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गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष का राष्ट्र को संदेश: संविधान, संस्कृति और कर्तव्यबोध से ही सशक्त होगा भारत

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Dainik India News

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गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष का राष्ट्र को संदेश: संविधान, संस्कृति और कर्तव्यबोध से ही सशक्त होगा भारत


भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने समस्त राष्ट्र को हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए एक ओजस्वी, विचारोत्तेजक और राष्ट्रबोध से परिपूर्ण संदेश दिया। अपने संदेश में उन्होंने भारतीय गणतंत्र को केवल एक संवैधानिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों से प्रवहमान सनातन चेतना का आधुनिक, संगठित और लोकतांत्रिक स्वरूप बताया।


जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि 26 जनवरी केवल संविधान अंगीकार करने की तिथि नहीं है, बल्कि यह वह ऐतिहासिक क्षण है जब भारत ने अपनी सांस्कृतिक आत्मा, ऐतिहासिक संघर्ष और सभ्यतागत मूल्यों को विधिसम्मत शासन-व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान की आत्मा केवल अधिकारों में नहीं, बल्कि कर्तव्यों, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व में निहित है।


राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने संदेश में इस बात पर विशेष बल दिया कि आज का भारत जिस संक्रमणकाल से गुजर रहा है, उसमें गणतंत्र दिवस केवल औपचारिक उत्सव बनकर न रह जाए, बल्कि यह आत्ममंथन और आत्मबोध का अवसर बने। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने राजनीतिक लोकतंत्र तो स्थापित कर लिया, किंतु सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आत्मगौरव और नैतिक अनुशासन को सुदृढ़ करने का कार्य अभी भी सतत प्रयास की अपेक्षा करता है।


संविधान और सनातन परंपरा के अंतर्संबंधों की व्याख्या करते हुए जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि भारतीय संविधान की मूल भावना—न्याय, समता, बंधुत्व और गरिमा—सीधे-सीधे सनातन दर्शन से उद्भूत है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ जैसे सूत्र केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सुशासन और सामाजिक संतुलन के शाश्वत सिद्धांत हैं, जिन्हें संविधान ने आधुनिक संदर्भ में रूपायित किया है।
उन्होंने नागरिक कर्तव्यों पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हुए कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने दायित्वों के प्रति भी सजग हो। अनुशासन, ईमानदारी, श्रमशीलता और राष्ट्रनिष्ठा—ये गुण ही गणतंत्र को सुदृढ़ बनाते हैं। यदि नागरिक अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएँ, तो सबसे उत्तम संविधान भी निष्प्रभावी हो जाता है।


राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष ने युवाओं से आह्वान किया कि वे गणतंत्र दिवस को केवल अवकाश या उत्सव के रूप में न देखें, बल्कि इसे राष्ट्र-निर्माण के संकल्प-दिवस के रूप में आत्मसात करें। उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य केवल नीतियों या योजनाओं से नहीं, बल्कि संस्कारित, चरित्रवान और राष्ट्रचेतना से युक्त युवा पीढ़ी से सुरक्षित होगा।
अपने संदेश के समापन में जितेन्द्र प्रताप सिंह ने समस्त देशवासियों से आग्रह किया कि वे संविधान के प्रति श्रद्धा, राष्ट्र के प्रति निष्ठा और संस्कृति के प्रति सम्मान को अपने आचरण में उतारें। उन्होंने कहा कि जब संविधान की मर्यादा, संस्कृति की गरिमा और नागरिक कर्तव्यों की चेतना एक साथ जाग्रत होती है, तभी गणतंत्र केवल शासन-व्यवस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र-चरित्र बनता है।
राष्ट्रीय सनातन महासंघ के इस राष्ट्रोन्मुख संदेश को विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संगठनों ने प्रेरणादायी बताते हुए गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रचिंतन का सारगर्भित उद्घोष करार दिया है।

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