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*“आत्मप्रवंचना के शिकार बनते लोग: आग से अधिक भयावह वह झूठ, जो भीतर जल रहा है”*

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*“आत्मप्रवंचना के शिकार बनते लोग: आग से अधिक भयावह वह झूठ, जो भीतर जल रहा है”*

दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ। प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विकासनगर की वह सांध्य बेला—जब घड़ी की सुइयाँ लगभग साढ़े पाँच पर ठहर-सी गई थीं—अचानक एक ऐसी विभीषिका में परिवर्तित हो उठी, जिसकी ज्वाला ने केवल झुग्गी-झोपड़ियों को ही नहीं, बल्कि हजारों सपनों, उम्मीदों और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को भी भस्म कर दिया। देखते ही देखते आग ने ऐसा विकराल रूप धारण किया कि वह मानो किसी दैत्य की भाँति हर ओर फैलती चली गई। जिन घरों में अभी कुछ क्षण पूर्व बच्चों की किलकारियाँ गूँज रही थीं, वहाँ अब राख के सिवा कुछ भी शेष नहीं था। यह केवल एक अग्निकांड नहीं था—यह उन असंख्य परिवारों के अस्तित्व पर पड़ा वह घातक प्रहार था, जिसकी पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती।



जिसका घर जलता है, वही जानता है कि राख के ढेर में केवल ईंट-पत्थर नहीं होते, वहाँ किसी की पूरी जिंदगी दफन होती है। कोई अपने बिछड़े परिजन के लिए विलाप कर रहा था, तो कोई उस छत के लिए, जिसके नीचे उसने जीवन की हर कठिनाई को सहा था। उस रात, आँसू भी मानो असहाय थे—वे उस वेदना को व्यक्त करने में असमर्थ थे, जो हर चेहरे पर स्पष्ट रूप से अंकित थी। प्रश्न यह है कि क्या यह त्रासदी केवल एक दुर्घटना थी, या फिर यह हमारी व्यवस्थाओं की शिथिलता और संवेदनहीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण?



जब शहर की सड़कों पर रोज़-रोज़ जाम लगता है, जब चौराहों पर अव्यवस्था का साम्राज्य स्थापित हो जाता है, तब यह केवल एक सामान्य असुविधा नहीं होती—यह किसी संभावित आपदा की भूमिका होती है। ट्रैफिक व्यवस्था की अव्यवस्थित बैरिकेटिंग, निचले स्तर पर लापरवाही, और कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा चौराहों को अवरुद्ध कर देना—ये सब मिलकर उस दिन एक घातक परिणाम में परिणत हुए। यदि दमकल की गाड़ियाँ समय पर पहुँच जातीं, यदि रास्ते बाधारहित होते, तो शायद आज इतनी बड़ी क्षति न होती। क्या यह प्रश्न सरकार और प्रशासन के समक्ष नहीं खड़ा होता कि आपातकालीन परिस्थितियों के लिए हमारी व्यवस्थाएँ इतनी दुर्बल क्यों हैं?



विडंबना यह भी है कि जिस समय “ऑपरेशन सिंदूर” जैसे अभियानों के अंतर्गत आपदा प्रबंधन की ट्रेनिंग दी जा रही थी, उसी समय यह अपेक्षा की जा रही थी कि संकट की घड़ी में यह प्रशिक्षण कारगर सिद्ध होगा। परंतु जब वास्तविक आपदा सामने आई, तो वह प्रशिक्षण कहीं हाशिए पर चला गया। क्या यह केवल एक औपचारिकता थी? क्या यह केवल कागजों में सिमटा हुआ एक प्रयास था? यदि प्रशिक्षण का वास्तविक उपयोग ही नहीं हो सका, तो उसकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।



और इसी त्रासदी के बीच एक और भयावह दृश्य सामने आया—मानवता के नाम पर पनपती आत्मप्रवंचना का। जहाँ एक ओर कुछ लोग अपने कार्यों को त्यागकर पीड़ितों की सहायता में जुटे थे—किसी ने भोजन दिया, किसी ने वस्त्र, किसी ने श्रमदान किया—वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे भी थे, जो इस पीड़ा को अवसर में बदलने में लगे थे। दो बिस्कुट थमाकर फोटो खिंचवाना, चॉकलेट देकर सोशल मीडिया पर स्वयं को दयालु सिद्ध करना—क्या यही मानवता है? क्या यही सेवा है? या यह केवल एक विकृत मानसिकता का प्रदर्शन है, जहाँ संवेदनाएँ नहीं, बल्कि स्वार्थ सर्वोपरि हो जाता है?



यह आत्मप्रवंचना केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, यह सामाजिक चेतना को भी प्रदूषित कर रही है। जब लोग सहायता से अधिक प्रदर्शन को महत्व देने लगते हैं, तब समाज का नैतिक आधार कमजोर हो जाता है। उस दिन जब आग बुझाने की आवश्यकता थी, तब कुछ लोग “रील” बनाने में व्यस्त थे। वे स्वयं को समाजसेवी सिद्ध करने में इतने लिप्त थे कि उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि उनके सामने कोई अपनी पूरी दुनिया खो चुका है। क्या यह वही समाज है, जिसे हम “विश्व गुरु” बनाने का स्वप्न देख रहे हैं?



क्या भारत ऐसे ही विश्व गुरु बनेगा—जहाँ पीड़ा भी प्रदर्शन का साधन बन जाए? जहाँ सहायता भी प्रचार का माध्यम बन जाए? मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ, जिन्होंने केवल फोटो खिंचवाने के लिए हजारों रुपये खर्च कर दिए—क्या उन्होंने कभी यह सोचा कि उन्हीं पैसों से कितने भूखे पेट भर सकते थे? क्या यह दिखावा हमें उस ऊँचाई तक ले जाएगा, जहाँ से हम विश्व को मार्गदर्शन दे सकें?



यह समय केवल प्रश्न उठाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। हमें यह विचार करना होगा कि क्या हम वास्तव में समाज के लिए कुछ कर रहे हैं, या केवल स्वयं को महान सिद्ध करने के प्रयास में लगे हैं। यदि समाज हमारा परिवार है, तो क्या हम उसके लिए वही समर्पण नहीं दिखा सकते, जो एक पिता अपने पुत्र के लिए करता है, जो एक माँ अपने बच्चे के लिए करती है? जिस दिन यह भावना प्रत्येक हृदय में जागृत हो जाएगी, उसी दिन भारत केवल विश्व गुरु ही नहीं, बल्कि “विश्व पिता” बनने की दिशा में अग्रसर होगा।



अंततः, यह आग केवल विकासनगर की बस्ती में नहीं लगी थी—यह हमारे अंतर्मन में भी प्रज्वलित हो उठी थी। फर्क इतना है कि वहाँ की ज्वालाएँ दिखाई दे रही थीं, और यहाँ की ज्वालाएँ अदृश्य हैं। वहाँ के घर राख हो गए, और यहाँ हमारे मूल्य। यदि अब भी हम नहीं जागे, यदि अब भी हमने स्वयं से सच बोलना नहीं सीखा, तो वह दिन दूर नहीं जब हम केवल एक ऐसे समाज में परिवर्तित हो जाएँगे, जहाँ सत्य का कोई स्थान नहीं होगा—और जहाँ हर व्यक्ति अपनी ही आत्मप्रवंचना का शिकार बन चुका होगा।



और यही आत्मप्रवंचना आगे चलकर केवल नैतिक पतन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह मनुष्य के भीतर अनेक मानसिक और सामाजिक “रोगों” को जन्म देती है। यह धीरे-धीरे अहंकार, संवेदनहीनता और आत्ममुग्धता का कारण बनती है। व्यक्ति अपने ही बनाए हुए भ्रम में इतना डूब जाता है कि उसे अपनी त्रुटियाँ दिखाई देना बंद हो जाती हैं। वह स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए हर उस सीमा को पार कर देता है, जहाँ से वापसी कठिन हो जाती है। यह एक ऐसी अदृश्य बीमारी है, जो शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा को ग्रसित करती है—और जिसका उपचार केवल सत्य के स्वीकार में ही निहित है।



यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह समाज के लिए एक गंभीर संकट का रूप ले सकती है। एक ऐसा समाज, जहाँ लोग सत्य से अधिक अपने दिखावे को महत्व देंगे, वहाँ विश्वास, करुणा और नैतिकता जैसे मूल्य धीरे-धीरे समाप्त हो जाएँगे। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम इस आत्मप्रवंचना को पहचानें, उसे चुनौती दें, और अपने भीतर सच्चाई का दीप प्रज्वलित करें—क्योंकि वही प्रकाश हमें एक स्वस्थ, संवेदनशील और सशक्त समाज की ओर अग्रसर कर सकता है।

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