68 वर्षीय प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और पद पर बने रहने की वैधानिकता को चुनौती; आयु सीमा, चयन प्रक्रिया, लोक सेवा आयोग से परामर्श और सेवा नियमों के अनुपालन पर याचिका में उठाए गए गंभीर प्रश्न
दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव पद पर प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और उनके पद पर बने रहने की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर लखनऊ हाई कोर्ट की खंडपीठ में गुरुवार को सुनवाई हो सकती है। 68 वर्षीय दुबे की नियुक्ति से संबंधित यह मामला न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है। विधानसभा के पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से अधिवक्ता डॉ. चेत नारायण सिंह और बलकेश्वर श्रीवास्तव के माध्यम से दाखिल याचिका में नियुक्ति की प्रक्रिया से लेकर पद पर बने रहने के अधिकार तक पर गंभीर विधिक प्रश्न उठाए गए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। याचिका पर पांच जून को सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार और विधानसभा सचिवालय को छह जुलाई से पहले जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके बाद मामला छह जुलाई, 16 जुलाई, 24 जुलाई और तीन अगस्त को भी सूचीबद्ध हुआ, लेकिन समयाभाव के कारण सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। अब एक बार फिर इस मामले के न्यायिक परीक्षण की संभावना ने विधानसभा सचिवालय में उच्च पद पर हुई नियुक्ति से जुड़े पुराने सवालों को सुर्खियों में ला दिया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2009 में प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय भर्ती एवं सेवा शर्तें नियम, 1974 के अनुरूप नहीं थी। याचिकाकर्ता के अनुसार संबंधित पद के लिए अधिकतम आयु सीमा 52 वर्ष निर्धारित थी। इसी आधार पर नियुक्ति के समय दुबे की आयु और पात्रता को लेकर प्रश्न उठाया गया है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि नियुक्ति के लगभग 16 वर्ष बाद भी इसकी वैधानिकता को लेकर न्यायिक मंच पर सवाल कायम हैं।
याचिका में उल्लेख किया गया है कि प्रदीप कुमार दुबे ने 13 जनवरी 2009 को न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और उसी दिन उन्हें संसदीय कार्य विभाग में प्रमुख सचिव नियुक्त किया गया। इसके छह दिन बाद उन्हें विधानसभा सचिवालय का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने का भी याचिका में उल्लेख है। याचिकाकर्ता ने इस पूरे घटनाक्रम को नियुक्ति की प्रक्रिया और उसके वैधानिक आधार की कसौटी पर परखे जाने की मांग की है।
आयु सीमा के अतिरिक्त याचिका में नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन, चयन प्रक्रिया, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा आयु सीमा में कथित विस्तार से जुड़े पहलुओं को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि निर्धारित पात्रता और सेवा नियमों के अनुरूप नियुक्ति हुई थी या नहीं, इसका न्यायिक परीक्षण आवश्यक है। इसी आधार पर संबंधित नियुक्ति की वैधानिकता और पद पर बने रहने के अधिकार पर अदालत से विचार करने का आग्रह किया गया है।
हालांकि, विधानसभा सचिवालय और विधानसभा अध्यक्ष की ओर से याचिका की पोषणीयता पर पहले ही आपत्ति दर्ज कराई जा चुकी है। उनकी ओर से अधिवक्ता अभिनव नारायण त्रिवेदी ने दलील दी थी कि प्रदीप कुमार दुबे ऐसा सार्वजनिक पद धारण नहीं कर रहे हैं, जिस पर क्वो वारंटो की रिट जारी की जा सके। इस आपत्ति के कारण मामले में नियुक्ति की वैधानिकता के साथ-साथ याचिका की ग्राह्यता का प्रश्न भी न्यायिक विचार के दायरे में आ गया है।
अब हाई कोर्ट की संभावित सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत के समक्ष उठाए गए प्रश्नों पर दोनों पक्ष किस प्रकार अपना पक्ष रखते हैं। मामला केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि विधानसभा सचिवालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में उच्च पदों पर नियुक्ति के दौरान आयु सीमा, पात्रता, चयन प्रक्रिया और निर्धारित सेवा नियमों के अनुपालन से जुड़े व्यापक विधिक प्रश्नों को भी सामने लाता है। यही वजह है कि 16 वर्ष पुरानी इस नियुक्ति पर होने वाली सुनवाई पर अब निगाहें टिक गई हैं।