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अजय दीप सिंह के वैदांतिक उद्बोधन ने ‘सनातन’ की समकालीन परिभाषा को दिया गहन आयाम

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Dainik India News

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अजय दीप सिंह के वैदांतिक उद्बोधन ने ‘सनातन’ की समकालीन परिभाषा को दिया गहन आयाम

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।राजधानी लखनऊ में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अजय दीप सिंह के आवास पर संपन्न विश्व हिंदू परिषद की महत्वपूर्ण बैठक केवल संगठनात्मक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी अत्यंत अर्थगर्भित सिद्ध हुई। बैठक की औपचारिक समाप्ति के पश्चात मीडिया से संवाद करते हुए अजय दीप सिंह ने धर्म, सनातन, गीता और वेदांत के आलोक में ऐसे विचार प्रस्तुत किए, जिन्होंने उपस्थित जनसमूह को गहन आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया। उनका वक्तव्य किसी क्षणिक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि शास्त्रीय चिंतन, प्रशासनिक अनुभव और आध्यात्मिक अनुशासन का सुसंगठित निष्कर्ष प्रतीत हुआ।
सनातन धर्म की व्याख्या करते हुए अजय दीप सिंह ने स्पष्ट किया कि सनातन किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान का पर्याय नहीं, बल्कि एक सार्वकालिक और सर्वसमावेशी जीवन-दृष्टि है। उन्होंने कहा कि “समूचा भारत हमारा परिवार है”, किंतु इस व्यापक भावबोध से पूर्व उस सूक्ष्म सत्य को समझना आवश्यक है कि जिस परिवार में हमारा जन्म हुआ—माता-पिता—वही हमारे प्रथम गुरु हैं। यह कथन मात्र भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि वैदांतिक परंपरा की उस मूल अवधारणा से जुड़ा है, जिसमें जीवन की प्रथम शिक्षा संस्कारों के रूप में माता-पिता से ही प्राप्त होती है।


उन्होंने आगे कहा कि माता-पिता द्वारा प्रदत्त संस्कार ही मनुष्य के चरित्र, आचरण और दृष्टिकोण की आधारशिला निर्मित करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने दीक्षा और द्विजत्व की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब कोई साधक विधिवत दीक्षा ग्रहण करता है, तब वह केवल कर्मकांड का अनुयायी नहीं बनता, बल्कि आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में आत्मबोध की यात्रा पर अग्रसर होता है। यही दीक्षा मनुष्य को द्विज बनाती है—अर्थात ऐसा व्यक्तित्व, जो जन्म से नहीं, बल्कि ज्ञान से पुनर्जन्म प्राप्त करता है।


अजय दीप सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि इस द्विजत्व का उद्देश्य किसी अन्य पंथ, मत या मजहब से टकराव नहीं है, बल्कि स्वयं के अंतःकरण का परिष्कार और चेतना का उत्थान है। उन्होंने कहा कि जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि समस्त पृथ्वी और समूचा ब्रह्मांड एक ही परमपिता परमात्मा की अभिव्यक्ति है, तब किसी भी धर्म या संप्रदाय से वैमनस्य का प्रश्न स्वतः ही समाप्त हो जाता है। यह विचार वैदांतिक अद्वैत की उस भावना को प्रतिध्वनित करता है, जिसमें एकत्व की अनुभूति सर्वोपरि मानी गई है।


गीता के संदर्भ में बोलते हुए अजय दीप सिंह ने अत्यंत दृढ़ और स्पष्ट शब्दों में कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कभी भी पलायन या कायरता का संदेश नहीं दिया। गीता का उपदेश मोह, शोक और आत्मसंशय से मुक्ति का मार्ग है, न कि निष्क्रियता का समर्थन। जब अर्जुन कर्तव्य-विमूढ़ हुआ, तब श्रीकृष्ण ने उसे ब्रह्मज्ञान प्रदान किया—ऐसा ज्ञान, जिसने उसे उसके स्वधर्म का साक्षात्कार कराया।


उन्होंने कहा कि ज्ञान की प्राप्ति के उपरांत अर्जुन ने अधर्मी कौरवों के विरुद्ध युद्ध किया, न कि प्रतिशोध की भावना से, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए। यह युद्ध विनाश के लिए नहीं, बल्कि अधर्म के उन्मूलन हेतु था। अजय दीप सिंह ने रेखांकित किया कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि अन्याय को सहन करो, बल्कि यह कहा कि अपने धर्मक्षेत्र में जो अधर्म बनकर खड़ा है, उसका सामना करो, ताकि धर्म के मार्ग में कोई बाधा शेष न रहे।


अपने वक्तव्य के अंतिम चरण में उन्होंने सद्गुरु और ब्रह्मज्ञान की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जो साधक सद्गुरु की शरण में जाता है, उसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। यह ब्रह्मज्ञान मनुष्य को उसके सीमित अहं से मुक्त कर ब्रह्म में समाहित कर देता है। जब मनुष्य इस अवस्था को प्राप्त करता है, तब वह पापरूपी भवसागर से तर जाता है और उसका जीवन केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित न रहकर लोककल्याण की दिशा में प्रवाहित होने लगता है।


समग्र रूप से यह बैठक और अजय दीप सिंह का वैचारिक उद्बोधन इस तथ्य का सशक्त प्रमाण बना कि उनका व्यक्तित्व केवल प्रशासनिक दक्षता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सनातन, वेदांत और गीता की गहन समझ से अनुप्राणित है। उनका चिंतन न तो उग्रता का पोषक है और न ही निष्क्रियता का समर्थक, बल्कि वह धर्म को विवेक, ज्ञान और कर्तव्य के संतुलित समन्वय के रूप में स्थापित करता है। यही कारण है कि उनका प्रत्येक विचार पाठक और श्रोता को अगले विचार तक सहज रूप से आकृष्ट करता है और सनातन को एक जीवंत, गतिशील तथा समकालीन जीवन-दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

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