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क्या अधिवक्ताओं को भयभीत कर न्यायपालिका को नियंत्रित करना चाहती है सत्ता?

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क्या अधिवक्ताओं को भयभीत कर न्यायपालिका को नियंत्रित करना चाहती है सत्ता?


वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मिश्रा की गिरफ्तारी के विरोध में लखनऊ हाई कोर्ट के अधिवक्ताओं का तीव्रतम प्रतिरोध


दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ | 5 जनवरी 2025,मध्य प्रदेश में ग्वालियर उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा की कथित दुर्भावनापूर्ण गिरफ्तारी के विरोध में आज लखनऊ हाई कोर्ट के अधिवक्ताओं ने न्यायालय परिसर के बाहर संविधान-संरक्षण की चेतावनी स्वरूप तीखा कैंडल मार्च निकालते हुए शासन-प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायपालिका को दबाने का कोई भी प्रयास अधिवक्ता समाज स्वीकार नहीं करेगा।


अधिवक्ताओं ने इस गिरफ्तारी को संवैधानिक मूल्यों की निर्मम अवहेलना, न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा आघात और अधिवक्ता समुदाय को आतंकित करने की सत्ता-प्रेरित कार्रवाई करार दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह कोई सामान्य आपराधिक कार्रवाई नहीं, बल्कि विधिक असहमति को कुचलने का पूर्व नियोजित प्रयास प्रतीत होती है, जो लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा प्रहार है।


कैंडल मार्च के माध्यम से अधिवक्ताओं ने दो टूक शब्दों में यह मांग रखी कि अनिल मिश्रा को तत्काल और बिना शर्त रिहा किया जाए,उनके विरुद्ध दर्ज सभी आपराधिक प्रकरणों को अविलंब निरस्त किया जाए,तथा इस पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए।
यह कैंडल मार्च माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ के गेट संख्या–6 से प्रारंभ होकर उमेश चन्द्र चौराहा तक पहुँचा। मार्ग में अधिवक्ताओं की संगठित उपस्थिति यह स्पष्ट संकेत देती रही कि अब अधिवक्ता समाज केवल न्यायालय कक्षों तक सीमित रहने वाला नहीं है।


इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व शशांक अग्निहोत्री और राजेश्वर प्रसाद मिश्र, अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, लखनऊ द्वारा किया गया। प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि यदि अधिवक्ताओं को उनके विधिक कर्तव्यों के निर्वहन के कारण निशाना बनाया जाएगा, तो यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के विरुद्ध खुला युद्ध माना जाएगा।
अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता कोई अपराधी नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक हैं।
यदि संरक्षकों को ही हथकड़ी पहनाई जाएगी, तो आम नागरिक के न्याय का अंतिम द्वार भी बंद हो जाएगा।
प्रदर्शन के दौरान यह भी कहा गया कि ऐसी गिरफ्तारियाँ अनुच्छेद 19, 21 और 22 की आत्मा के प्रतिकूल हैं तथा अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की भावना का घोर उल्लंघन करती हैं। यह न केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन है, बल्कि पूरे अधिवक्ता वर्ग की संस्थागत स्वतंत्रता पर हमला है।


अधिवक्ताओं ने केंद्र एवं राज्य सरकार को कानूनी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस प्रकरण में शीघ्र न्यायोचित हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह आंदोलन
न्यायालयों तक सीमित नहीं रहेगा,
बल्कि राष्ट्रव्यापी अधिवक्ता आंदोलन का रूप लेगा,
जिसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।न्यायप्रिय नागरिकों से भी आह्वान किया गया कि वे इसे किसी एक अधिवक्ता या वर्ग का विषय न मानें, बल्कि इसे लोकतंत्र, विधि-शासन और नागरिक स्वतंत्रताओं की निर्णायक लड़ाई समझकर नैतिक समर्थन दें।

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