दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।
राजधानी लखनऊ के विकास नगर में इन दिनों जो दृश्य आकार ले रहा है, वह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भावों का विराट महासंगम है—जहाँ करुणा निर्झरिणी की भाँति बहती है, भक्ति पुष्पों की तरह झरती है और आत्मा अपने मूल स्वरूप की ओर उन्मुख होने लगती है। जीवनदीप आश्रम के पावन आवाहन पर प्रारंभ हुई कलश यात्रा ने जैसे ही नगर की गलियों को स्पर्श किया, वैसे ही वातावरण में एक अलौकिक कम्पन व्याप्त हो गया—मानो प्रत्येक हृदय किसी अदृश्य, दिव्य पुकार का प्रत्युत्तर दे रहा हो।
मस्तक पर कलश धारण किए स्त्रियों की वह संतुलित, संयमित और दिव्य श्रृंखला जब नगर की परिक्रमा करती, तो ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं श्रद्धा ने देह धारण कर पृथ्वी पर अवतरण कर लिया हो। उनके चरणों की लय में विनम्रता, स्वरों में भक्ति की माधुरी और नेत्रों में अटूट विश्वास की ज्योति प्रकट हो रही थी। यह यात्रा केवल बाह्य मार्गों पर नहीं चल रही थी—यह प्रत्येक सहभागी के अंतःकरण में प्रवाहित हो रही थी, जहाँ वह अपने ही विकारों का परित्याग कर स्वयं को पवित्रता की ओर अग्रसर कर रहा था।
इसी पावन भावभूमि पर, महाकालेश्वर महादेव मंदिर के समक्ष स्थित पार्क में कथा का शुभारंभ हुआ, और समूचा वातावरण एक ऐसे आध्यात्मिक लोक में परिवर्तित हो गया, जहाँ काल भी मानो क्षणभर के लिए स्थिर हो गया हो।
इस दिव्य कथा का वाचन स्वामी यतींद्रानंद गिरि के श्रीमुख से हो रहा है, जो श्रीपंच दशम जूना अखाड़ा के प्रतिष्ठित महामंडलेश्वर हैं। वे केवल एक कथावाचक ही नहीं, बल्कि सनातन परंपरा के तेजस्वी साधक, शास्त्रों के मर्मज्ञ विद्वान और अध्यात्म के सजीव सेतु हैं। उनकी साधना, अध्ययन और अनुभूति का विस्तार इतना व्यापक है कि उनके श्रीमुख से निकला प्रत्येक शब्द केवल श्रवण नहीं रहता—वह साधना का पथ, आत्मबोध का द्वार और अंतःकरण का आलोक बन जाता है।
उनकी वाणी में वेदों की गंभीरता, उपनिषदों की सूक्ष्मता, रामकथा की माधुरी और भक्ति की करुणा का अद्भुत समन्वय प्रवाहित होता है। वे जब कथा कहते हैं, तो श्रोता केवल श्रोता नहीं रहता—वह उस दिव्य लीला का सहभागी बन जाता है। उनके व्यक्तित्व में तप, त्याग और तेज का ऐसा त्रिवेणी संगम है, जो श्रोताओं के अंतःकरण को स्पर्श कर उन्हें आत्मचिंतन, आत्मानुशासन और आत्मसमर्पण के पथ पर अग्रसर करता है।
कथा जब पुत्रकामेष्टि यज्ञ के प्रसंग पर पहुँचती है, तो श्रोताओं का मन पूर्ण एकाग्रता में स्थित हो जाता है। महर्षि ऋष्यश्रृंग की तपशक्ति से प्रज्वलित यज्ञाग्नि से जब यज्ञपुरुष प्रकट होते हैं और उनके करकमलों में स्वर्णमय पात्र में भरा दिव्य पायस दिखाई देता है, तब वातावरण श्रद्धा, विस्मय और भक्ति से परिपूर्ण हो उठता है। यह वही महाप्रसाद है, जो किसी लौकिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि दैवी कृपा का सघन, मूर्त और अनुभवगम्य स्वरूप है।
इस दिव्य प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में किया है—
“प्रगट भए तब अगिनि ते, धरि रूप सुचि सोभा।
हाथ लिए पायस भरें, हरषि भए नरलोका॥”
यहीं पर कथा उस सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित करती है, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है, पर अनुभूति में उतारना संभव है—
“पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”
यह महाप्रसाद केवल पूर्ण नहीं था, बल्कि पूर्णता का ही साकार विस्तार था। उसमें से जितना भी ग्रहण किया गया, वह उतना ही अखंड बना रहा; और जो शेष रहा, वह भी उसी अनंत पूर्णता में प्रतिष्ठित रहा। यह उस दिव्य सत्य का बोध कराता है, जहाँ अभाव नहीं, केवल अनंत विस्तार का अनुभव है।
महाराज दशरथ ने इस महाप्रसाद को स्वयं ग्रहण नहीं किया, अपितु श्रद्धापूर्वक अपनी तीनों रानियों—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—को अर्पित किया। माता कौशल्या से राम का अवतरण हुआ—करुणा और मर्यादा के परम आलोक के रूप में। कैकेयी से भरत का जन्म हुआ—त्याग और निष्काम प्रेम की मूर्ति के रूप में। सुमित्रा ने उसी प्रसाद को द्विवार ग्रहण कर लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया—जो सेवा, समर्पण और निष्ठा के अद्वितीय प्रतीक बने।
और जब यह दिव्य लीला अपने उत्कर्ष की ओर अग्रसर थी, तब कैलाशाधिपति शिव ने इस अद्भुत दृश्य का चिंतन किया। उन्हें अनुभव हुआ कि जब एक ही परम सत्ता स्वयं को अनेक रूपों में अवतरित कर रही है, तब इस लीला में सहभागी होना ही परम सौभाग्य है। उसी दिव्य भाव से उन्होंने वानर रूप में अवतरण का संकल्प किया—और यही संकल्प आगे चलकर हनुमान के रूप में साकार हुआ, जहाँ शक्ति, भक्ति और समर्पण का अद्वितीय संगम दृष्टिगोचर होता है।
हनुमान केवल एक भक्त नहीं, बल्कि उस स्थिति के प्रतीक हैं जहाँ ‘स्व’ का पूर्ण विसर्जन हो जाता है और केवल आराध्य का अस्तित्व शेष रह जाता है। जब प्रभु राम उन्हें भरत के समान प्रिय बताते हैं और अनेक प्रसंगों में लक्ष्मण से भी अधिक स्नेह प्रकट करते हैं, तब यह उस दिव्य अवस्था का उद्घोष है, जहाँ भक्ति अपने चरम पर पहुँचकर समस्त भेदों का लय कर देती है।
और अंततः, इस दिव्य आयोजन की भव्यता उसके आयोजकों, संरक्षकों और समर्पित सहयोगियों की निष्ठा में साकार रूप से प्रतिबिंबित होती है। जीवनदीप आश्रम के आवाहन पर महाकालेश्वर महादेव मंदिर के समक्ष स्थित पार्क में संपन्न हो रहे इस पंचदिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान के कथा संयोजक एवं मुख्य आयोजक लोहिया नगर के पार्षद राकेश मिश्रा तथा सहसंयोजक आशुतोष मिश्रा हैं, जिनकी सतत सक्रियता, सेवाभाव और आध्यात्मिक निष्ठा ने इस आयोजन को जन-आस्था के महोत्सव में परिणत कर दिया है।
इस आयोजन के संरक्षक के रूप में अयोध्या शरण महाराज का दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है। अध्यक्ष पद पर दिलीप मिश्रा, तथा उपाध्यक्ष के रूप में विजय प्रकाश शुक्ला एवं मोनिका निगम इस आयोजन को सुदृढ़ दिशा प्रदान कर रहे हैं। संगठनात्मक व्यवस्था में शिवानी जायसवाल (संगठन सचिव) की सक्रिय भूमिका उल्लेखनीय है, वहीं अभिषेक जैन, रीना साहनी, ज्योति सिंह सहित अनेक समर्पित कार्यकर्ता अपनी निष्ठा और सेवा से इस दिव्य अनुष्ठान को निरंतर पूर्णता की ओर अग्रसर कर रहे हैं।