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“स्मृतियों की साधना और संकल्प का संगम”: इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में गूंजा ‘स्मृति नाद’

राजनाथ सिंह का उद्बोधन—“सिद्धांत, संवेदनशीलता और समर्पण ही सार्वजनिक जीवन की वास्तविक पूंजी” बृजेश पाठक बोले—“लखनऊ की आत्मा को शब्दबद्ध करने का यह प्रयास, एक युग की चेतना का साक्षात्कार”

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Dainik India News

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“स्मृतियों की साधना और संकल्प का संगम”: इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में गूंजा ‘स्मृति नाद’

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। गोमती नगर स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान का मार्स हॉल उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जब स्मृतियों की साधना, संकल्प की शक्ति और सांस्कृतिक चेतना का अद्वितीय संगम ‘स्मृति नाद’ के लोकार्पण के रूप में साकार हुआ। श्री लाल जी टंडन फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित इस कृति का लोकार्पण भारत सरकार के रक्षा मंत्री एवं लखनऊ सांसद राजनाथ सिंह, जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि, उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक सहित अनेक विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।

समारोह का प्रत्येक क्षण मानो “संस्कार, संकल्प और सेवा” की त्रिवेणी में अवगाहित हो रहा था। जैसे ही ‘स्मृति नाद’ का अनावरण हुआ, पूरा सभागार उस अनुभूति से स्पंदित हो उठा, जिसे शब्दों में बांध पाना कठिन है—यह केवल एक पुस्तक का विमोचन नहीं, बल्कि एक युग-पुरुष की जीवन-यात्रा का पुनर्स्मरण था।



रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने विशिष्ट, संतुलित और विचारप्रधान उद्बोधन में कहा—“हम जब भी ऐसे अवसरों पर एकत्र होते हैं, तो केवल स्मरण नहीं करते, बल्कि संकल्प को भी पुनर्जीवित करते हैं।” उन्होंने लालजी टंडन को नमन करते हुए कहा कि उनका जीवन “सिद्धांतों की साधना, संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति और सेवा के संकल्प” का अनुपम उदाहरण रहा है।

उन्होंने गहन भावुकता के साथ कहा—“टंडन जी इस पुस्तक के लोकार्पण को लेकर अत्यंत उत्साहित थे। किंतु ईश्वर की इच्छा सर्वोपरि होती है। आज वे हमारे बीच भौतिक रूप में नहीं हैं, परंतु उनकी स्मृतियां, उनके संस्कार और उनके संकल्प हमें निरंतर प्रेरित कर रहे हैं।”

अपने उद्बोधन में राजनाथ सिंह ने बार-बार “सिद्धांत”, “संस्कार”, “समर्पण” और “सार्वजनिक जीवन की मर्यादा” जैसे शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि लालजी टंडन का संपूर्ण जीवन इन मूल्यों का जीवंत प्रतिरूप था। “सर्वधर्म समभाव” उनके चिंतन का मूलाधार था, और ‘स्मृति नाद’ उसी वैचारिक व्यापकता का सशक्त दस्तावेज है।

उन्होंने एक प्रेरक प्रसंग का उल्लेख करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की गरिमा का वर्णन किया—“जब एक युवक ने विमान अपहरण कर अटल जी से मिलने की जिद की, तब अटल जी ने संवाद का मार्ग चुना। यह उनके व्यक्तित्व की शक्ति थी कि वह युवक उनके चरण स्पर्श करने को प्रेरित हुआ।” इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने संवाद, धैर्य और नेतृत्व की मर्यादा को रेखांकित किया।

इमरजेंसी काल की घटना का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा—“जब व्यवस्था संवेदनहीन होती दिखी, तब टंडन जी ने साहस के साथ उसका प्रतिरोध किया।” उन्होंने इसे “सार्वजनिक जीवन में सिद्धांतों के प्रति अडिग प्रतिबद्धता” का प्रतीक बताया।

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि लालजी टंडन का जीवन “लखनऊ की आत्मा से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था।” उनके शब्दों में—“लखनऊ केवल उनका कार्यक्षेत्र नहीं था, बल्कि उनके संस्कार, उनके स्वभाव और उनके संकल्प का विस्तार था।”

उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने अपने संबोधन में कहा—“‘स्मृति नाद’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक युग की चेतना का साक्षात्कार है।” उन्होंने लालजी टंडन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि लखनऊ की सांस्कृतिक गरिमा, उसकी सभ्यता और उसके आत्मीय स्वरूप को शब्दों में पिरोना अत्यंत दुष्कर कार्य है, जिसे इस कृति ने अत्यंत प्रभावी ढंग से साकार किया है।

उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी का स्मरण करते हुए कहा कि “दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में कार्य करना ही सच्ची राजनीति है।” उन्होंने यह भी कहा कि लालजी टंडन ने उसी परंपरा को आत्मसात किया और आज राजनाथ सिंह उसी “संकल्प और सेवा” की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

समारोह में उपस्थित जनप्रतिनिधियों और गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को और भी गरिमामय बना दिया।



कार्यक्रम का समापन एक ऐसे भाव के साथ हुआ, जो स्वयं राजनाथ सिंह के शब्दों की प्रतिध्वनि प्रतीत हुआ—“सार्वजनिक जीवन में यदि संकल्प शुद्ध हो, संवेदनशीलता जीवित हो और सिद्धांत अडिग हों, तो स्मृतियां ‘स्मृति नाद’ बनकर युगों तक गूंजती रहती हैं।”

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