फरियादी, ठेकेदार और जनप्रतिनिधियों की मुलाकात से पहले कथित ‘छंटनी’ का आरोप; पदस्थापन, स्थानांतरण और मीडिया प्रबंधन को लेकर भी सवाल—मामले में संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना शेष
दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के मुख्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि प्रबंध निदेशक से मिलने आने वाले फरियादी, ठेकेदार, जनप्रतिनिधि अथवा अन्य आगंतुकों को सीधे उनसे मिलने के बजाय पहले एक शिविर सहायक के माध्यम से गुजरना पड़ता है। दावा किया जा रहा है कि आगंतुक का परिचय, आने का उद्देश्य और समस्या पहले वहां दर्ज होती है और इसके बाद ही यह तय होता है कि उसे प्रबंध निदेशक तक पहुंचाया जाएगा या नहीं। यदि ये आरोप सही हैं तो सवाल महज एक कार्यालयी व्यवस्था का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक पारदर्शिता का है जिसके तहत किसी वरिष्ठ अधिकारी से मिलने की प्रक्रिया निर्धारित होनी चाहिए।
बताया जाता है कि मुख्यालय में कोई व्यक्ति प्रबंध निदेशक से मिलने के लिए पहुंचता है तो प्रवेश स्तर पर उसका कार्ड अथवा मिलने का उद्देश्य पूछा जाता है। इसके बाद संबंधित चपरासी कथित तौर पर शिविर सहायक रामराज को इसकी जानकारी देता है और आगंतुक को उनके कार्यालय भेज दिया जाता है। आरोप है कि वहां आगंतुक से उसकी समस्या पूछी जाती है और कई मामलों में यह कहा जाता है—“लाइए, यह काम मैं करा देता हूं।” यही वह बिंदु है जहां व्यवस्था को लेकर सबसे गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि यदि किसी व्यक्ति की मुलाकात प्रबंध निदेशक से निर्धारित है तो उसके विषय का प्रारंभिक परीक्षण किसी अन्य कर्मचारी के स्तर पर क्यों हो रहा है?
मुख्यालय में लंबे समय से पदस्थापन को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं होने का दावा किया जा रहा है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि वर्षों से एक ही स्थान पर बने रहने के कारण संबंधित कर्मचारी ने कार्यालयी व्यवस्था में प्रभावशाली पकड़ बना ली है। कुछ लोग तो यहां तक आरोप लगा रहे हैं कि सुविधा शुल्क से जुड़े मामलों में काम अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ने की चर्चा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित कर्मचारी का पक्ष भी सामने नहीं आया है। ऐसे में आवश्यक है कि यदि इस प्रकार की शिकायतें अधिकारियों के संज्ञान में हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच कराई जाए।
पद और दायित्व को लेकर भी सवाल
मामला केवल मुलाकात की कथित व्यवस्था तक सीमित नहीं है। आरोप है कि प्रबंध निदेशक कार्यालय में आशुलिपिक/शिविर सहायक के पदस्थापन को लेकर भी नियमों और संवर्ग व्यवस्था पर प्रश्न उठते रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि प्रबंध निदेशक कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर वरिष्ठ स्तर के अनुभवी कर्मचारी की आवश्यकता होती है, जबकि यहां खंड संवर्ग से जुड़े अपेक्षाकृत निम्न स्तर के पद पर नियुक्त कर्मचारी को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे जाने की स्थिति बनी हुई है।
इन आरोपों के साथ तत्कालीन प्रबंध निदेशक ए.पी. मिश्रा के कार्यकाल के दौरान उनके ओएसडी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि उपलब्ध सामग्री में इस संबंध में किसी आधिकारिक जांच अथवा सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष का उल्लेख नहीं है। इसलिए नियुक्ति अथवा पदस्थापन को सीधे “अवैध” घोषित करने के बजाय संबंधित सेवा नियमों, संवर्ग व्यवस्था और नियुक्ति आदेशों की जांच ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
अनुकम्पा नियुक्ति के बाद पीआरओ पद पर बने रहने का दावा
मुख्यालय में एक अन्य कर्मचारी के लंबे समय से एक ही स्थान पर बने रहने को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। आरोप है कि स्वर्गीय जगपाल सिंह यादव, जो अधिशासी अभियंता पद पर कार्यरत थे, की मृत्यु के बाद उनकी पुत्री को अनुकम्पा के आधार पर नियुक्ति मिली और बाद में वह प्रबंध निदेशक कार्यालय में जनसंपर्क अधिकारी के रूप में कार्य करती रहीं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि स्थानांतरण संबंधी अधिकार और प्रक्रिया विभागीय नियमों में स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं, लेकिन व्यवहार में इन प्रावधानों का पालन किस स्तर तक हो रहा है, यह जांच का विषय है। विशेष रूप से तब, जब किसी कर्मचारी के लंबे समय तक एक ही महत्वपूर्ण पद पर बने रहने को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हों।
पत्रकारों की पहुंच पर भी उठी उंगली
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू मीडिया प्रबंधन से भी जुड़ा है। आरोप है कि ऐसे पत्रकारों को पत्रकार वार्ताओं और विभागीय संवाद कार्यक्रमों से दूर रखा जाता है जो असुविधाजनक अथवा तीखे सवाल पूछ सकते हैं, जबकि अनुकूल रुख रखने वाले पत्रकारों को प्राथमिकता दी जाती है। यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ पत्रकारों को वरिष्ठ अधिकारियों के आधिकारिक व्हाट्सऐप समूहों अथवा व्यक्तिगत संपर्क माध्यमों पर ब्लॉक कराया गया।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यदि किसी सरकारी उपक्रम में मीडिया से संवाद का चयन सवालों की प्रकृति के आधार पर किया जाता है तो यह पारदर्शिता और सूचना के समान अवसर के सिद्धांत पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर सकता है। दूसरी ओर, विभाग का पक्ष सामने आने पर यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि पत्रकारों के चयन अथवा संपर्क व्यवस्था के पीछे कोई प्रशासनिक कारण था या नहीं।
स्थानांतरण नीति पर भी सवाल
शिकायतों में स्थानांतरण व्यवस्था का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। आरोप है कि कुछ अधिकारियों अथवा कर्मचारियों के स्थानांतरण की स्थिति आने पर उन्हें विभागीय नियमों की ऐसी व्याख्या बताई जाती है जिससे प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। दावा यह भी है कि स्थानांतरण के निर्णय पर पूर्व पदाधिकारियों अथवा प्रभावशाली लोगों के माध्यम से दबाव बनवाया जाता है।
यदि ऐसा हो रहा है तो यह केवल किसी एक कर्मचारी की सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि संपूर्ण स्थानांतरण नीति की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है। विद्युत वितरण निगम जैसे बड़े सार्वजनिक उपक्रम में पदस्थापन और स्थानांतरण की स्पष्ट, लिखित तथा समान रूप से लागू प्रक्रिया ही प्रशासनिक निष्पक्षता की आधारशिला हो सकती है।
अब सवाल जांच का है
मध्यांचल विद्युत वितरण निगम मुख्यालय को लेकर लगाए गए इन आरोपों में कई बिंदु ऐसे हैं जिन्हें दस्तावेजों और विभागीय नियमों के आधार पर आसानी से सत्यापित किया जा सकता है—किस कर्मचारी की मूल नियुक्ति किस संवर्ग में हुई, वर्तमान पदस्थापन किस आदेश के तहत है, लंबे समय तक एक ही स्थान पर बने रहने के पीछे क्या प्रशासनिक आधार है, स्थानांतरण नीति क्या कहती है और प्रबंध निदेशक से मिलने की आधिकारिक प्रक्रिया क्या निर्धारित है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी सरकारी उपक्रम में वरिष्ठ अधिकारी से मिलने वाले व्यक्ति की प्राथमिक जानकारी किसी ऐसे कर्मचारी के माध्यम से गुजरना अनिवार्य होना चाहिए, जिसके पास निर्णय लेने का औपचारिक अधिकार नहीं है? यदि यह केवल कार्यालयी सुविधा है तो उसकी लिखित प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए और यदि ऐसी कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं है तो उसकी समीक्षा आवश्यक है।
इन आरोपों के संबंध में मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के संबंधित अधिकारियों, प्रबंध निदेशक कार्यालय तथा आरोपित कर्मचारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हो सकी है। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना आवश्यक होगा। फिलहाल सामने आए आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच ही यह तय कर सकती है कि मुख्यालय में वास्तव में कोई समानांतर व्यवस्था चल रही है या फिर यह शिकायतें कार्यालयी असंतोष और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हैं।