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प्रशासनिक शुचिता पर प्रश्नचिह्न: क्या वास्तव में परिवर्तित कर दिया गया उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का संवैधानिक स्वरूप

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Dainik India News

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प्रशासनिक शुचिता पर प्रश्नचिह्न: क्या वास्तव में परिवर्तित कर दिया गया उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का संवैधानिक स्वरूप

आचार संहिता के मध्य नियुक्तियाँ, संवैधानिक अधिकारों का पुनर्विन्यास और संस्थागत पारदर्शिता पर उठते गंभीर प्रश्न

उदय राज,दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल निर्वाचित सरकारों में नहीं, बल्कि उन संस्थाओं की निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादा में निहित होती है जो शासन-प्रशासन को विधिसम्मत दिशा प्रदान करती हैं। जब इन्हीं संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर पक्षपात, अधिकारों के दुरुपयोग अथवा संवैधानिक व्यवस्थाओं के उल्लंघन के आरोप उभरने लगते हैं, तब प्रश्न केवल किसी एक अधिकारी या विभाग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता कठघरे में आ खड़ी होती है। विगत दिनों प्रयागराज में उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव के विरुद्ध प्रस्तुत एक विधिक शिकायत ने ठीक ऐसे ही अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म दिया है। इस शिकायत ने न केवल नियुक्ति प्रक्रियाओं की वैधानिकता और पारदर्शिता पर व्यापक विमर्श को जन्म दिया है, बल्कि प्रशासनिक शक्तियों के हस्तांतरण, चुनावी आचार संहिता के पालन तथा संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर भी बहस को नई दिशा प्रदान कर दी है। जैसे-जैसे शिकायत के आरोप सार्वजनिक विमर्श का विषय बन रहे हैं, वैसे-वैसे यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है कि क्या वास्तव में संवैधानिक व्यवस्था के भीतर कोई ऐसा तंत्र विकसित हुआ जिसने संस्थागत निष्पक्षता को प्रभावित किया?

इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए आवश्यक है कि उन निर्णयों की पृष्ठभूमि को समझा जाए जिनसे पूरा विवाद जन्म लेने का दावा किया जा रहा है। शिकायत में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार इस पूरे प्रकरण की जड़ वर्ष 2011 में जारी उस प्रशासनिक अधिसूचना से जुड़ी बताई गई है, जिसने आज एक दशक से भी अधिक समय बाद पुनः राजनीतिक, प्रशासनिक और विधिक बहस को जीवंत कर दिया है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों में प्रथमदृष्टया भी सत्यता सिद्ध होती है, तो उसका प्रभाव केवल कुछ नियुक्तियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और अधिकार-सीमाओं की पुनर्व्याख्या का विषय बन सकता है।

शिकायत के अनुसार 11 जनवरी 2011 को तत्कालीन प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य एवं विधानसभा) द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई। आरोप है कि इस अधिसूचना के माध्यम से उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के अधिकारों को व्यवहारतः सीमित करते हुए विधानसभा सचिवालय की एक आंतरिक चयन समिति को भर्ती संबंधी अधिकार सौंप दिए गए। यद्यपि इस प्रक्रिया के औचित्य के समर्थन में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 187(3) का उल्लेख किया गया, किंतु शिकायतकर्ता का दावा है कि उक्त अनुच्छेद की मूल संवैधानिक भावना तथा उसकी विधिक सीमाओं का समुचित पालन नहीं किया गया। इसी बिंदु ने पूरे विवाद को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित न रखकर संवैधानिक व्याख्या के स्तर तक पहुँचा दिया है।

यदि यह आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो प्रश्न केवल शक्तियों के विकेंद्रीकरण का नहीं रहेगा, बल्कि यह भी उठेगा कि क्या संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों का ऐसा पुनर्विन्यास विधिक प्रक्रिया के अनुरूप था अथवा नहीं। शिकायत में दावा किया गया है कि यह व्यवस्था प्रशासनिक सुविधा से अधिक नियुक्तियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में एक संरचनात्मक परिवर्तन थी। यही कारण है कि इसके बाद विधानसभा सचिवालय में समीक्षा अधिकारी (आरओ) एवं सहायक समीक्षा अधिकारी (एआरओ) की भर्ती प्रक्रियाएँ निरंतर विवादों के घेरे में रहीं और अंततः कुछ मामलों में उच्च न्यायालय को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने तक के आदेश देने पड़े। यही घटनाक्रम इस पूरे विवाद को और अधिक संवेदनशील बना देता है।

यहीं से कहानी का दूसरा और संभवतः सबसे विवादास्पद अध्याय प्रारंभ होता है। शिकायत में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, वे दिसंबर 2011 से मार्च 2012 के बीच की हैं—वह अवधि जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के कारण आदर्श आचार संहिता प्रभावी थी। लोकतांत्रिक परंपरा के अनुसार इस दौरान नई नियुक्तियों और स्थानांतरणों पर कठोर प्रतिबंध लागू रहता है ताकि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे। किंतु शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इसी संवेदनशील अवधि के दौरान जनवरी 2012 में बिना पूर्व रिक्ति तथा बिना उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग से परामर्श प्राप्त किए भर्ती संबंधी विज्ञापन जारी किया गया। यदि यह तथ्य जांच में प्रमाणित होते हैं, तो स्वाभाविक रूप से चुनावी आचार संहिता के अनुपालन पर गंभीर प्रश्न उत्पन्न होंगे।

शिकायत का सबसे गंभीर आरोप 6 मार्च 2012 की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा है। तहरीर के अनुसार मतगणना के दिन प्रदीप कुमार दुबे को उत्तर प्रदेश विधानसभा का प्रमुख सचिव नियुक्त किया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि उस समय तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर लखनऊ में उपस्थित न होकर आजमगढ़ जनपद के दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र में मतगणना की प्रक्रिया में व्यस्त थे। ऐसे में शिकायत में यह आरोप लगाया गया है कि उनकी भौतिक अनुपस्थिति के बावजूद नियुक्ति संबंधी अभिलेखों में उनकी उपस्थिति एवं संस्तुति दर्शाई गई। यदि जांच में इस प्रकार के आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का प्रश्न नहीं रहेगा, बल्कि अभिलेखीय प्रामाणिकता और कूटरचना जैसे गंभीर विधिक पहलुओं की भी जांच का विषय बन सकता है।

हालाँकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोपों के साथ-साथ प्रशासनिक और विधिक पक्ष को समान महत्व देना भी अनिवार्य है। यही कारण है कि इस पूरे विवाद का मूल्यांकन केवल शिकायत के आधार पर नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 187(3), विधानसभा सचिवालय की स्वायत्तता, विधानसभा अध्यक्ष के विशेषाधिकार, चुनावी अवधि में प्रशासनिक अपवादों तथा पूर्व में विभिन्न राज्यों में अपनाई गई भर्ती प्रक्रियाओं की विधिक वैधता जैसे अनेक पहलू भी इस विवाद के केंद्र में हैं। यही वे प्रश्न हैं जिनकी पड़ताल किए बिना इस पूरे प्रकरण की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ सकती।

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