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संस्कारों से सशक्त राष्ट्र: भारत की आत्मा का पुनर्जागरण

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संस्कारों से सशक्त राष्ट्र: भारत की आत्मा का पुनर्जागरण

राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, वह उन लोगों से बनता है जिनके भीतर राष्ट्र जीवित रहता है

दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली।समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज संसार विकास की गति को गगनचुंबी इमारतों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सैन्य शक्ति और आर्थिक सूचकांकों से माप रहा है, जबकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ऊँचाई उसके नागरिकों के चरित्र, समाज की समरसता और संस्कृति की चेतना से निर्धारित होती है। सभ्यताओं का इतिहास साक्षी है कि जिन राष्ट्रों ने अपनी आत्मा को सुरक्षित रखा, उन्होंने विपत्तियों के बीच भी स्वयं को पुनर्जीवित किया; और जिन्होंने अपने संस्कार खो दिए, वे वैभव के शिखर पर पहुँचकर भी इतिहास के गर्त में समा गए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल के चिंतन का मूल स्वर इसी सत्य की पुनर्पुष्टि करता है। उनके उद्बोधनों में बार-बार यह प्रतिध्वनित होता है कि भारत का भविष्य संसद की बहसों से अधिक समाज के संस्कारों में लिखा जाएगा। शासन व्यवस्था आवश्यक है, किन्तु राष्ट्र का वास्तविक निर्माता वह समाज है जो अपने दायित्वों को अधिकारों से ऊपर रखता है और सेवा को जीवन का स्वाभाविक धर्म मानता है।

भारतीय दर्शन में राष्ट्र कोई राजनीतिक अनुबंध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का सजीव प्रवाह है। हिमालय से समुद्र तक फैली यह भूमि केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि अनगिनत ऋषियों के तप, वीरों के बलिदान, माताओं की प्रार्थनाओं और करोड़ों जनों की आस्था का जीवंत इतिहास है। यही कारण है कि भारत को समझने के लिए केवल संविधान पढ़ना पर्याप्त नहीं; उसकी आत्मा को समझने के लिए उपनिषदों की करुणा, गीता का कर्मयोग, बुद्ध की करुणा, महावीर का संयम, गुरु परंपरा का त्याग और स्वाधीनता सेनानियों के बलिदान को भी पढ़ना होगा।

आज का भारत आर्थिक उन्नति के नए आयाम गढ़ रहा है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल क्रांति तक उसकी उपलब्धियाँ विश्व का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। परंतु एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या तकनीकी विकास के समानांतर हमारा नैतिक विकास भी हो रहा है? यदि परिवारों में संस्कार क्षीण होंगे, शिक्षा केवल रोजगार का साधन बन जाएगी, समाज जातीय और वैचारिक विभाजनों में उलझ जाएगा तथा व्यक्ति केवल उपभोग को ही जीवन का लक्ष्य मान लेगा, तो समृद्धि भी अंततः खोखली सिद्ध होगी।

डॉ. कृष्ण गोपाल का आग्रह सामाजिक समरसता पर विशेष रूप से केंद्रित है। वे विविधता को संघर्ष का नहीं, सहअस्तित्व का आधार मानते हैं। भारत की शक्ति उसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि उसकी उस अद्भुत क्षमता में है जो असंख्य भाषाओं, परंपराओं, मान्यताओं और जीवन-पद्धतियों को एक सांस्कृतिक परिवार में बाँध देती है। यह समरसता किसी राजनीतिक घोषणा से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, संवाद और आत्मीयता से निर्मित होती है।

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया सत्ता परिवर्तन से नहीं, चरित्र परिवर्तन से प्रारंभ होती है। इतिहास बताता है कि जब समाज जागृत हुआ, तब शासन स्वयं सुदृढ़ हुआ; किन्तु जब समाज निष्क्रिय हुआ, तब शक्तिशाली साम्राज्य भी ढह गए। इसलिए आज आवश्यकता किसी नए नारे की नहीं, बल्कि उस पुरातन भारतीय दृष्टि के पुनर्जागरण की है, जो व्यक्ति को केवल अधिकारों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि कर्तव्यों का साधक बनाती है।

भारत का भविष्य किसी एक दल, संगठन अथवा व्यक्ति की उपलब्धियों पर निर्भर नहीं करेगा। उसका भविष्य उस दिन सुरक्षित होगा, जब प्रत्येक नागरिक अपने भीतर यह अनुभव करेगा कि राष्ट्र उसकी सुविधा का माध्यम नहीं, बल्कि उसकी साधना का सर्वोच्च क्षेत्र है। जब विद्यालय ज्ञान के साथ चरित्र देंगे, परिवार सुविधा के साथ संस्कार देंगे, समाज प्रतिस्पर्धा के साथ करुणा देगा और राजनीति सत्ता के साथ सेवा का आदर्श प्रस्तुत करेगी, तभी भारत वास्तव में विश्व का नैतिक नेतृत्व करने की स्थिति में पहुँचेगा।

आज आवश्यकता केवल विकसित भारत की नहीं, बल्कि संस्कारित भारत की है। क्योंकि इतिहास का अंतिम निर्णय अर्थव्यवस्था नहीं करती—वह संस्कृति करती है; सामर्थ्य नहीं, चरित्र करता है; और सत्ता नहीं, समाज करता है।

यदि भारत अपनी सांस्कृतिक आत्मा को जागृत रखते हुए आधुनिकता का आलिंगन करेगा, तो वह केवल विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर नहीं बढ़ेगा, बल्कि मानवता के लिए आशा, संतुलन और नैतिक नेतृत्व का शाश्वत प्रकाशस्तंभ भी बनेगा। यही भारत की सनातन यात्रा है, यही उसके भविष्य का पथ है, और यही उस राष्ट्रचेतना का संदेश है जिसे डॉ. कृष्ण गोपाल अपने विचारों में निरंतर रेखांकित करते रहे हैं।

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