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“स्मार्ट मीटरों पर फूटा जनाक्रोश, मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद अब जवाबदेही पर टिकी प्रदेश की निगाहें

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“स्मार्ट मीटरों पर फूटा जनाक्रोश, मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद अब जवाबदेही पर टिकी प्रदेश की निगाहें

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ। उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटरों को लेकर उठ रहा जनाक्रोश अब शासन-प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। जिस परियोजना को ऊर्जा विभाग ने “पारदर्शी एवं आधुनिक विद्युत व्यवस्था” का प्रतीक बताकर प्रदेशभर में लागू किया था, वही अब लाखों उपभोक्ताओं के लिए आर्थिक बोझ, मानसिक उत्पीड़न और गहरे अविश्वास का कारण बन चुकी है। तेज रीडिंग, असामान्य बिजली बिल, अचानक समाप्त होता बैलेंस और शिकायतों पर विभागीय उदासीनता ने आम जनता के भीतर असंतोष की ऐसी चिंगारी पैदा कर दी है, जिसने अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल मचा दी है।

प्रदेश के अनेक जनपदों से लगातार विरोध-प्रदर्शन, धरना-प्रदर्शन और शिकायतों की बाढ़ आने के बाद अंततः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को स्वयं इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लेना पड़ा। 10 अप्रैल को आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने स्मार्ट मीटरों को लेकर प्राप्त शिकायतों पर गंभीर रुख अपनाते हुए गहन तकनीकी जांच के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री का यह हस्तक्षेप केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस बढ़ते अविश्वास की औपचारिक स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा रहा है, जो स्मार्ट मीटर परियोजना को लेकर जनता के भीतर लगातार गहराता चला गया।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि यदि उपभोक्ता की कोई गलती नहीं है, तो उसका विद्युत कनेक्शन किसी भी परिस्थिति में विच्छेदित नहीं किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी अपने आप में उस पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है, जिसके अंतर्गत हजारों उपभोक्ताओं को बिना पर्याप्त सुनवाई और सत्यापन के अंधेरे में धकेल दिया गया। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब जनता महीनों से स्मार्ट मीटरों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही थी, तब ऊर्जा विभाग और विद्युत निगमों के अधिकारी इन्हें “पूर्णतः सही” घोषित करने में इतने आश्वस्त कैसे थे?

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह बन चुका है कि यदि शिकायतें निराधार थीं, तो फिर मुख्यमंत्री को विशेषज्ञ समिति गठित कर जांच के आदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? और यदि शिकायतों में तथ्य हैं, तो क्या उन अधिकारियों, तकनीकी एजेंसियों और जिम्मेदार तंत्र की जवाबदेही तय होगी, जिन्होंने करोड़ों रुपये की इस परियोजना को बिना पर्याप्त पारदर्शिता और स्वतंत्र परीक्षण के आगे बढ़ाया?

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद गठित तकनीकी समिति में विशेषज्ञों को शामिल किया गया है, किंतु इस प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि जब भारत सरकार की स्टैंडर्ड बिडिंग गाइडलाइन में स्पष्ट रूप से CPRI अथवा NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से परीक्षण का प्रावधान है, तब विभागीय निगरानी में जांच कराने का औचित्य क्या है? क्या यह वास्तविक तकनीकी सच्चाई सामने लाने का प्रयास है या फिर बढ़ते जनदबाव को नियंत्रित करने की प्रशासनिक कवायद?

उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने भी इस पूरे घटनाक्रम को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं गहन जांच के आदेश दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि जनता की शिकायतों को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। परिषद ने मांग की है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटरों की निष्पक्ष जांच केवल CPRI, बेंगलुरु जैसी स्वतंत्र एवं राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त संस्था से कराई जाए, ताकि वास्तविक तकनीकी स्थिति जनता के सामने पारदर्शी ढंग से प्रस्तुत हो सके।

अब प्रदेश की करोड़ों जनता की निगाहें केवल जांच समिति की रिपोर्ट पर नहीं, बल्कि सरकार की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या इस पूरे प्रकरण में किसी अधिकारी, तकनीकी एजेंसी या ठेकेदार की जवाबदेही निर्धारित होगी? क्या उपभोक्ताओं को हुई कथित आर्थिक क्षति की भरपाई पर भी विचार होगा? अथवा यह पूरा मामला भी सरकारी फाइलों, समितियों और लंबित रिपोर्टों के बीच धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में समा जाएगा?

स्मार्ट मीटर विवाद अब केवल तकनीकी त्रुटियों का विषय नहीं रह गया है। यह सरकार, विभागीय तंत्र और आम उपभोक्ता के बीच भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह जांच वास्तव में जवाबदेही तय करेगी या फिर व्यवस्था स्वयं अपने प्रश्नों के उत्तर देने से बचती दिखाई देगी।

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