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संस्कृत की दिव्य अनुगूंज में राष्ट्रीय आत्मा का जागरण: ‘प्रणवः’ से आरंभ हुआ सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महाशंखनाद

“संस्कृत भारत का प्राण है”—यह कथन जैसे ही उनके अधरों से निकला, उपस्थित जनसमूह के अंतर्मन में एक विचलन, एक प्रश्न, एक जिज्ञासा जन्म लेने लगी।

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Dainik India News

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संस्कृत की दिव्य अनुगूंज में राष्ट्रीय आत्मा का जागरण: ‘प्रणवः’ से आरंभ हुआ सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महाशंखनाद

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।

कालखंड के अनंत प्रवाह में विरले ही ऐसे क्षण अवतरित होते हैं, जब इतिहास स्वयं अपनी दिशा परिवर्तित करने का साहस करता है—और राजधानी दिल्ली में संस्कृतभारती के केन्द्रीय भवन “प्रणवः” का लोकार्पण ऐसा ही एक अलौकिक, कालजयी और चेतनाप्रद क्षण बनकर उभरा। वैदिक मंत्रोच्चारों की दिव्य अनुगूंज, यज्ञाग्नि की प्रखर ज्वालाएं और आध्यात्मिक ऊर्जा से स्पंदित वातावरण ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह मात्र एक स्थापत्य का उद्घाटन नहीं, बल्कि उस सनातन चेतना का पुनरुत्थान है, जो युगों से भारतीय आत्मा में सुप्त पड़ी थी—और अब पुनः जागृत होने को आतुर है। परंतु इस जागरण के पीछे छिपी वह अदृश्य शक्ति क्या है, जो एक साधारण आयोजन को युगांतकारी बना देती है?

जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के ओजस्वी शब्द उस पवित्र वातावरण में गूंजे, तो वे केवल एक भाषण नहीं रहे—वे एक वैचारिक क्रांति के उद्घोष में परिवर्तित हो गए। “संस्कृत भारत का प्राण है”—यह कथन जैसे ही उनके अधरों से निकला, उपस्थित जनसमूह के अंतर्मन में एक विचलन, एक प्रश्न, एक जिज्ञासा जन्म लेने लगी। क्या हम वास्तव में उस भाषा से विमुख हो चुके हैं, जिसमें हमारे अस्तित्व का समस्त तात्त्विक सार निहित है? और यदि हाँ, तो क्या यह केवल भाषाई दूरी है, या हमारी सांस्कृतिक चेतना का भी क्षरण? इन प्रश्नों की प्रतिध्वनि जैसे-जैसे गहराती गई, वैसे-वैसे यह आयोजन एक साधारण समारोह से कहीं अधिक गहन और मर्मस्पर्शी बनता चला गया।

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‘प्रणवः’ का लोकार्पण दृश्य जितना भौतिक था, उससे कहीं अधिक आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक भी। गौपूजन की करुणामयी भावना, शतचंडी यज्ञ की पूर्णाहुतियाँ और वैदिक ऋचाओं की गूंज ने उस क्षण को एक ऐसे दिव्य आयाम में परिवर्तित कर दिया, जहाँ समय जैसे ठहर गया हो। जब यह अत्याधुनिक भवन विधिवत राष्ट्र को समर्पित हुआ, तब वह केवल ईंट-पत्थरों का संयोजन नहीं रहा—वह एक संकल्प का साकार रूप बन गया, जिसने यह संकेत दिया कि भारत अब अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए केवल चिंतन नहीं कर रहा, बल्कि दृढ़तापूर्वक अग्रसर भी है। किंतु क्या यह केवल आरंभ है, या एक व्यापक सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रस्तावना?

संस्कृत को लेकर प्रस्तुत विचारों में जितनी स्पष्टता थी, उतनी ही प्रखरता भी। इसे अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की अनिवार्यता के रूप में स्थापित किया गया। यह वह बिंदु था, जहाँ एक नई दिशा उभरती दिखाई दी—संभाषण। यह उद्घोष कि “भाषा का जीवन उसके व्यवहार में निहित है”, अपने आप में एक क्रांतिकारी सूत्र बनकर सामने आया। संस्कृत संभाषण शिविरों, गीतास्वाध्याय, पत्राचार केंद्रों और अंतर्जाल आधारित शिक्षण-प्रशिक्षण के माध्यम से इस भाषा को जन-जन तक पहुंचाने का जो प्रयास हो रहा है, वह केवल शिक्षण नहीं—एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव है। और यहीं पर मन में यह प्रश्न और तीव्र हो उठता है—क्या यह सहज मार्ग उस जटिल विस्मृति को मिटा पाएगा, जिसने हमें अपनी ही जड़ों से दूर कर दिया है?

इस आयोजन को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य तब और व्यापकता मिली, जब विभिन्न प्रमुख समाचार माध्यमों ने इसे “संस्कृत के माध्यम से भारत की आत्मा को समझने की अनिवार्यता” के रूप में प्रस्तुत किया। यह दृष्टिकोण स्वयं में एक गहन संकेत है कि संस्कृत अब केवल एक भाषा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मबोध का माध्यम बनती जा रही है। जब इसे भारतीय भाषाओं की आत्मा के रूप में देखा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका पुनर्जागरण केवल भाषाई पुनरुद्धार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकात्मता की पुनर्स्थापना का भी आधार बन सकता है।

इस ऐतिहासिक अवसर पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, दिल्ली सरकार के कैबिनेट मंत्री प्रवेश वर्मा, प्रख्यात विद्वान डॉ. मुरली मनोहर जोशी, संस्कृतभारती के शीर्ष पदाधिकारी, विभिन्न समवैचारिक संगठनों के प्रतिनिधि तथा देशभर से आए असंख्य कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को अभूतपूर्व ऊंचाई प्रदान की। साथ ही सुरेश सोनी, चम्मू कृष्ण शास्त्री, प्रो. चांदकिरण सलूजा, दिनेश कामत, श्रीशदेव पुजारी, डॉ. वागीश भट्ट, नटेश जानकीरमण, जयप्रकाश, सत्यनारायण भट्ट सहित अनेक राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर के विद्वानों और पदाधिकारियों की उपस्थिति ने इस महायज्ञ को और अधिक विराट स्वरूप प्रदान किया।

समारोह के उपरांत मीडिया से संवाद करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में संस्कृत के प्रचार-प्रसार को लेकर चल रहे व्यापक प्रयासों पर प्रकाश डाला। उनके शब्दों में एक संघर्ष की तीव्रता, एक संकल्प की दृढ़ता और एक परिवर्तन की आकांक्षा स्पष्ट झलक रही थी। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि जब से क्षेत्र प्रचारक प्रमोद पंडित ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संभाली है, तब से संस्कृत को जनजीवन से जोड़ने की दिशा में अभूतपूर्व गति आई है। यह केवल भाषा के प्रसार की बात नहीं, बल्कि एक ऐसी वैचारिक लड़ाई है, जिसमें सांस्कृतिक अस्मिता को पुनर्स्थापित करने का प्रयास निहित है। उनके अनुसार गीतास्वाध्याय, संभाषण शिविर, पत्राचार केंद्र और डिजिटल माध्यमों से संचालित शिक्षण कार्यक्रम इस आंदोलन को जनांदोलन का स्वरूप दे रहे हैं—और यही वह बिंदु है, जहाँ यह प्रश्न और प्रखर हो उठता है कि क्या यह प्रयास एक क्षेत्र तक सीमित रहेगा, या सम्पूर्ण राष्ट्र की चेतना को परिवर्तित कर देगा?

यह आयोजन ऐसे समय में सम्पन्न हुआ है, जब आधुनिकता की तीव्र दौड़ में अपनी जड़ों से जुड़ाव एक चुनौती बनता जा रहा है। “प्रणवः” का यह लोकार्पण उस दिव्य उद्घोष के समान है, जो यह स्मरण कराता है कि यदि राष्ट्र को उसकी आत्मा से जोड़ना है, तो संस्कृत की ओर लौटना अनिवार्य है। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि उस अनश्वर स्पंदन का प्रतीक है, जो युगों से भारत की आत्मा में धड़कता रहा है—और अब पुनः अपने उत्कर्ष की ओर अग्रसर है। प्रश्न केवल इतना है—क्या हम इस जागरण के साक्षी बनकर रह जाएंगे, या स्वयं उसका हिस्सा बनकर इतिहास की इस नई धारा को दिशा देंगे?

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