3 सितंबर के दो ज्ञापों से सामने आया घटनाक्रम—अयोध्या भेजे गए रवि केश कुमार को 37 दिन बाद एमडी शिविर में तैनाती, राम राज के आदेश में रायबरेली के साथ लखनऊ का उल्लेख
दैनिक इंडिया न्यूज़ 8 सितंबर 2026 लखनऊ। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एमवीवीएनएल) में हाल में जारी तैनाती आदेशों ने प्रशासनिक प्रक्रिया, स्थानांतरण की मंशा और ‘प्रशासनिक आवश्यकता’ के आधार पर लिए जा रहे निर्णयों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, तीन सितंबर 2026 को मुख्यालय, 4-ए गोखले मार्ग से जारी दो अलग-अलग ज्ञापनों में ऐसे बदलाव सामने आए हैं, जिनकी समयावधि और आदेशों में दर्ज पदस्थापन विवरण सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया की कसौटी पर स्पष्टीकरण की मांग करते हैं।
सबसे उल्लेखनीय मामला कार्यकारी सहायक रवि केश कुमार, SAP-16601589 का है। 28 जुलाई 2026 के आदेश संख्या 821 के माध्यम से उन्हें अयोध्या में तैनाती दी गई थी। लेकिन महज 37 दिन बाद, तीन सितंबर को जारी आदेश के जरिए उन्हें लखनऊ स्थित प्रबंध निदेशक (एमडी) के शिविर कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया। इतनी अल्प अवधि में तैनाती बदलने का आधार क्या था और वह कौन-सी प्रशासनिक आवश्यकता थी, जिसके चलते पूर्व आदेश की उपयोगिता 37 दिन में ही समाप्त हो गई—यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है।
इसी दिन जारी दूसरे आदेश संख्या 820 में कैंप असिस्टेंट राम राज, SAP-16600021 के संबंध में पदस्थापन का उल्लेख किया गया है। आदेश में मुख्य अभियंता (वितरण), रायबरेली क्षेत्र का संदर्भ है, जबकि कोष्ठक में अधीक्षण अभियंता, विद्युत कार्य खंड, लखनऊ के अधीन तैनाती का उल्लेख भी दर्ज है। आदेश की इस दोहरी भाषा से प्रशासनिक नियंत्रण और वास्तविक कार्यस्थल को लेकर स्पष्टता की आवश्यकता महसूस होती है। यदि नियंत्रणाधिकार और कार्यस्थल अलग-अलग हैं तो आदेश में उसकी स्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था दर्ज होना पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
2025 के पाण्डेय प्रकरण से भी जुड़ती है कहानी—गृह जनपद से बाहर तैनाती के बाद उन्नाव में कार्यभार का मामला; आदेशों की प्रक्रिया और औचित्य स्पष्ट करने की जरूरत
इन ताजा आदेशों को समझने के लिए वर्ष 2025 के एक अन्य प्रकरण का संदर्भ भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 15 जून 2025 के आदेश संख्या 702 के तहत कार्यकारी सहायक राजेश कुमार पाण्डेय, SAP-16601403, जिनका गृह जनपद उन्नाव बताया गया, को लखनऊ ग्रामीण/अमेठी से मुख्य अभियंता (वितरण), रायबरेली क्षेत्र में तैनाती दी गई थी। आदेश में गृह जनपद से बाहर पदस्थापन तथा उच्चतम न्यायालय में लंबित याचिका संख्या 79/1997 और 21 मार्च 2007 के निर्देशों का भी संदर्भ दर्ज बताया गया है।
इसके बाद मुख्य अभियंता (वितरण), रायबरेली क्षेत्र के पत्र संख्या 3079 के माध्यम से उन्हें विद्युत वितरण खंड, उन्नाव में कार्यभार दिए जाने का उल्लेख सामने आता है। यहां ‘स्थानांतरण’ और ‘पद विस्तार’ के बीच प्रशासनिक अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि किसी कर्मचारी की मूल तैनाती एक क्षेत्र में की गई हो और बाद में उसे गृह जनपद में कार्यभार दिया गया हो, तो उस प्रक्रिया का विधिक एवं प्रशासनिक आधार अभिलेखों में स्पष्ट होना अपेक्षित है।
पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो तीन तारीखें महत्वपूर्ण बनती हैं—15 जून 2025 का पाण्डेय प्रकरण, 28 जुलाई 2026 को रवि केश कुमार की अयोध्या तैनाती और 3 सितंबर 2026 को महज 37 दिन बाद उनकी लखनऊ में पुनःतैनाती। यही क्रम अब निगम की स्थानांतरण नीति और ‘प्रशासनिक आवश्यकता’ की व्याख्या पर सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
यहां किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध अनियमितता का निष्कर्ष निकालना न तो उचित होगा और न ही उपलब्ध आदेश मात्र उसके लिए पर्याप्त हैं। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में निर्णय का आधार, सक्षम स्तर से अनुमोदन, तैनाती की वास्तविक आवश्यकता और आदेशों की परस्पर संगति सार्वजनिक संस्थानों में भरोसे का आधार होते हैं। विशेषकर तब, जब एक ही कर्मचारी की तैनाती बहुत कम समय में बदल जाए या एक आदेश में पदस्थापन के दो अलग-अलग प्रशासनिक संदर्भ दिखाई दें।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विद्युत वितरण निगम जैसी सार्वजनिक उपयोगिता वाली संस्था में मानव संसाधन से जुड़े निर्णय सीधे विभागीय कार्यप्रणाली और जवाबदेही से जुड़े होते हैं। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना उपयोगी होगा कि तीन सितंबर के दोनों आदेश किस प्रस्ताव, किस प्रशासनिक आवश्यकता और किस सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के आधार पर जारी हुए। इसी तरह पूर्व के प्रकरणों में स्थानांतरण, कार्यभार और ‘पद विस्तार’ के बीच अपनाई गई प्रक्रिया का रिकॉर्ड क्या कहता है, यह भी सामने आना चाहिए।
सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता का है जिसके आधार पर तैनातियां बदलती हैं। यदि सभी निर्णय नियमों, सक्षम स्वीकृति और दर्ज प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप हुए हैं तो संबंधित अभिलेख ही उठ रहे सवालों का सबसे ठोस उत्तर दे सकते हैं। और यदि कहीं प्रक्रिया में अस्पष्टता है, तो उसे दूर करना निगम की प्रशासनिक विश्वसनीयता के लिए उतना ही आवश्यक है।