दैनिक इंडिया न्यूज़,नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.पी. सिंह ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा दिया गया इस्तीफा नैतिक उत्तरदायित्व का परिचायक है। उनके अनुसार, यह निर्णय किसी राजनीतिक दबाव, विपक्ष की मांग या संवैधानिक बाध्यता का परिणाम नहीं, बल्कि छात्रों, राष्ट्र और शिक्षा व्यवस्था के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, विश्वसनीय और कठोर बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। पेपर लीक जैसे गंभीर अपराधों पर कठोर दंड, फास्ट ट्रैक न्यायालयों में त्वरित सुनवाई तथा आर्थिक दंड को बढ़ाने जैसे प्रावधान भविष्य में ऐसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होंगे।
डॉ. सिंह ने कहा कि किसी भी पेपर लीक की सबसे बड़ी पीड़ा उन लाखों मेहनती छात्र-छात्राओं को होती है, जो वर्षों की कठिन तैयारी के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं पर कठोर कार्रवाई केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न भी है।
उन्होंने कहा कि हाल के आंदोलनों में अनेक राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोगों ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई। उनका मत था कि छात्रों के हित सर्वोपरि होने चाहिए और किसी भी छात्र आंदोलन को राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
डॉ. ए.पी. सिंह के अनुसार, यदि सरकार ने व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए हैं और जवाबदेही स्वीकार करते हुए निर्णय लिए हैं, तो इसे लोकतंत्र की सकारात्मक कार्यप्रणाली के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे उन छात्रों की नैतिक विजय बताया, जिन्होंने निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली की मांग उठाई।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल परीक्षाएं आयोजित करना नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास की रक्षा करना है। राष्ट्रहित, छात्रहित और पारदर्शिता—ये तीनों लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला हैं। उन्होंने सभी नागरिकों से राष्ट्र निर्माण की इस प्रक्रिया में सकारात्मक सहयोग का आह्वान करते हुए कहा कि "राष्ट्र सर्वोपरि है, छात्र हित सर्वोपरि है और भारत माता का गौरव अक्षुण्ण रहना चाहिए।"