संस्कृत सप्ताह पर संस्कृत भारती के प्रमोद पंडित का सभ्यतागत प्रश्न—जिस भाषा में भारत ने ऋत से ब्रह्म तक, गणित से खगोल तक और व्याकरण से दर्शन तक अपनी मेधा को अभिव्यक्ति दी, क्या उसे केवल ‘प्राचीन भाषा’ मानकर छोड़ देना अपनी ही ज्ञान-स्मृति से विमुख होना नहीं है?
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।किसी राष्ट्र की सबसे गहरी पहचान उसकी सीमाओं में नहीं, उसकी सामूहिक स्मृति, ज्ञान-परंपरा और जीवन-दृष्टि में सुरक्षित रहती है। राजसत्ताएं आती-जाती हैं, राजनीतिक मानचित्र बदलते हैं, समय की धूल अनेक घटनाओं को ढक देती है, किंतु जो सभ्यता अपनी ज्ञान-स्मृति को अक्षुण्ण रखती है, उसकी चेतना की धारा अवरुद्ध नहीं होती। भारत के संदर्भ में इस ज्ञान-स्मृति का एक विराट अध्याय संस्कृत में सन्निबद्ध है। संस्कृत सप्ताह के अवसर पर संस्कृत भारती के पूर्वी उत्तर प्रदेश संगठन मंत्री प्रमोद पंडित ने मीडिया के समक्ष इसी प्रश्न को केंद्र में रखा कि जिस भाषा में भारतीय मनीषा ने जीवन और जगत, आत्मा और परमात्मा, प्रकृति और पुरुष, राज्य और समाज, चिकित्सा और गणित, व्याकरण और काव्य तक पर सहस्राब्दियों तक चिंतन किया, क्या उस भाषा को केवल अतीत की धरोहर मानकर वर्तमान से विस्थापित कर देना उचित है?
उनका कहना है कि संस्कृत दिवस को केवल औपचारिक आयोजन, श्लोक-पाठ या एक सप्ताह की सांस्कृतिक गतिविधि तक सीमित कर देना उसके मूल प्रयोजन को छोटा कर देगा। यह अवसर भारत को अपनी ही बौद्धिक यात्रा की ओर पुनः देखने का होना चाहिए। प्रश्न संस्कृत को केवल बचाने का नहीं है; प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी उस ज्ञान-परंपरा का पुनः उत्तराधिकारी बनना चाहता है, जिसे समय ने नष्ट नहीं किया, किंतु उपेक्षा ने उससे दूर अवश्य कर दिया?
इस प्रश्न का उत्तर पाने से पहले भारत की अस्मिता को समझना आवश्यक है। भारत को केवल पश्चिमी विकास-प्रतिमानों से देखने की प्रवृत्ति ने उसकी सभ्यतागत विशिष्टता को कई बार धुंधला किया है। यहां जीवन का प्रयोजन केवल भौतिक समृद्धि नहीं माना गया। मनुष्य की बाह्य उन्नति के साथ उसके अंतःकरण का परिष्कार, कर्तव्य का बोध, आत्मसंयम, साधना और मोक्ष की आकांक्षा भी जीवन-दृष्टि का हिस्सा रहे। भारतीय मनीषा ने अभ्युदय और निःश्रेयस को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि जीवन की दो पूरक दिशाओं के रूप में देखा।
यहीं भारतीय शब्दावली की वह सूक्ष्मता सामने आती है, जिसे केवल विदेशी शब्दों के सहारे पूरी तरह ग्रहण करना कठिन है। ‘ज्ञान’ को मात्र ज्ञात वस्तुओं के संचय के अर्थ में और ‘धर्म’ को केवल किसी मत या उपासना-पद्धति के अर्थ में ग्रहण कर लेना भारतीय अवधारणाओं का अर्थ-संकोच है। भारतीय परंपरा में ज्ञान की यात्रा दृश्य से अदृश्य, नश्वर से शाश्वत और अविद्या से विद्या की ओर मानी गई। इसी मर्म को उपनिषद् का वाक्य—“सा विद्या या विमुक्तये”—अत्यंत संक्षेप में उद्घाटित करता है। अर्थात वही विद्या है जो विमुक्ति का मार्ग प्रशस्त करे।
इस दृष्टि में शिक्षा केवल जीविकोपार्जन की पात्रता अर्जित करने का साधन नहीं थी। वह मनुष्य को स्वयं से परिचित कराने, विवेक जाग्रत करने और जीवन के अंतिम प्रयोजन पर विचार करने की प्रक्रिया भी थी। यही कारण है कि संस्कृत को समझे बिना भारतीय ज्ञानमीमांसा के अनेक मूल सूत्रों तक पहुंचना कठिन हो जाता है। संस्कृत में शब्द केवल ध्वनियों का समूह नहीं; अनेक शब्दों के भीतर दर्शन, संस्कृति, संबंध और जीवनानुभव की दीर्घ परंपरा समाहित है।
भारत की इसी ज्ञान-दृष्टि ने उसकी सीमाओं से बाहर के जिज्ञासुओं को भी आकर्षित किया। फ्रांस से श्री मां मीरा अल्फासा का पुदुचेरी आना और इंग्लैंड से मार्गरेट नोबल का निवेदिता के रूप में भारत पहुंचना ऐसे प्रसंग हैं, जिनसे भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के वैश्विक आकर्षण का संकेत मिलता है। प्रयाग के महाकुंभ में भारत से बाहर के साधकों को अखाड़ों द्वारा महामंडलेश्वर की उपाधि दिए जाने के प्रसंग भी इसी व्यापक आध्यात्मिक आकर्षण की ओर संकेत करते हैं। किंतु इस आकर्षण के पीछे केवल श्रद्धा नहीं थी; भारत के शास्त्रों और साधना-पद्धतियों को जानने की जिज्ञासा भी थी। और यहीं से संस्कृत का प्रश्न फिर सामने आता है।
वेद, उपनिषद्, दर्शन, व्याकरण, स्मृति, पुराण, काव्य और असंख्य शास्त्रीय ग्रंथों का विपुल संसार संस्कृत में निबद्ध है। अनुवाद किसी ग्रंथ का आशय सामने ला सकता है, किंतु मूल भाषा शब्द के भीतर निहित अर्थच्छटा, ध्वनि, व्युत्पत्ति और संदर्भगत गहराई को समझने का अलग अवसर देती है। इसलिए संस्कृत से दूरी केवल एक भाषा से दूरी नहीं है; यह उन मूल स्रोतों से दूरी भी है, जिनसे भारतीय सभ्यता ने अपने प्रश्न पूछे और अपने उत्तर खोजे।
संस्कृत की चर्चा को केवल आध्यात्मिक ग्रंथों तक सीमित करना भी इसी कारण अधूरा दृष्टिकोण है। भारतीय परंपरा में संस्कृत में निबद्ध साहित्य का विस्तार जीवन के लगभग प्रत्येक प्रमुख क्षेत्र तक दिखाई देता है। कृषि, वाणिज्य, अर्थ, राज्य-व्यवस्था, विधि, वस्त्र, सौंदर्य-प्रसाधन, गंध, वर्ण, शस्त्र, नौका, रथ, मार्ग, सेतु और स्थापत्य से लेकर धातु, रसायन, खनन, भौतिक विज्ञान, वनस्पति, यंत्र, खगोल, गणित और चिकित्सा तक विविध विषयों पर शास्त्रीय विमर्श हुआ।
ज्ञान की यह परिधि यहीं समाप्त नहीं होती। वृक्षचिकित्सा, भाषा, काव्य और व्याकरण के साथ युद्धकला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्य, संगीत, नाट्य, वाद्य, पुष्परचना, पाककला, अश्वकला, गजपालन, शस्त्र संचालन, वस्त्र-निर्माण, पशुपालन, गुप्त भाषा, द्यूतक्रीड़ा, आभूषण और खिलौना निर्माण, मल्लविद्या, व्यायाम, लेखन, सुतारकर्म, लौहकर्म, चर्मकर्म, कुंभकारी, केशकर्तन और रत्नपरीक्षा जैसी अनेक कलाओं और कौशलों से संबंधित परंपराएं भी विकसित हुईं। इससे भारतीय ज्ञान-व्यवस्था का वह स्वरूप सामने आता है जिसमें अध्यात्म और व्यवहार, शास्त्र और शिल्प, चिंतन और कौशल एक-दूसरे से पृथक खंड नहीं थे।
तो फिर वह परंपरा आधुनिक भारत की चेतना में इतनी क्षीण क्यों दिखाई देती है? इस प्रश्न का एक उत्तर औपनिवेशिक काल के उस व्यापक परिवर्तन में मिलता है, जिसने भारतीय शिक्षा की दिशा और ज्ञान के मानदंडों को प्रभावित किया। पारंपरिक भारतीय शिक्षा-पद्धतियों और स्वदेशी ज्ञान-विधाओं का महत्व क्रमशः कम हुआ तथा पश्चिमी पाठ्यक्रम और ज्ञान-प्रतिमान शिक्षा के केंद्र में आते गए। इसके परिणामस्वरूप केवल पुस्तकों का पाठ्यक्रम नहीं बदला; समाज की दृष्टि भी बदलने लगी।
धीरे-धीरे अपनी ज्ञान-परंपरा को आधुनिकता से पृथक देखने की प्रवृत्ति बढ़ी। संस्कृत जैसी शास्त्रीय भाषा को जीवंत ज्ञान-स्रोत के बजाय अतीत की वस्तु समझे जाने लगा। परंपरागत शास्त्रों और कलाओं से दूरी बढ़ी और अपनी ही बौद्धिक विरासत के प्रति एक प्रकार की संकोचग्रस्त मानसिकता विकसित हुई। परिणाम यह हुआ कि जिस समाज के पूर्वजों ने ज्ञान के विविध क्षेत्रों पर स्वतंत्र चिंतन किया था, उसकी नई पीढ़ियों का एक बड़ा हिस्सा उन्हीं स्रोतों से अपरिचित होता गया।
यही वह बिंदु है जहां संस्कृत का प्रश्न शिक्षा के प्रश्न में परिवर्तित हो जाता है। आत्मनिर्भरता यदि केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित है तो उसका अर्थ अधूरा है। आर्थिक स्वावलंबन आवश्यक है, किंतु ज्ञान में पराश्रय रहते हुए पूर्ण आत्मनिर्भरता की कल्पना कठिन है। इसका अर्थ आधुनिक विज्ञान, तकनीक अथवा अन्य भाषाओं का त्याग नहीं है। इसका अर्थ इतना भर है कि भारत दूसरों से ज्ञान ग्रहण करते हुए अपने ज्ञान-स्रोतों को विस्मृत न करे। अनुकरण और अधिगम में वही अंतर है जो आत्मविस्मृति और आत्मबोध में है।
संस्कृत का अध्ययन भारतीय भाषाओं की समृद्धि को समझने में भी सहायक हो सकता है। हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं की शब्द-संपदा में संस्कृत का गहरा प्रभाव है। ‘किताब’ के स्थान पर ‘पुस्तक’, ‘जमीन’ के स्थान पर ‘भूमि’ तथा ‘काम शुरू किया’ के स्थान पर ‘कार्य प्रारंभ किया’ जैसे उदाहरण बताते हैं कि शब्द-चयन केवल भाषिक अलंकरण नहीं, अर्थ की सूक्ष्मता और अभिव्यक्ति की परिष्कृति का विषय भी है।
भारतीय भाषाओं के अंतर्संबंध को समझने में भी संस्कृत की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। ‘जन-गण-मन’ बांग्ला में रचित है, फिर भी उसकी संस्कृतनिष्ठ शब्द-संपदा के कारण अन्य भारतीय भाषाभाषियों के लिए उसके अनेक पद सहज बोधगम्य हो जाते हैं। यह केवल भाषिक साम्य का उदाहरण नहीं; यह भारतीय भाषाओं के उस सांस्कृतिक सेतु का संकेत है जिसकी आधारभूमि में संस्कृत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
संस्कृत का व्याकरण इस विमर्श को और गहरा करता है। पाणिनीय परंपरा में भाषा को जिस सूक्ष्मता, अनुशासन और विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखा गया, वह भारतीय भाषिक मनीषा की विलक्षण उपलब्धियों में गिनी जाती है। वर्णों के उच्चारण-स्थान से लेकर शब्द-रचना और रूप-विन्यास तक सूक्ष्म विवेचन यह बताता है कि भारतीय परंपरा में वाणी भी गंभीर अनुशीलन का विषय थी। ‘श’, ‘ष’ और ‘स’ जैसे वर्णों का भेद केवल उच्चारण का अभ्यास नहीं; वह ध्वनि के प्रति उस सूक्ष्म सजगता का परिचायक है जिसमें भाषा को लगभग शास्त्रीय अनुशासन का स्वरूप प्राप्त होता है।
शब्दों की अर्थवत्ता संस्कृत की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ‘भार्या’, ‘पत्नी’ और ‘दारा’ जैसे शब्द संबंध के अलग-अलग अर्थ-संदर्भों को वहन करते हैं। इसी प्रकार ‘स्वाध्याय’, ‘स्वावलंबन’, ‘आत्मबोध’, ‘परिष्कार’ और ‘प्रयोजन’ जैसे शब्द केवल शब्द नहीं, भारतीय चिंतन की विशिष्ट अवधारणाओं के संवाहक हैं। भाषा जितनी अधिक अर्थ-संपन्न होती है, विचार की अभिव्यक्ति उतनी ही सूक्ष्म और बहुआयामी हो सकती है।
संस्कृत का संबंध उन स्तोत्रों, मंत्रों और शास्त्रीय पाठों से भी है जो आज तक भारतीय परिवारों और धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन में उच्चरित होते हैं। महामृत्युंजय मंत्र जैसे मंत्रों को मूल रूप में समझने की क्षमता अनुवाद पर निर्भरता कम करती है और शब्द, व्याकरण, संदर्भ तथा भावार्थ को निकटता से ग्रहण करने का अवसर देती है। इस दृष्टि से संस्कृत सीखना केवल परंपरा का निर्वाह नहीं, अपनी सांस्कृतिक स्मृति को मूल स्रोतों से पढ़ने की क्षमता अर्जित करना भी है।
समकालीन सार्वजनिक जीवन में संस्कृत की उपस्थिति के कुछ संकेत भी दिखाई देते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न अवसरों पर अपने वक्तव्यों में संस्कृत के श्लोकों और सूक्तियों का उल्लेख किया है। अनेक सार्वजनिक स्थलों और संस्थानों में अन्य भाषाओं के साथ संस्कृत का प्रयोग भी देखने को मिलता है। वर्ष 2022 में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री निवास पर संस्कृत सप्ताह के समापन कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा संस्कृत में संस्कृत सप्ताह की शुभकामना संदेश का प्रसारण भी इस भाषा के सार्वजनिक प्रयोग की बढ़ती स्वीकार्यता का उदाहरण है।
फिर भी वास्तविक चुनौती राजकीय मंचों पर संस्कृत की उपस्थिति से कहीं बड़ी है। आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत विद्यालयों की सीमाओं से निकलकर परिवारों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और सामान्य जनजीवन की जिज्ञासा का हिस्सा बने। बौद्धिक और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका इसलिए निर्णायक हो जाती है। यदि संस्कृत के प्रति समाज में केवल उत्सवधर्मिता रहेगी और अध्ययन की प्रवृत्ति नहीं बनेगी तो सप्ताह समाप्त होते ही विमर्श भी समाप्त हो जाएगा। इसके विपरीत यदि सात दिन सात प्रश्नों को जन्म दें और वे प्रश्न सात वर्षों की अध्ययन-यात्रा में परिवर्तित हों, तभी संस्कृत सप्ताह अपने वास्तविक प्रयोजन को प्राप्त करेगा।
इसीलिए यह आग्रह किसी भाषा को दूसरी भाषा के विरुद्ध खड़ा करने का नहीं है। भारत बहुभाषी है और उसकी शक्ति उसकी भाषिक बहुलता में भी निहित है। संस्कृत का पुनर्पाठ उस बहुलता को संकुचित करने के लिए नहीं, उसकी ऐतिहासिक अंतर्धाराओं को समझने के लिए आवश्यक है। अपनी शास्त्रीय भाषा का अध्ययन करने वाला समाज अन्य भाषाओं से विमुख नहीं होता; वह अपनी बौद्धिक पहचान के प्रति अधिक सजग होकर विश्व से संवाद करता है।
भारत के पुनरुत्थान का प्रश्न भी यहीं आकर जुड़ता है। केवल दूसरों की उपलब्धियों की अनुकृति करके कोई सभ्यता दीर्घकालिक आत्मविश्वास अर्जित नहीं कर सकती। भारत को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ कदम मिलाते हुए यह भी देखना होगा कि उसके अपने ज्ञान-स्रोतों में क्या था, क्या बचा है और क्या पुनः अनुसंधान की प्रतीक्षा कर रहा है। स्वावलंबन का अगला चरण ज्ञान-स्वावलंबन हो सकता है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा का संघर्ष नहीं, दोनों का विवेकपूर्ण समन्वय हो।
इसी विश्वास के साथ संस्कृत सप्ताह को आत्मस्मृति के जागरण का अवसर बनाने का आह्वान किया गया है। भारतीय परंपरा भगीरथ के संकल्प को जानती है, भीष्म की प्रतिज्ञा को जानती है और असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्य के लिए दीर्घ साधना का अर्थ भी जानती है। इसलिए संस्कृत के पुनर्जागरण को लेकर निराशा का कोई कारण नहीं होना चाहिए। यदि समाज में जिज्ञासा जागे, अध्ययन की प्रवृत्ति बढ़े और शास्त्रों को मूल रूप में पढ़ने का साहस पैदा हो तो एक दिन का संस्कृत दिवस एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रारंभ बन सकता है।
अंततः प्रश्न संस्कृत के पक्ष या विपक्ष का नहीं, भारत की अपनी स्मृति के पक्ष या विस्मृति के पक्ष में खड़े होने का है। जिस भाषा में इस सभ्यता ने अपने गहनतम प्रश्नों को शब्द दिए, अपने अनुभवों को शास्त्र बनाया और अपने चिंतन को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा, उस भाषा को जानने का प्रयत्न अपने अतीत में लौटना नहीं, अपने वर्तमान को अधिक गहराई से समझना है।
संस्कृत को पढ़ना इसलिए केवल भाषा सीखना नहीं है। यह शब्द के पीछे छिपे विचार को पढ़ना है, शास्त्र के पीछे खड़ी मनीषा को पढ़ना है, परंपरा के भीतर प्रवहमान तर्क और अनुभव को पढ़ना है और अंततः उस भारत को पढ़ना है जिसकी स्मृति अभी भी उसके ग्रंथों में जीवित है।
संस्कृत दिवस तभी सार्थक होगा, जब वह कैलेंडर की एक तिथि बनकर न रह जाए, बल्कि भारत के भीतर एक प्रश्न छोड़ जाए—हम अपनी सभ्यता को दूसरों के शब्दों में कब तक पढ़ते रहेंगे, और अपने ही शब्दों में स्वयं को पढ़ना कब आरंभ करेंगे?
प्रमोद पंडित(पूर्वी उत्तर प्रदेश संगठन मंत्री, संस्कृत भारती)