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डालीगंज के रिहायशी सुकून पर 'व्यावसायिक' प्रहार, नियमों को ठेंगा दिखा रहा वेयरहाउस

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Dainik India News

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दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ। शहर के रिहायशी इलाकों में अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों का कैंसर किस कदर आम जनजीवन को खोखला कर रहा है, इसकी भयावह बानगी डालीगंज के शंकर नगर में देखने को मिल रही है। जहाँ कभी शाम की शांति और सुरक्षित गलियां पहचान हुआ करती थीं, आज वहां एक निजी वेयरहाउस ने अराजकता का साम्राज्य स्थापित कर दिया है। यह सिर्फ यातायात की समस्या नहीं है, बल्कि एक पूरे समाज की सुरक्षा, शुचिता और मानसिक शांति पर सीधा हमला है। स्थानीय लोगों के लिए अब अपने ही घरों की दहलीज असुरक्षित हो गई है, क्योंकि यहाँ व्यापार के नाम पर अभद्रता और नियम विरुद्ध गतिविधियों का खुला खेल चल रहा है। शंकर नगर चौराहे के समीप इस वेयरहाउस के संचालन ने रिहायशी इलाके की परिभाषा ही बदल दी है। यहाँ दिन की शुरुआत पक्षियों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि लोडिंग-अनलोडिंग के भारी शोर और डिलीवरी कर्मियों की आपरझप से होती है। स्थानीय निवासियों का दर्द गहरा है; उनका कहना है कि वेयरहाउस के बाहर जमा होने वाली भीड़ न केवल सड़क को बंधक बनाती है, बल्कि वहाँ का सामाजिक परिवेश भी दूषित कर रही है। महिलाओं और बच्चों का घर से निकलना दुश्वार हो गया है, क्योंकि घंटों सड़क घेरे खड़े युवक सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज, सिगरेट और शराब का सेवन करते नजर आते हैं। जब कोई नागरिक अपनी मर्यादा और शांति की दुहाई देता है, तो उसे सुधार के बजाय विवाद और मारपीट की धमकियां मिलती हैं। प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि हसनगंज पुलिस की छिटपुट कार्रवाई के बावजूद वेयरहाउस प्रबंधन के हौसले पस्त नहीं हुए हैं। रिहायशी नक्शे पर व्यावसायिक गतिविधियों का यह विस्तार स्पष्ट रूप से शहरी नियोजन की विफलता है। सड़क पर अव्यवस्थित खड़े वाहन हर समय किसी बड़े हादसे को दावत दे रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? एक दबंग ठेकेदार के निजी स्वार्थ के लिए सैकड़ों परिवारों की रातों की नींद छीनना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

जनता की हुंकार: अब आर-पार की लड़ाई

इस दमघोंटू माहौल से त्रस्त स्थानीय नागरिकों ने अब प्रशासन के सामने अपनी मांगों की एक स्पष्ट लकीर खींच दी है। क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने दो-टूक शब्दों में प्रशासन से मांग की है कि इस वेयरहाउस की प्रशासनिक स्वीकृति की गहनता से जांच कराई जाए और इसे तत्काल प्रभाव से रिहायशी क्षेत्र से हटाकर किसी उपयुक्त व्यावसायिक क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाए। नागरिक सिर्फ स्थानांतरण ही नहीं, बल्कि तात्कालिक राहत के तौर पर कड़े नियमों की भी मांग कर रहे हैं—जिसके तहत रात्रि 9 बजे के बाद संचालन पर पूर्ण रोक हो और सुबह 9 बजे के बाद ही गतिविधियां शुरू करने का सख्त नियम लागू किया जाए, ताकि क्षेत्र में खोई हुई शांति पुनः बहाल हो सके।

अब समय आ गया है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन इस मामले में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाए। स्थानीय नागरिकों की यह मांग महज एक विनती नहीं, बल्कि अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का दावा है। अगर अब भी प्रशासन ने कुंभकर्णी नींद नहीं त्यागी और इस रिहायशी प्रार्थना को अनसुना किया, तो डालीगंज का यह आक्रोश एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है। यह अपनी शांति और सुरक्षा वापस पाने की एक मोहल्ले की जंग है, जिसमें जीत अंततः न्याय और नियमों की होनी चाहिए।

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