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*भारत के भाग्य का 'धर्मयुद्ध': जब प्रधानसेवक ने देशवासियों से मांग लिए उनके 365 दिन**

​"महाशक्ति बनने की 'अग्निपरीक्षा': मोदी ने बताया 365 दिन का फॉर्मूला—तेल बचाओ, सोना त्यागो और भारत में ही ब्याह रचाओ!"

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Dainik India News

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*भारत के भाग्य का 'धर्मयुद्ध': जब प्रधानसेवक ने देशवासियों से मांग लिए उनके 365 दिन**



दैनिक इंडिया न्यूज़*हैदराबाद:** रविवार की उस शाम जब हैदराबाद की हवाओं में एक अजीब सी खामोशी तैर रही थी, मंच पर खड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर एक ऐसी गंभीरता थी जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले ही महसूस की जा सकती है। उन्होंने जब बोलना शुरू किया, तो उनके शब्दों में चुनावी रैलियों वाला उत्साह नहीं, बल्कि एक सेनापति जैसी दृढ़ता थी। बिना किसी भूमिका के उन्होंने सीधे 140 करोड़ भारतीयों की सुख-सुविधाओं पर एक ऐसा प्रहार किया, जिसकी उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी। उन्होंने साफ लहजे में कह दिया कि यदि भारत को महाशक्ति की कतार में खड़ा होना है, तो आने वाले 365 दिन हर नागरिक को एक 'आर्थिक सैनिक' की तरह जीने होंगे। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक प्रधानमंत्री को अपनी ही जनता से उनकी खुशियों पर लगाम लगाने की मांग करनी पड़ी?

इस सस्पेंस से पर्दा उठाते हुए उन्होंने वैश्विक मानचित्र पर मँडरा रहे युद्ध के उन काले बादलों की ओर इशारा किया, जो सात समंदर पार होने के बावजूद हमारी रसोई तक पहुँच चुके हैं। उन्होंने एक नया शब्द उछाला—'आर्थिक राष्ट्रवाद'। उन्होंने कड़े स्वर में कहा कि आज के दौर में देशभक्ति केवल सीमा पर खड़े होकर गोली खाने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी विलासिता को देश के लिए कुर्बान करना सबसे बड़ी राष्ट्र सेवा है।

उन्होंने पहली मांग सीधे भारतीय परिवारों की तिजोरी से जुड़ी रखी। उन्होंने अक्षश: कहा कि आने वाले एक साल तक "सोने (Gold) की खरीद पर पूर्ण विराम लगा दें"। भारत द्वारा विदेशों से मंगाया जाने वाला टन भर सोना हमारी मुद्रा को कमजोर कर रहा है। उन्होंने जनता की आँखों में आँखें डालकर पूछा कि क्या हम अपनी शान-शौकत के लिए देश के विदेशी मुद्रा भंडार को लुटते हुए देखते रहेंगे?

पर यह तो केवल शुरुआत थी।

संबोधन का अगला हिस्सा उन लोगों के लिए किसी झटके से कम नहीं था जो अपनी शादियों और छुट्टियों के लिए विदेशी धरती के सपने संजो रहे थे। पीएम मोदी ने 'डेस्टिनेशन वेडिंग' के बढ़ते फैशन को आड़े हाथों लेते हुए इसे देश की संपत्ति का पलायन बताया। उन्होंने दो टूक कहा कि जब तक हमारी माटी में देवत्व और सुंदरता मौजूद है, तब तक सात समंदर पार जाकर करोड़ों रुपये बहाना 'आर्थिक अपराध' से कम नहीं है। उन्होंने "Wed in India" का मंत्र फूँकते हुए आह्वान किया कि अगले एक साल तक कोई भी भारतीय विदेश में विवाह न करे और न ही सैर-सपाटे के लिए अपनी मेहनत की कमाई विदेशी होटलों में लुटाए। यह सुनकर सभा में मौजूद लोगों के बीच फुसफुसाहट शुरू हो गई, लेकिन असली 'कड़वी दवा' तो अभी बाकी थी।

प्रधानमंत्री ने उस रग पर हाथ रखा, जो हर आम और खास आदमी की जिंदगी से जुड़ी है—'तेल'। उन्होंने डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का रोना रोने के बजाय जनता से ही बलिदान मांग लिया। उन्होंने कहा कि तेल की एक-एक बूंद बाहर से आती है और बदले में हमारा खून-पसीने का पैसा बाहर ले जाती है। उन्होंने अपील की कि जितना संभव हो "डीजल-पेट्रोल की खपत कम करें", कार-पूलिंग करें, साइकिल चलाएं या फिर पुराने वर्क-फ्रॉम-होम कल्चर को वापस लाएं। उन्होंने रसोई के बजट पर भी हमला करते हुए खाद्य तेल में 10% की कटौती की मांग कर डाली।

खबर की गंभीरता और भविष्य की अनिश्चितता को शब्दों में पिरोते हुए प्रधानमंत्री ने अंत में एक कड़ी चेतावनी भी दी। उन्होंने स्वीकार किया कि आने वाला समय "बड़ी चुनौतियों और कठोर परीक्षाओं" का हो सकता है, जहाँ देश की आर्थिक सीमाओं को घेरा जाएगा। उन्होंने स्पष्ट लहजे में हर भारतीय को आगाह किया कि घबराहट में आकर किसी भी सामान की 'डंपिंग' (जमाखोरी) न करें। पीएम ने चेताया कि पैनिक बाइंग और अनावश्यक भंडारण बाजार में कृत्रिम अभाव पैदा करेंगे, जो देश को खुद-ब-खुद एक 'इमरजेंसी' (आपातकाल) जैसी स्थिति की ओर धकेल देगा। उन्होंने आह्वान किया कि संयम बरतें और अराजकता न फैलने दें, क्योंकि इस आर्थिक धर्मयुद्ध में अनुशासन ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है। फैसला अब हर उस नागरिक के हाथ में है जो इस खबर को पढ़कर अपने कल की रणनीति बनाने वाला है।

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