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संस्कृतभारती के बारह दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग का भव्य दीक्षांत समारोह सम्पन्न, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने संस्कृत को बताया भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवनरेखा

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Dainik India News

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संस्कृतभारती के बारह दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग का भव्य दीक्षांत समारोह सम्पन्न, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने संस्कृत को बताया भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवनरेखा

देववाणी के पुनर्जागरण का महाअभियान: संस्कृतभारती के प्रयासों ने रचा एक नया अध्याय

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दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ में उस समय एक ऐतिहासिक वातावरण साकार हो उठा जब संस्कृतभारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र द्वारा आयोजित बारह दिवसीय संस्कृत प्रशिक्षण वर्ग का भव्य दीक्षांत समारोह गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। यह केवल एक प्रशिक्षण वर्ग का समापन नहीं था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान-परंपरा और भाषायी गौरव के पुनर्जागरण का सशक्त उद्घोष था। सभागार में उपस्थित विद्वानों, शिक्षकों, प्रशिक्षकों और प्रशिक्षणार्थियों के उत्साह ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की भी दिशा निर्धारित करने वाली शक्ति है।

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दीपप्रज्ज्वलन के साथ आरम्भ हुआ सांस्कृतिक चेतना का महायज्ञ

कार्यक्रम का शुभारम्भ दीपप्रज्ज्वलन के साथ हुआ। समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के निदेशक सर्वनारायण झा ने की। मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक उपस्थित रहे। मंच पर अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश, संस्कृतभारती अवध प्रांत के अध्यक्ष चन्द्र भूषण त्रिपाठी, प्रशिक्षण वर्ग के संयोजक कन्हैयालाल झा, पूर्व क्षेत्र के संपर्क प्रमुख एवं संस्कृतभारती न्यास अवध प्रांत के अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह, पूर्वी क्षेत्र के संगठन मंत्री प्रमोद पंडित, संस्कृतभारती के पूर्व अध्यक्ष शोभनलाल उकील तथा अवध प्रांत के मंत्री अनिल कुमार सहित अनेक विशिष्ट व्यक्तित्व उपस्थित रहे।

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जैसे-जैसे वक्ताओं के विचार सामने आते गए, वैसे-वैसे यह अनुभूति और गहन होती गई कि संस्कृतभारती केवल एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा को पुनः जागृत करने वाला एक विराट जनआंदोलन है।

प्रशिक्षणार्थी हैं संस्कृत पुनर्जागरण के ध्वजवाहक

अपने उद्बोधन में वक्ताओं ने प्रशिक्षणार्थियों को संस्कृत के भावी दूत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के ध्वजवाहक बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा का विस्तार केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि समर्पित व्यक्तित्वों के माध्यम से होता है। यही कारण है कि संस्कृतभारती ने देशभर में हजारों स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं के माध्यम से संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाने का अभूतपूर्व अभियान संचालित किया है।

वक्ताओं ने इस तथ्य पर विशेष बल दिया कि आज जब विश्व भारतीय ज्ञान-विज्ञान, योग, आयुर्वेद, दर्शन और अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहा है, तब संस्कृत का पुनरुत्थान केवल भाषायी आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व भी बन गया है।

सरकार और समाज के समन्वय से ही होगा संस्कृत का व्यापक विस्तार

अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि संस्कृत भारत की आत्मा और सनातन संस्कृति की प्राणधारा है। उन्होंने सरकार और समाज के मध्य सशक्त समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि संस्कृतभारती वर्षों से बिना किसी अपेक्षा के राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने में लगी हुई है। उन्होंने संगठन की विविध योजनाओं, संस्कृत संभाषण शिविरों और जनजागरण अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि समाज का सहयोग इसी प्रकार मिलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब संस्कृत पुनः जनजीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाएगी।

उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने दिया महत्वपूर्ण आश्वासन

समारोह के मुख्य अतिथि उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने संस्कृत को भारतीय ज्ञान परंपरा की जननी और सांस्कृतिक विरासत की आधारशिला बताते हुए कहा कि यह भाषा केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की विचारधारा का मूल स्रोत भी है। उन्होंने संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन हेतु प्रदेश सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए आश्वस्त किया कि संस्कृत शिक्षकों की नियुक्ति तथा शैक्षणिक संस्थानों में संस्कृत के सुदृढ़ीकरण के लिए गंभीर प्रयास किए जाएंगे।

उनके इस वक्तव्य का उपस्थित जनसमूह ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया। यह आश्वासन केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि संस्कृत के उज्ज्वल भविष्य के प्रति सरकार की सकारात्मक दृष्टि का प्रतीक बनकर उभरा।

संस्कृतभारती: भाषा नहीं, राष्ट्रचेतना का आंदोलन

समारोह के दौरान बार-बार यह भावना उभरकर सामने आई कि संस्कृतभारती ने पिछले अनेक दशकों में जिस निष्ठा, समर्पण और दूरदृष्टि के साथ संस्कृत के प्रचार-प्रसार का कार्य किया है, वह भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक प्रेरणादायी अध्याय है। गांवों से लेकर महानगरों तक, विद्यार्थियों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक, संस्कृत संभाषण की जो अलख संस्कृतभारती ने जगाई है, वह आज एक राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर चुकी है।

संस्कृतभारती के प्रयासों ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो किसी भाषा को केवल संरक्षित ही नहीं, बल्कि पुनः जीवंत भी बनाया जा सकता है। यही कारण है कि आज संस्कृतभारती भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षण की अग्रणी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है।

कृतज्ञता और संकल्प के साथ हुआ समापन

कार्यक्रम का सफल संचालन के. के. तिवारी ने किया। अंत में संयोजक कन्हैयालाल झा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, प्रशिक्षणार्थियों, शिक्षकों, विश्वविद्यालय प्रशासन, कर्मचारियों तथा संस्कृतभारती के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

दीक्षांत समारोह के समापन के साथ ही एक प्रशिक्षण वर्ग अवश्य पूर्ण हुआ, किंतु संस्कृत के नवोदय का यह अभियान एक नए उत्साह, नए संकल्प और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने का संदेश देकर गया। यह समारोह इस सत्य का साक्षी बना कि जब राष्ट्र अपनी जड़ों से जुड़ने का संकल्प लेता है, तब संस्कृत जैसी देववाणी केवल भाषा नहीं रहती, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण की आधारशिला बन जाती है।

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