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उत्तर प्रदेश बिजली विवाद और गहराया: प्राइवेटाइजेशन अटकने की खीझ क्या उपभोक्ताओं पर बन रही कहर?

बिना सहमति प्रीपेड मीटर, बढ़ती कटौती और महंगे बिल का डर — आखिर किसकी जिम्मेदारी? प्राइवेटाइजेशन फंसा तो व्यवस्था बिगाड़ने की साजिश? सवालों के घेरे में अधिकारी और नीतियां

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Dainik India News

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उत्तर प्रदेश बिजली विवाद और गहराया: प्राइवेटाइजेशन अटकने की खीझ क्या उपभोक्ताओं पर बन रही कहर?







दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ, उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था अब केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह आम जनजीवन की धड़कनों से जुड़ा हुआ संकट बनती जा रही है। बिना उपभोक्ताओं की लिखित सहमति के लाखों पोस्टपेड कनेक्शनों को प्रीपेड स्मार्ट मीटर में परिवर्तित करना, अनुरक्षण कार्यों को निजी हाथों में सौंपना और संविदा कर्मियों की छंटनी—इन सबने मिलकर एक ऐसे संकट को जन्म दिया है, जिसकी आहट अब हर घर तक पहुंचने लगी है। गर्मी की दस्तक के साथ ही बिजली कटौती, ट्रांसफार्मरों के जलने और आसमान छूते बिलों का भय लोगों के मन में गहराने लगा है।


चिनहट निवासी भारतीय जनता पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के नेता अशफाक जया खान की पीड़ा इस पूरे घटनाक्रम की एक झलक मात्र है। उनका कहना है—“मैंने कभी प्रीपेड मीटर के लिए सहमति नहीं दी, फिर भी बिना पूछे मेरा कनेक्शन प्रीपेड कर दिया गया। अब गर्मी में खपत बढ़ेगी तो बार-बार रिचार्ज कराना पड़ेगा, अन्यथा भीषण गर्मी में कनेक्शन कट जाएगा।” यह केवल एक व्यक्ति की शिकायत नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की चिंता है जिनके सामने अब ‘रिचार्ज या अंधकार’ जैसी विकट स्थिति खड़ी हो रही है। क्या यह व्यवस्था गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक प्रहार नहीं है?


आंकड़े स्वयं इस कथित ‘सुधार’ की कहानी बयान कर रहे हैं। प्रदेश में 84.5 लाख से अधिक स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं, जिनमें से लगभग 75.5 लाख उपभोक्ताओं के कनेक्शन बिना लिखित सहमति के प्रीपेड मोड में परिवर्तित कर दिए गए। जबकि केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने लोकसभा में स्पष्ट किया था कि डिफॉल्ट मोड पोस्टपेड रहेगा और इसे चुनना उपभोक्ता का अधिकार होगा। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक पंकज कुमार द्वारा सभी नए कनेक्शनों पर प्रीपेड मीटर अनिवार्य करने का आदेश—क्या इसे प्रशासनिक दृढ़ता कहा जाए या तानाशाही का संकेत?


यहीं से कहानी एक नए मोड़ पर पहुंचती है—वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग के नाम पर अनुरक्षण कार्यों को निजी एजेंसियों को सौंपा जा रहा है। बाराबंकी, मथुरा और मेरठ जैसे जिलों में यह प्रक्रिया पहले ही लागू हो चुकी है। हालांकि कमर्शियल बिलिंग अभी पूरी तरह आउटसोर्स नहीं हुई है, लेकिन जिस दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं, उससे भविष्य की तस्वीर साफ झलकने लगी है। क्या यह ‘सुधार’ है या धीरे-धीरे सरकारी नियंत्रण को समाप्त करने की पूर्व भूमिका?

और फिर आता है वह प्रश्न, जो पूरे घटनाक्रम को और अधिक रहस्यमय बना देता है। पावर कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक द्वारा आउटसोर्स सेवा निगम के बजाय विभागीय स्तर पर संविदा कर्मियों की भर्ती करने की छूट मांगी जाती है, जबकि सेवा निगम न्यूनतम 18000 रुपये वेतन, चिकित्सा और अन्य सुविधाएं प्रदान करता है। जब बेहतर वेतन और सुविधाएं उपलब्ध हैं, तो फिर इस व्यवस्था से परहेज क्यों? क्या इसके पीछे कोई अदृश्य स्वार्थ छिपा है, या फिर यह केवल प्रशासनिक जटिलता का परिणाम है?


वर्तमान स्थिति तो और भी विचलित करने वाली है। ऊर्जा विभाग के संविदा कर्मियों को कुशल होने पर लगभग 11500 रुपये और अकुशल होने पर लगभग 9500 रुपये दिए जा रहे हैं, जबकि हाल ही में जारी न्यूनतम मजदूरी अधिसूचना के अनुसार नगर निगम क्षेत्रों में कुशल कर्मियों के लिए 16025 रुपये और अकुशल के लिए 13005 रुपये निर्धारित किए गए हैं। जो कर्मी दिन-रात अपनी जान जोखिम में डालकर बिजली आपूर्ति को सुचारु रखते हैं, वही न्यूनतम मजदूरी से भी वंचित हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या अधिकारियों की प्राथमिकता कर्मचारियों का कल्याण है या फिर टेंडर और कमीशन का गणित?


इसी बीच एक और परत खुलती है—पूर्वांचल में बिजली बिल वसूली करने वाली एक फिनटेक कंपनी द्वारा फर्जी रसीद जारी करने का घोटाला सामने आता है। यह वही कार्य है जो पहले विभागीय कर्मचारियों द्वारा सुचारु रूप से किया जा रहा था। अब वही कार्य निजी कंपनी को सौंपा गया, और परिणाम—घोटाला। क्या यह संयोग है या किसी सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा?

स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब आंकड़े बताते हैं कि पावर कॉरपोरेशन के पास लगभग 78,000 आउटसोर्स कर्मी हैं, जिनमें से बड़ी संख्या सब-स्टेशनों के संचालन और अनुरक्षण में लगी हुई है। संविदा कर्मियों की छंटनी और वर्टिकल व्यवस्था के बाद फील्ड स्टाफ में भारी कमी आई है। कर्मचारी संगठन पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि गर्मी में लोड बढ़ने पर ट्रांसफार्मर जलेंगे, लाइन फॉल्ट बढ़ेंगे और मरम्मत में देरी होगी। क्या यह आने वाले संकट की पूर्व चेतावनी नहीं?


अब सबसे बड़ा और सबसे विवादास्पद प्रश्न—क्या यह सब केवल संयोग है? या फिर इसके पीछे कोई गहरी रणनीति काम कर रही है? पूर्वांचल और दक्षिणांचल वितरण निगमों के 42 जिलों में 51/49 पीपीपी मॉडल पर प्राइवेटाइजेशन की कोशिशें जारी हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग द्वारा उठाए गए सवालों के कारण यह प्रक्रिया फिलहाल ठप है। कर्मचारी यूनियन और उपभोक्ता संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। ऐसे में जनमानस के बीच यह चर्चा तेज हो रही है कि क्या प्राइवेटाइजेशन के अटकने की खीझ अब व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर करने के रूप में सामने आ रही है?


प्रीपेड मीटर, आउटसोर्स अनुरक्षण, स्टाफ की कमी, बढ़ती कटौती और महंगे बिल—क्या यह सब एक संयोग है, या फिर एक ऐसा दबाव बनाने की रणनीति, जिससे निजीकरण को अपरिहार्य सिद्ध किया जा सके? क्या यह सरकार को बदनाम करने की अंदरूनी साजिश है, या फिर प्रशासनिक अनुभवहीनता का परिणाम?

इधर मौसम विभाग ने भीषण गर्मी की चेतावनी जारी कर दी है। लखनऊ में हाल ही में आए आंधी-तूफान के बाद 22 घंटे तक बिजली आपूर्ति बाधित रही, जिसका मुख्य कारण संविदाकर्मियों की कमी बताई गई। यदि अभी यह हाल है, तो मई-जून की तपती गर्मी और उसके बाद उमस भरी बरसात में स्थिति क्या होगी—यह कल्पना ही भयावह है।


अंततः प्रश्न वहीं आकर ठहर जाता है—क्या यह सब केवल नीतिगत असफलता है, या फिर सत्ता और स्वार्थ के बीच चल रहा कोई अदृश्य खेल? क्या कुछ अधिकारी वास्तव में नहीं चाहते कि व्यवस्था सुधरे, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक समीकरण काम कर रहा है? यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यदि समय रहते इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह संकट केवल बिजली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जनाक्रोश का कारण भी बन सकता है।


अब देखना यह है कि यह अंधकार केवल बिजली का है—या फिर व्यवस्था के भीतर पनप रहे उस साए का, जिसे समझना अभी बाकी है।

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