ब्रेकिंग न्यूज़
गोमती की बाढ़ पर योगी का ‘मास्टर प्लान’, फैजुल्लागंज से नैमिष तक तटबंध का रास्ता साफ | छठ पर सार्वजनिक अवकाश की मांग, योगी से मिला भोजपुरी समाज | गायत्री परिवार के शताब्दी संकल्प से 2047 के भारत तक—योगी ने शिक्षकों को सौंपा ‘युग निर्माण’ का दायित्व | बाढ़ के बीच प्रभावितों के बीच पहुंचे योगी, लखनऊ-सीतापुर का हवाई सर्वेक्षण कर जाना जमीनी हाल | गोमती के जलसैलाब से फैजुल्लागंज को स्थायी राहत की राह खुली, IIM रोड से हार्डिंग ब्रिज तक बनेगा बांध | वॉलीबॉल खेल रहे युवक से मारपीट, फायरिंग का आरोप | एक साल पहले संसद में रवि किशन ने उठाया था कानून के दुरुपयोग का मुद्दा, फर्जी मुकदमों पर कड़ी कार्रवाई की सरकार से की थी मांग | U.S. Tightens Grip on COVID Relief Fraud as Enforcement Uncovers $245 Million in Intended Losses | गोमती की बाढ़ पर योगी का ‘मास्टर प्लान’, फैजुल्लागंज से नैमिष तक तटबंध का रास्ता साफ | छठ पर सार्वजनिक अवकाश की मांग, योगी से मिला भोजपुरी समाज | गायत्री परिवार के शताब्दी संकल्प से 2047 के भारत तक—योगी ने शिक्षकों को सौंपा ‘युग निर्माण’ का दायित्व | बाढ़ के बीच प्रभावितों के बीच पहुंचे योगी, लखनऊ-सीतापुर का हवाई सर्वेक्षण कर जाना जमीनी हाल | गोमती के जलसैलाब से फैजुल्लागंज को स्थायी राहत की राह खुली, IIM रोड से हार्डिंग ब्रिज तक बनेगा बांध | वॉलीबॉल खेल रहे युवक से मारपीट, फायरिंग का आरोप | एक साल पहले संसद में रवि किशन ने उठाया था कानून के दुरुपयोग का मुद्दा, फर्जी मुकदमों पर कड़ी कार्रवाई की सरकार से की थी मांग | U.S. Tightens Grip on COVID Relief Fraud as Enforcement Uncovers $245 Million in Intended Losses |
हाइलाइट न्यूज़
अयोध्या, काशी और मथुरा की इस भूमि ने सदियों से देश को दिखाई है राह : ज्योतिरादित्य सिंधिया • 🇮🇳 "भारत छोड़ो आंदोलन पर बोलने से पहले भाजपा अपने इतिहास को देखे": कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का तीखा हमला • अलीगंज हनुमान मंदिर: जेठ मंगल के अवसर पर नवीन धरोहरों से सुसज्जित-जेपी सिंह • अक्षत कलश शोभा यात्रा का राजधानी लखनऊ में हुआ भव्य स्वागत - जितेन्द्र प्रताप सिंह • जिलाधिकारी के नेतृत्व में संपूर्ण समाधान दिवस तहसील सदर में संपन्न • Kashi Tamil Sangamam:Governor and Chief Minister Yogi Adityanath welcome PM Modi • CM योगी ने गोरखनाथ मंदिर में 'जनता दर्शन' कार्यक्रम के दौरान 200 से अधिक समस्याएं सुनीं • BJP sweeps Congress-SP in UP Municipal Corporation, leads on 17 out of 17 seats • अयोध्या, काशी और मथुरा की इस भूमि ने सदियों से देश को दिखाई है राह : ज्योतिरादित्य सिंधिया • 🇮🇳 "भारत छोड़ो आंदोलन पर बोलने से पहले भाजपा अपने इतिहास को देखे": कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का तीखा हमला • अलीगंज हनुमान मंदिर: जेठ मंगल के अवसर पर नवीन धरोहरों से सुसज्जित-जेपी सिंह • अक्षत कलश शोभा यात्रा का राजधानी लखनऊ में हुआ भव्य स्वागत - जितेन्द्र प्रताप सिंह • जिलाधिकारी के नेतृत्व में संपूर्ण समाधान दिवस तहसील सदर में संपन्न • Kashi Tamil Sangamam:Governor and Chief Minister Yogi Adityanath welcome PM Modi • CM योगी ने गोरखनाथ मंदिर में 'जनता दर्शन' कार्यक्रम के दौरान 200 से अधिक समस्याएं सुनीं • BJP sweeps Congress-SP in UP Municipal Corporation, leads on 17 out of 17 seats •
ताज़ा खबर ब्रेकिंग हिन्दी

भागवत-शरणागति : पूर्णाहुति के उपरान्त दिव्य अनुग्रह की अनुभूति और कालतत्त्व का रहस्योद्घाटन

D

Dainik India News

• 11321 views
भागवत-शरणागति : पूर्णाहुति के उपरान्त दिव्य अनुग्रह की अनुभूति और कालतत्त्व का रहस्योद्घाटन
Article image
Article image
Article image

दैनिक इंडिया न्यूज़, नागौद (सतना, मध्यप्रदेश) की पुण्यभूमि पर सम्पन्न हुए माँ पीताम्बरा के महायज्ञ की पूर्णाहुति का वह अद्वितीय क्षण केवल एक अनुष्ठान की समाप्ति नहीं, अपितु एक दिव्य परिपूर्णता का उद्घोष था। जब यज्ञकुण्ड में अंतिम आहुति अर्पित की गई, तब वातावरण में व्याप्त वैदिक मन्त्रों की अनुगूँज मानो सूक्ष्म लोकों तक संप्रेषित होती प्रतीत हुई। अग्नि की प्रज्वलित ज्वालाएँ धीरे-धीरे शांत होती हुई भी अपने भीतर एक ऐसे रहस्य को संजोए थीं, जो साधारण दृष्टि से परे, किन्तु साधक के अन्तःकरण में स्पष्ट रूप से अनुभूत हो रहा था। यह वह क्षण था, जहाँ समापन के भीतर ही एक नूतन आरम्भ की संभावनाएँ ध्वनित हो रही थीं—एक ऐसा आरम्भ, जो बाह्य से अधिक आन्तरिक था।

Article image

पूर्णाहुति के उपरान्त, वेदान्त की प्रख्यात साधिका माँ पूर्ण प्रज्ञा ने अपने भक्तों एवं श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जिस दिव्य तत्त्व का उद्घाटन किया, वह केवल उपदेश नहीं, बल्कि अनुभव की पराकाष्ठा से उपजा हुआ सत्य था। उन्होंने कहा कि यज्ञ केवल अग्नि में अर्पित होने वाली सामग्री का विन्यास नहीं, बल्कि वह ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना का एक सूक्ष्म साधन है। जब यज्ञ पूर्ण होता है, तब वह केवल धूम और राख नहीं छोड़ता—वह साधक के भीतर एक ऐसी चेतनाग्नि प्रज्वलित कर जाता है, जो उसके समस्त विकारों, संशयों और सीमाओं को भस्म कर देती है। किन्तु क्या यह दहन ही यज्ञ का अंतिम फल है, या इसके पार भी कोई और गहन रहस्य निहित है?

इसी प्रश्न को गहनता प्रदान करते हुए माँ ने स्पष्ट किया कि यज्ञ के पूर्ण होने का वास्तविक अर्थ ‘अर्पण’ की पूर्णता में निहित है। जब तक साधक अपनी अहं-संरचना, अपने संचित कर्मों और अपने संकल्पों को पूर्णतः समर्पित नहीं करता, तब तक यज्ञ की प्रक्रिया अधूरी रहती है। पूर्णाहुति का तात्पर्य बाह्य सामग्री की समाप्ति नहीं, बल्कि उस आन्तरिक ‘कर्ता भाव’ के विलय से है, जो साधक को परमात्मा से पृथक्‌ होने का भ्रान्ति-बोध कराता है। जैसे ही यह ‘कर्ता’ विलीन होता है, वैसे ही यज्ञ अपने वास्तविक फल को प्रकट करता है—एक ऐसी शांति, जो शब्दातीत है, और एक ऐसा आनन्द, जो किसी कारण पर आश्रित नहीं।

माँ पूर्ण प्रज्ञा ने आगे कहा कि यज्ञ भगवान को प्रसन्न करने का माध्यम अवश्य है, किन्तु यह प्रसन्नता किसी बाह्य कृपा के रूप में नहीं, बल्कि साधक के अन्तःकरण में जाग्रत होने वाली निर्मलता के रूप में प्रकट होती है। जब हृदय शुद्ध होता है, तब वही शुद्धता ईश्वर की कृपा का दर्पण बन जाती है। इस प्रकार, यज्ञ का फल किसी दूरस्थ लोक में नहीं, बल्कि यहीं, इसी क्षण, साधक के अन्तर्मन में प्रकट होता है। परन्तु क्या यह अनुभूति स्थायी हो सकती है, या यह केवल क्षणिक झलक बनकर रह जाती है? यही वह प्रश्न था, जिसने उपस्थित जनसमूह के भीतर एक नयी जिज्ञासा को जन्म दिया।

इस जिज्ञासा के समाधान में उन्होंने ‘कालतत्त्व’ की महिमा का ऐसा अद्भुत निरूपण किया, जिसने वेदान्त की गूढ़तम अवधारणाओं को भी सजीव कर दिया। उन्होंने कहा कि समय केवल घटनाओं का अनुक्रम नहीं, बल्कि चेतना की गति का प्रतीक है। यज्ञ की पूर्णाहुति एक विशिष्ट कालखण्ड में सम्पन्न होती है, और उसी काल का प्रभाव साधक के जीवन में सूक्ष्म परिवर्तन के रूप में प्रकट होता है। यदि साधक उस काल की महिमा को समझकर अपने जीवन को संयोजित करे, तो वही क्षण उसके लिए आत्मोन्नति का द्वार बन सकता है; अन्यथा वह क्षण भी अन्य क्षणों की भाँति व्यर्थ व्यतीत हो जाता है।

उन्होंने अत्यन्त सूक्ष्मता से यह भी स्पष्ट किया कि वेदान्त के दृष्टिकोण से समय न तो स्थिर है, न ही पूर्णतः गतिशील—वह साक्षी है। जो साधक इस साक्षीभाव को आत्मसात कर लेता है, उसके लिए भूत, वर्तमान और भविष्य का भेद स्वतः समाप्त हो जाता है। यज्ञ की पूर्णाहुति इसी साक्षीभाव का प्रतीक है—जहाँ साधक अपने समस्त कर्मों के फल से परे, केवल साक्षी रूप में स्थित हो जाता है। किन्तु इस अवस्था तक पहुँचना सरल नहीं; यह निरंतर जागरूकता, साधना और समर्पण की माँग करता है।

प्रवचन के उत्तरार्ध में माँ पूर्ण प्रज्ञा ने अत्यन्त मार्मिक शब्दों में कहा कि यज्ञ की वास्तविक पूर्णता तब होती है, जब साधक अपने जीवन को ही यज्ञ बना ले। प्रत्येक श्वास, प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म यदि समर्पण की भावना से सम्पन्न हो, तो वही जीवन ‘नित्य यज्ञ’ बन जाता है। तब किसी विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि साधक का सम्पूर्ण अस्तित्व ही आहुति का माध्यम बन जाता है। यही वह अवस्था है, जहाँ साधना और जीवन का भेद समाप्त हो जाता है, और प्रत्येक क्षण ईश्वर की उपस्थिति का साक्षात्कार कराता है।

अन्ततः, इस महायज्ञ की पूर्णाहुति केवल एक आध्यात्मिक आयोजन का समापन नहीं, बल्कि एक ऐसी आन्तरिक यात्रा का आरम्भ सिद्ध हुई, जिसमें प्रत्येक श्रद्धालु को अपने भीतर झाँकने, अपने अस्तित्व को समझने और अपने जीवन को एक उच्चतर उद्देश्य के साथ जोड़ने की प्रेरणा प्राप्त हुई। माँ पूर्ण प्रज्ञा के वचनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यज्ञ की ज्वालाएँ भले ही शांत हो जाएँ, किन्तु उनका प्रकाश साधक के मार्ग को अनन्त काल तक आलोकित करता रहता है—और यही उस पूर्णाहुति का परम, अक्षय और दिव्य प्रसाद है। इसी पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने भावपूर्ण शब्दों में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि उन्हें माँ के श्रीचरणों में उपस्थित होकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला, जो उनके जीवन की अमूल्य आध्यात्मिक निधि बनकर सदैव उनका मार्गदर्शन करता रहेगा।

टिप्पणियाँ

अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहले टिप्पणी करें!