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जगन्नाथ रथयात्रा: केवल उत्सव नहीं, सनातन संस्कृति के विश्वकल्याण संकल्प का दिव्य उद्घोष

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जगन्नाथ रथयात्रा: केवल उत्सव नहीं, सनातन संस्कृति के विश्वकल्याण संकल्प का दिव्य उद्घोष
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राष्ट्रमंगल की कामना के साथ रथयात्रा में सम्मिलित हुए राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह

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दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।राजधानी लखनऊ एक बार पुनः भगवान श्रीजगन्नाथ की दिव्य रथयात्रा के आध्यात्मिक आलोक से आलोकित हो उठी। प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी श्री राधारमण इस्कॉन मंदिर के तत्वावधान में आयोजित भव्य रथयात्रा श्रद्धा, भक्ति और सनातन संस्कृति के विराट वैभव का अनुपम उत्सव बन गई। इस्कॉन लखनऊ के प्रमुख अपरिमेय श्याम दास के सान्निध्य में प्रारम्भ हुई इस दिव्य यात्रा में हजारों श्रद्धालुओं ने "हरे कृष्ण" महामंत्र के संकीर्तन के साथ भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र एवं माता सुभद्रा के श्रीचरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित कर राष्ट्र एवं विश्वकल्याण की मंगलकामना की।

जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता के उस सार्वभौम दर्शन की जीवंत अभिव्यक्ति है, जिसमें ईश्वर स्वयं भक्तों के बीच आकर समता, करुणा, सेवा और लोकमंगल का संदेश देते हैं। मान्यता है कि भगवान के रथ का दर्शन, स्पर्श अथवा उसके साथ कुछ कदम चलना भी आध्यात्मिक पुण्य और अंतःकरण की निर्मलता का माध्यम बनता है। यही कारण है कि यह महोत्सव युगों से सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक माना जाता रहा है।

इसी आध्यात्मिक महापर्व में हिंदू समाज की अस्मिता के प्रखर स्वर तथा राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह श्रद्धापूर्वक रथयात्रा में सम्मिलित हुए। उनके आगमन की सूचना मिलते ही इस्कॉन प्रमुख अपरिमेय श्याम दास के मुखमंडल पर सहज प्रसन्नता और आत्मीय हर्ष स्पष्ट झलक उठा। उन्होंने स्नेहपूर्वक माल्यार्पण कर जितेंद्र प्रताप सिंह का अभिनंदन किया तथा सनातन परंपरा के अनुरूप उनका आत्मीय स्वागत किया। यह दृश्य केवल दो व्यक्तित्वों का मिलन नहीं, बल्कि सनातन चेतना, सेवा और राष्ट्रनिष्ठा के साझा संकल्प का भावपूर्ण संगम बन गया।

रथयात्रा के दौरान जितेंद्र प्रताप सिंह ने भगवान श्रीजगन्नाथ की विधिवत पूजा-अर्चना कर भारत की अखंडता, राष्ट्र की सुरक्षा, विश्वशांति तथा समस्त मानवता के कल्याण की प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीजगन्नाथ संपूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता हैं और उनकी रथयात्रा यह संदेश देती है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप विभाजन नहीं, बल्कि समन्वय, करुणा, आत्मानुशासन और लोककल्याण है। जब समाज अपनी सनातन जड़ों से जुड़ता है, तभी राष्ट्र सांस्कृतिक वैभव, आध्यात्मिक शक्ति और नैतिक नेतृत्व के सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित होता है।

श्रद्धा, भक्ति और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत यह दिव्य रथयात्रा एक बार फिर उद्घोषित कर गई कि सनातन संस्कृति का वास्तविक स्वरूप "सर्वे भवन्तु सुखिनः", "वसुधैव कुटुम्बकम्" और विश्वकल्याण की अखंड साधना में निहित है। भगवान श्रीजगन्नाथ का रथ आगे बढ़ता रहा और उसके साथ आगे बढ़ता रहा करोड़ों श्रद्धालुओं का यह अटूट विश्वास कि जब तक सनातन संस्कृति की यह चेतना जीवित है, तब तक भारत की आध्यात्मिक ज्योति सम्पूर्ण विश्व का पथ आलोकित करती रहेगी।

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