्न सार्वजनिक किए हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना व्यवस्था के लिए आसान नहीं होगा।

मामला आखिर इतना गंभीर क्यों है कि इसकी शुरुआत सुप्रीम कोर्ट से हुई और फिर हाईकोर्ट तक पहुंची? रीना एन सिंह के अनुसार, लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया को लेकर उन्होंने पहले सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वहां से उन्हें पहले हाईकोर्ट से आदेश प्राप्त करने का निर्देश मिला। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में मामला दाखिल किया गया। अब असली सवाल यहीं से पैदा होता है—जब मामला न्यायालय के सामने है, तो सुनवाई की गति को लेकर लगातार सवाल क्यों उठ रहे हैं?

रीना एन सिंह के मुताबिक, मामले की सुनवाई में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनीं जब न्यायाधीशों ने स्वयं को मामले से अलग किया और पीठों में परिवर्तन हुआ। उनका कहना है कि 22 बार हाईकोर्ट में तारीख लगी लेकिन अब तक सुनवाई की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। हाल की सुनवाई का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कोर्ट की कार्यवाही के दौरान लंच के बाद पर्याप्त समय उपलब्ध था, परंतु कोर्ट ना बैठने के कारण सुनवाई नहीं हो सकी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच उनका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और उनका संघर्ष जारी रहेगा।

यहां से मामला केवल एक मुकदमे की तारीखों का नहीं रह जाता। रीना एन सिंह का कहना है कि यदि किसी गंभीर प्रकरण में न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी खिंचती है कि वर्षों तक अंतिम निर्णय सामने न आए, तो इसका सीधा असर आम आदमी के न्याय के भरोसे पर पड़ता है। उनके अनुसार, जब तक किसी मामले में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आता, तब तक संबंधित संस्थाओं में नियुक्तियां और प्रशासनिक निर्णय आगे बढ़ते रहते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यदि बाद में किसी प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिह्न लग जाए तो उन निर्णयों की जवाबदेही कौन तय करेगा?

रीना एन सिंह ने अपने बयान में इस प्रकरण को कथित भ्रष्टाचार से भी जोड़ते हुए कहा कि मामला केवल एक व्यक्ति अथवा एक पद तक सीमित नहीं है। उनका दावा है कि इसके पीछे ऐसी व्यवस्थागत परिस्थितियां दिखाई देती हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यही वह बिंदु है जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घोषित जीरो टॉलरेंस नीति की वास्तविक परीक्षा भी दिखाई देती है—क्योंकि यदि किसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर शिकायत सामने आती है, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि शिकायत की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति पर कानून के मुताबिक शिकंजा कसा जाए।

लेकिन रीना एन सिंह के सवाल इससे भी आगे जाते हैं। उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि यदि यह विषय इतना गंभीर है तो लंबे समय तक इस पर निर्णायक ध्यान क्यों नहीं गया। उनके अनुसार, सरकारें बदलती रहीं, राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहीं, लेकिन जिस व्यवस्था को लेकर वे सवाल उठा रही हैं, उसमें अपेक्षित परिवर्तन दिखाई नहीं दिया। हालांकि इन आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा, लेकिन सवाल यह जरूर है कि क्या किसी संवैधानिक संस्था से संबंधित शिकायतों की जांच राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से स्वतंत्र और संस्थागत ढंग से नहीं होनी चाहिए?

सबसे गंभीर प्रश्न एक वरिष्ठ पदाधिकारी के पद पर बने रहने को लेकर उठाया गया है। रीना एन सिंह के बयान के अनुसार, संबंधित व्यक्ति वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं और पेंशन भी प्राप्त कर रहे हैं, फिर भी उनके पद पर बने रहने को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं। यहां विवाद केवल सेवानिवृत्ति का नहीं, बल्कि उस पद की वैधानिक प्रकृति और उससे जुड़े अधिकारों का है। यदि किसी व्यक्ति के पद पर बने रहने का अधिकार ही विवादित हो, तो उस पद से लिए गए निर्णयों की वैधानिक स्थिति की समीक्षा कौन करेगा—यही वह सवाल है जिसे अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष उठाने की बात कही है।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न उस कथित हलफनामे को लेकर है, जिसका उल्लेख रीना एन सिंह ने किया। उनके अनुसार, विपक्ष की ओर से दाखिल हलफनामे में संबंधित पद को “पब्लिक ऑफिस नहीं” बताया गया है। रीना एन सिंह ने इसी दलील पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव का पद सार्वजनिक पद नहीं है, तो उस पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के विरुद्ध निर्णय लेने का अधिकार किस आधार पर प्रयोग किया गया? यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति की भूमिका से नहीं, बल्कि सार्वजनिक पद की संवैधानिक जवाबदेही की मूल अवधारणा से जुड़ जाता है।

यहीं से पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू सामने आता है—क्या संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार, नियुक्तियां और निर्णय पूरी तरह निर्धारित कानून और नियमों के अनुसार संचालित हो रहे हैं? या फिर कहीं ऐसी संस्थागत कमियां हैं जिनका लाभ उठाकर व्यवस्था को प्रभावित किया जा सकता है? रीना एन सिंह ने अपने बयान में कथित राजनीतिक दबाव की आशंका भी व्यक्त की है। हालांकि यह अभी उनका आरोप और आशंका है, जिसका सत्यापन न्यायिक अथवा सक्षम जांच से होना बाकी है, लेकिन यदि ऐसी आशंका उठती है तो उसकी निष्पक्ष जांच होना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में होगा।

रीना एन सिंह का एक और कथन इस पूरे मामले को राजनीतिक विवाद से अलग दिशा देता है। उनका कहना है कि उनका भरोसा संविधान और न्यायपालिका में कायम है। यही कारण है कि उन्होंने संघर्ष जारी रखने की बात कही है। उनके अनुसार, उद्देश्य किसी सरकार को अस्थिर करना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के उन हिस्सों को सामने लाना है जहां कथित अनियमितताओं की शिकायतें हैं और जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

अब गेंद सरकार और न्यायपालिका के पाले में है। यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति पर चल रही है, तो ऐसे गंभीर आरोपों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर जांच कराने में उसे कोई संकोच नहीं होना चाहिए। आरोप सही हैं तो दोषियों की पहचान होनी चाहिए, आरोप निराधार हैं तो जांच के बाद स्थिति भी उतनी ही स्पष्टता से जनता के सामने आनी चाहिए। यही पारदर्शिता मुख्यमंत्री की छवि और सरकार के जीरो टॉलरेंस के दावे—दोनों को मजबूत करेगी।

क्योंकि सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं है। प्रश्न यह है कि लोक सेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की चयन प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही किस सीमा तक सुनिश्चित है और यदि किसी संवैधानिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठते हैं तो सरकार तथा संस्थाएं उसका जवाब किस तरह देती हैं। रीना एन सिंह ने इन सवालों को अदालत के दरवाजे तक पहुंचा दिया है। अब देखना यह है कि न्यायिक प्रक्रिया इन प्रश्नों का क्या उत्तर देती है और सरकार उन बिंदुओं पर क्या कदम उठाती है, जिनकी ओर इस अधिवक्ता ने सार्वजनिक रूप से ध्यान खींचा है।

फिलहाल रीना एन सिंह का स्पष्ट संदेश है—संघर्ष जारी रहेगा और न्यायपालिका पर भरोसा कायम रहेगा। अब इस भरोसे की अगली परीक्षा न्यायिक प्रक्रिया और सरकार की पारदर्शी कार्रवाई में होगी।

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