दैनिक इडिया न्यूज़ , लखनऊ। उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था को लेकर उत्पन्न विवाद अब विधिक एवं प्रशासनिक संकट का रूप ग्रहण करता प्रतीत हो रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष एवं देश की केंद्रीय ऊर्जा सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने आज उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार एवं सदस्य संजय कुमार सिंह से भेंट कर एक औपचारिक अवमानना याचिका प्रस्तुत की। इस याचिका में पावर कॉरपोरेशन द्वारा केंद्र सरकार की संशोधित अधिसूचना एवं विद्युत अधिनियम 2003 के प्रावधानों की कथित अवहेलना किए जाने का गंभीर आरोप लगाया गया है।
अवधेश कुमार वर्मा ने आरोपित किया कि प्रदेश में नवीन विद्युत कनेक्शनों को अनिवार्य रूप से स्मार्ट प्रीपेड मोड में प्रदान किया जा रहा है, जिससे उपभोक्ता वर्ग में व्यापक असंतोष एवं आक्रोश व्याप्त है। उन्होंने इसे जनहित एवं उपभोक्ता अधिकारों के प्रतिकूल बताते हुए कहा कि इस व्यवस्था ने संपूर्ण प्रदेश में असंतोष की ज्वाला प्रज्वलित कर दी है।
उन्होंने यह भी अवगत कराया कि केंद्र सरकार द्वारा पूर्ववर्ती प्रावधानों में संशोधन करते हुए 1 अप्रैल से प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है, किंतु इसके बावजूद पावर कॉरपोरेशन द्वारा पुरानी एवं अप्रासंगिक अधिसूचनाओं के आधार पर इसे यथावत लागू किया जा रहा है, जो विधि के शासन के सिद्धांतों के विपरीत है।
परिषद अध्यक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि निगम द्वारा लगभग 75 लाख उपभोक्ताओं के कनेक्शनों को उनकी सहमति के बिना ही प्रीपेड प्रणाली में परिवर्तित कर दिया गया है, जो न केवल उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) की मूल भावना के भी प्रतिकूल है।
उन्होंने आयोग को यह भी सूचित किया कि इस विवाद के परिणामस्वरूप प्रदेश के अनेक जनपदों में व्यापक विरोध प्रदर्शन एवं धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं, जिससे स्थिति सामाजिक अशांति एवं संभावित कानून-व्यवस्था संकट की ओर अग्रसर होती दिखाई दे रही है।
अवधेश कुमार वर्मा ने राज्य सरकार से मांग की है कि ऐसे लोकसेवकों की पहचान कर उनके विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक एवं विधिक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए, जो राष्ट्रीय कानून एवं केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं की अवहेलना कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि विधि का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून की परिधि से बाहर संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।
यह प्रकरण अब केवल प्रशासनिक विवाद न रहकर एक गंभीर विधिक और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बनता जा रहा है, जिस पर सभी संबंधित पक्षों की दृष्टि टिकी हुई है।